कुछ खिलाड़ी रन बनाते हैं, कुछ रिकॉर्ड और कुछ इंतजार का कारण बन जाते हैं. वैभव सूर्यवंशी इन दिनों उसी इंतजार और उम्मीद दोनों का हिस्सा हैं, लेकिन भारतीय खेलों का इतिहास बताता है कि प्रतिभा की असली परीक्षा सिर्फ मैदान पर नहीं, उसके बाहर भी होती है. भारतीय क्रिकेट में कभी-कभी ऐसे खिलाड़ी आते हैं जो सिर्फ रन नहीं बनाते, बल्कि एक पीढ़ी की कल्पना पर कब्जा कर लेते हैं. आईपीएल-2026 में वैभव ने कुछ वैसा ही असर छोड़ा है. उसकी बल्लेबाजी में सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि एक बेचैनी, एक आकर्षण और कुछ अलग कर गुजरने की भूख दिखाई दी.
इस सीजन स्कोर या नतीजे से अधिक दिलचस्पी इस बात में होती थी कि वैभव बैटिंग करने कब आएगा? क्रीज पर उसके कदम रखते ही टीवी स्क्रीन और मोबाइल पर नजरें ठहर जाती थीं. हर गेंद के साथ उम्मीद बढ़ती थी और हर शॉट के साथ रोमांच. वैभव ने अपनी निडर बल्लेबाजी, बड़े शॉट्स और आत्मविश्वास से ऐसा जादू पैदा कर दिया कि उसके आउट होते ही मैच का आकर्षण फीका पड़ जाता था.
कोई उसके बल्ले को तलवार बताता था, कोई उसे गॉड गिफ्टेड टैलेंट कहता था, तो कुछ लोगों को लगता था मानो उसके बल्ले में चुंबक लगा हो और गेंद खुद-ब-खुद बाउंड्री की राह पकड़ लेती हो. खैर कोई कुछ भी कहे लेकिन वैभव की बल्लेबाजी ने क्रिकेट देखने की एक नई वजह पैदा कर दी है.
हालांकि, भारतीय क्रिकेट ने यह दीवानगी पहले भी देखी है. एक दौर था, जब पूरा देश सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाजी के समय ठहर जाता था. मोहल्लों में टीवी की आवाजें एक साथ गूंजती थीं. सचिन के आउट होते ही लोग टीवी बंद कर देते. सड़कों पर सन्नाटा छा जाता. सचिन सिर्फ खिलाड़ी नहीं थे, वे उम्मीद थे. अब वर्षों बाद वैसी दीवानगी की हल्की झलक वैभव के आसपास दिखाई दे रही है. ये कहना जल्दबाजी होगी कि वैभव सचिन बन जाएगा, लेकिन इतना जरूर है कि उसने लोगों को फिर से किसी बल्लेबाज का इंतजार करना सिखा दिया है.
लेकिन भारतीय खेलों का इतिहास सिर्फ प्रतिभा का इतिहास नहीं है. यह सत्ता, क्षेत्रवाद, लॉबी और प्रभाव का भी इतिहास रहा है. इसलिए जब कोई नया खिलाड़ी असाधारण लोकप्रियता हासिल करता है तो उसके खेल से ज्यादा चिंता उसके भविष्य को लेकर होने लगती है. डर यह रहता है कि कहीं वह भी उसी राजनीति का शिकार न हो जाए, जिसने कई प्रतिभाओं को समय से पहले निगल लिया.
भारतीय क्रिकेट लंबे समय तक कुछ विशेष केंद्रों के प्रभाव में रहा. खासकर पश्चिम और दक्षिण को हमेशा भारतीय क्रिकेट की सत्ता का केंद्र माना गया. बेंगलुरु-मुंबई का क्रिकेट ढांचा मजबूत था, वहां क्लब संस्कृति थी, संसाधन थे, चयनकर्ताओं से नजदीकी थी और सबसे बड़ी बात कि वहां से आने वाले खिलाड़ियों को 'क्रिकेटिंग समझ' का प्रतीक मान लिया गया था. धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी मजबूत हो गई कि देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले खिलाड़ियों को सिर्फ रन बनाकर नहीं, बल्कि हर कदम पर खुद को साबित करके आगे बढ़ना पड़ता था. कई बार प्रतिभा से ज्यादा महत्व पहचान, नेटवर्क और प्रभाव का हो जाता था. भारतीय क्रिकेट का यह सच लंबे समय तक अनकहा जरूर रहा, लेकिन अदृश्य कभी नहीं था.
