'लोग मेरी बल्लेबाजी नहीं, मेरा धर्म देखने लगे...' उस्मान ख्वाजा का छलका दर्द, बोले- कई बार अपने ही देश में पराया महसूस किया

ऑस्ट्रेलिया के पहले मुस्लिम टेस्ट क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा ने भावुक लेख में बताया कि कई बार उन्हें अपने ही देश में अलग-थलग महसूस हुआ. उन्होंने नस्लभेद और ऑस्ट्रेलिया में अपनी पहचान को लेकर खुलकर बात की.

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पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा का भावुक खुलासा. (Photo, Getty) पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा का भावुक खुलासा. (Photo, Getty)

आजतक स्पोर्ट्स डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:42 PM IST

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व टेस्ट क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा ने एक भावुक लेख में खुलासा किया है कि मुस्लिम होने की वजह से कई बार उन्हें अपने ही देश में ऐसा महसूस हुआ, मानो वे वहां के नहीं हैं. उन्होंने लिखा कि एक समय ऐसा भी आया, जब लोगों ने उनकी बल्लेबाजी पर बात करना छोड़ दिया और उनकी पहचान सिर्फ एक 'मुस्लिम' के रूप में होने लगी. यह लेख उन्होंने ब्रिटिश अखबार The Guardian में लिखा है.

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ख्वाजा ऑस्ट्रेलिया के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले पहले मुस्लिम क्रिकेटर रहे हैं. अपने लेख में उन्होंने नस्लभेद, इस्लामोफोबिया और पहचान से जुड़े उन अनुभवों को साझा किया, जिनका सामना उन्हें अपने करियर के दौरान करना पड़ा.

'क्रिकेट में सिर्फ रन मायने रखते हैं, लेकिन जिंदगी ऐसी नहीं'

ख्वाजा ने लिखा कि क्रिकेट की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी ईमानदारी है. स्कोरकार्ड सिर्फ यह बताता है कि आपने कितने रन बनाए, कितनी देर बल्लेबाजी की और टीम जीती या हारी. वहां न आपका धर्म मायने रखता है, न रंग और न ही जन्मस्थान. लेकिन असल जिंदगी इतनी निष्पक्ष नहीं होती.

पश्चिमी सिडनी में पले-बढ़े ख्वाजा बताते हैं कि बचपन में उन्हें मुस्लिम होने से ज्यादा अपने सांवले रंग की वजह से अलग महसूस कराया जाता था. कभी मजाक उड़ाया जाता, कभी बिना वजह धारणाएं बना ली जातीं. उनके शब्दों में, 'नस्लभेद हमेशा चीखता नहीं है, कई बार वह सिर्फ यह एहसास दिलाता है कि शायद तुम यहां के नहीं हो.'

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'राष्ट्रीय टीम में पहुंचने के बाद भी खुद को अलग महसूस किया'

ख्वाजा को लगता था कि क्रिकेट वह जगह होगी, जहां सिर्फ प्रदर्शन की कीमत होगी. अगर रन बनाएंगे तो टीम में जगह मिलेगी. लेकिन ऑस्ट्रेलियाई टीम तक पहुंचने के बाद भी कई बार उन्हें लगा कि वे बाकी खिलाड़ियों जैसे नहीं हैं.

उन्होंने लिखा, 'जब टीम में बहुत कम लोग आपकी तरह दिखते हों, आपकी तरह प्रार्थना करते हों या आपकी जैसी पृष्ठभूमि रखते हों, तब हर पल आपको अपनी अलग पहचान का एहसास होता है.'

ख्वाजा के मुताबिक, पहले लोग उनकी बल्लेबाजी पर बहस करते थे कि उन्हें ओपनिंग करनी चाहिए या नंबर-3 पर खेलना चाहिए. उन्हें इससे कोई शिकायत नहीं थी, क्योंकि यही खेल का हिस्सा है.

लेकिन धीरे-धीरे हालात बदल गए. उन्होंने लिखा, 'मुझे हैरानी तब हुई, जब लोगों ने मेरी बल्लेबाजी पर बात करना ही छोड़ दिया. क्रिकेटर कहीं पीछे छूट गया और सामने सिर्फ 'मुस्लिम' रह गया.'

क्राइस्टचर्च हमले ने बदल दी सोच

2019 में न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में हुए आतंकी हमले ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया. ख्वाजा का मानना है कि नफरत की शुरुआत हिंसा से नहीं होती, बल्कि शब्दों, पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों से होती है.

इसी वजह से उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में चलाए जा रहे 'रिपोर्टिंग इस्लामोफोबिया' अभियान का समर्थन किया. उनका कहना है कि मुस्लिम विरोधी घटनाओं को रिपोर्ट करना जरूरी है, क्योंकि हर गाली, हर धमकी और हर नफरत भरा संदेश किसी इंसान के भीतर यह भावना कमजोर करता है कि वह इस समाज का हिस्सा है.

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'मेरी पत्नी भी नफरत का निशाना बनी'

ख्वाजा ने बताया कि उनकी पत्नी, जिन्होंने इस्लाम अपनाया, उन्हें भी कई बार धार्मिक नफरत का सामना करना पड़ा.

उन्होंने लिखा कि जब आपके अपने लोग सिर्फ अपने धर्म की वजह से निशाना बनते हैं, तब समझ आता है कि पूर्वाग्रह सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार और पूरे समुदाय को प्रभावित करता है.

इसी साल जनवरी में ऑस्ट्रेलिया के लिए अपना आखिरी टेस्ट मैच खेलने के बाद परिवार के साथ लौटते उस्मान ख्वाजा. (Photo, Getty)

'हम भी वही चाहते हैं, जो हर ऑस्ट्रेलियाई चाहता है'

ख्वाजा कहते हैं कि अधिकांश मुसलमान भी वही चाहते हैं, जो हर ऑस्ट्रेलियाई चाहता है- अच्छी जिंदगी, परिवार की खुशहाली, समाज में योगदान और अपने धर्म का शांतिपूर्वक पालन.

उन्होंने लिखा कि ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें ऐसे अवसर दिए, जिनकी उनके माता-पिता ने शायद कल्पना भी नहीं की थी. हर बार जब उन्होंने 'बैगी ग्रीन' कैप पहनी, तो गर्व के साथ पहनी.

'अगले मुस्लिम बच्चे को यह सवाल न पूछना पड़े'

अपने लेख के अंत में ख्वाजा ने लिखा कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि पश्चिमी सिडनी में बड़ा होने वाले अगले मुस्लिम बच्चे को कभी यह सवाल न पूछना पड़े कि क्या वह इस देश का हिस्सा है.

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वह सिर्फ बल्ला उठाए, क्रीज पर जाए और उसे भरोसा हो कि लोगों को सिर्फ उसकी बल्लेबाजी से मतलब है, उसके धर्म से नहीं.

ख्वाजा के मुताबिक, यही वह ऑस्ट्रेलिया है, जिसके लिए वह हमेशा बल्लेबाजी करना चाहते थे.

उस्मान ख्वाजा का अंतरराष्ट्रीय करियर भी शानदार रहा

उस्मान ख्वाजा ने ऑस्ट्रेलिया के लिए 88 टेस्ट मैचों में 42.95 की औसत से 6,229 रन बनाए, जिसमें 16 शतक और 28 अर्धशतक शामिल हैं. टेस्ट में उनका उच्चतम स्कोर 232 रन रहा. इसके अलावा उन्होंने 40 वनडे मैचों में 1,554 रन (2 शतक, 12 अर्धशतक) और 9 टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में 241 रन बनाए.
 

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