उत्तर भारत, बिहार, पूर्वांचल और छोटे शहरों से आने वाले खिलाड़ियों के लिए क्रिकेट लंबे समय तक सिर्फ खेल नहीं, व्यवस्था से लड़ाई भी रहा है. उनके पास न महंगी अकादमी थीं, न प्रभावशाली नेटवर्क, न चयनकर्ताओं तक पहुंच और न ही वह महानगरीय चमक, जिसे भारतीय क्रिकेट अक्सर “प्रतिभा” समझ लेता था. ऐसे खिलाड़ियों को सिर्फ रन नहीं बनाने पड़ते थे, बल्कि हर स्तर पर अपनी मौजूदगी साबित करनी पड़ती थी.
इसीलिए वैभव की कहानी सिर्फ एक बल्लेबाज की कहानी नहीं लगती. वह उस भूगोल से निकलकर आया है, जिसे भारतीय क्रिकेट की पारंपरिक सत्ता ने लंबे समय तक हाशिये पर रखा. उसकी लोकप्रियता का कारण सिर्फ उसके शॉट्स नहीं हैं, बल्कि वह प्रतीकात्मक जगह है, जहां वह खड़ा दिखाई देता है. वैभव के उभार ने भारतीय क्रिकेट के उस पुराने सत्ता-संतुलन पर भी सवाल खड़े किए हैं, जहां प्रतिभा से ज्यादा महत्व अक्सर भूगोल और पहुंच को मिलता था. इसलिए उसकी बल्लेबाजी सिर्फ मनोरंजन नहीं पैदा कर रही, वह एक मनोवैज्ञानिक बदलाव भी पैदा कर रही है. जैसे छोटे शहर पहली बार यह महसूस कर रहे हैं कि क्रिकेट अब सिर्फ महानगरों की निजी जागीर नहीं रहा.
भारतीय खेलों में क्षेत्रीय वर्चस्व की भी लड़ाई कोई नई कहानी नहीं है. लगभग हर बड़े खेल में सत्ता, प्रभाव और भूगोल का अपना गठजोड़ रहा है. कुश्ती इसका सबसे ताजा और सबसे तीखा उदाहरण बनी. लंबे समय तक हरियाणा भारतीय कुश्ती की निर्विवाद राजधानी रहा. वहां की अखाड़ा संस्कृति, राजनीतिक संरक्षण, सरकारी ढांचा और सामाजिक प्रतिष्ठा ने मिलकर ऐसी ताकत तैयार की, जिसने खेल पर लगभग एकछत्र प्रभाव कायम कर लिया था. लेकिन खेलों में सत्ता कभी स्थायी नहीं रहती.
धीरे-धीरे दूसरे राज्यों से भी पहलवान उभरने लगे. नई प्रतिभाएं सामने आईं, नए दावे पैदा हुए और यहीं से संघर्ष शुरू हुआ. जैसे-जैसे शक्ति संतुलन बदलने लगा, वैसे-वैसे खेल के भीतर गुटबाजी, खेमेबंदी और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी तेज होते गए. मामला सिर्फ दांव-पेंच का नहीं रहा, खेल की सत्ता पर नियंत्रण का हो गया. स्थिति यहां तक पहुंची कि भारतीय कुश्ती का विवाद अखाड़ों से निकलकर सड़कों और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा. यह सिर्फ खिलाड़ियों का संघर्ष नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था का पर्दाफाश भी था, जहां खेल कई बार प्रतिभा से कम और प्रभाव से ज्यादा संचालित होता दिखाई देता है.
दरअसल, भारत में खेल सिर्फ खेल नहीं होते. वे सामाजिक सत्ता के विस्तार का माध्यम भी बन जाते हैं, जिस राज्य का खिलाड़ी चमकता है, वहां की राजनीति उसे अपना चेहरा बनाने लगती है. खेल संघों पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो जाती है. चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने लगते हैं. मीडिया कवरेज भी कई बार प्रतिभा से ज्यादा प्रभाव देखकर तय होती है. क्रिकेट में यह राजनीति ज्यादा दिखाई नहीं देती क्योंकि कैमरे चमकदार हैं, प्रायोजक बड़े हैं और भाषा बहुत सलीकेदार होती है. लेकिन भीतर की खींचतान उतनी ही सख्त है जितनी किसी और खेल में. कौन-सा खिलाड़ी लगातार मौके पाएगा, किसकी खराब फॉर्म को 'अस्थायी संघर्ष' कहा जाएगा और किसे एक-दो मैच बाद बाहर कर दिया जाएगा, इन सबके पीछे सिर्फ प्रदर्शन नहीं चलता.
टीके श्रीवास्तव