प्रशांत महासागर का 'बुखार' भारत के मानसून को करेगा कमजोर, फसलों पर असर

प्रशांत महासागर में मजबूत अल-नीनो लौटने की संभावना है. IMD ने चेतावनी दी है कि भारत का अगला मानसून सामान्य से कमजोर (92%) रह सकता है. इससे खरीफ फसलों पर असर पड़ेगा. करोड़ों किसानों की मुश्किलें बढ़ेंगी.

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पश्चिम बंगाल के नादिया में भयानक गर्मी से बच्चे को बचाती मां. (Photo: PTI) पश्चिम बंगाल के नादिया में भयानक गर्मी से बच्चे को बचाती मां. (Photo: PTI)

दीपू राय

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:27 PM IST

दुनिया के महासागर दो साल से लगातार गर्म हो रहे हैं. अब प्रशांत महासागर फिर से तेजी से गर्म हो रहा है. अमेरिका के मौसम विभाग NOAA ने 14 मई को चेतावनी दी है कि अल-नीनो के मजबूत होने की संभावना 82 प्रतिशत है. साल के अंत तक यह बहुत ताकतवर या सुपर अल-नीनो बन सकता है. इस स्थिति में समुद्र का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा बढ़ सकता है.

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अल-नीनो क्या है?

अल-नीनो पैसिफिक महासागर की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें हर कुछ साल बाद गर्म पानी जमा हो जाता है और फिर फैल जाता है. इससे दुनिया भर में बारिश और सूखे का पैटर्न बदल जाता है. भारत में जून से सितंबर तक आने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की जीवन रेखा है. देश के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, खेती योग्य भूमि का केवल 55 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचाई से जुड़ा है. बाकी खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है.

भारतीय मौसम विभाग की चेतावनी

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने 13 अप्रैल को लंबी अवधि का पूर्वानुमान जारी किया था. इसके अनुसार, इस बार मानसून सामान्य से कम (92 प्रतिशत) रहने की संभावना है. IMD ने 35 प्रतिशत संभावना कमजोर मानसून की और 31 प्रतिशत संभावना सामान्य से नीचे मानसून की बताई है. विभाग मई के अंत में अपना अपडेट जारी करेगा.

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क्यों बढ़ रहा है खतरा?

इस बार समस्या ज्यादा गंभीर है क्योंकि समुद्र पहले से ही गर्म है. अप्रैल 2026 वैश्विक महासागरों का दूसरा सबसे गर्म अप्रैल रहा. अल-नीनो अब पहले से गर्म महासागर पर बन रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार, 1960 के दशक से अल-नीनो के उतार-चढ़ाव तेज होते जा रहे हैं.

पिछले अल-नीनो का असर

पिछले अल-नीनो वर्षों (2002, 2004, 2009) में खरीफ फसलों - धान, मक्का, बाजरा और ज्वार पर बुरा असर पड़ा था. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन में पाया गया कि धान की फसल सबसे ज्यादा प्रभावित हुई. कई जिलों में उपज 10 प्रतिशत से ज्यादा कम हो गई.

कुछ उम्मीद की किरणें भी

हालांकि हर अल-नीनो सूखा नहीं लाता. IMD को भारतीय महासागर डाइपोल (IOD) सकारात्मक रहने की उम्मीद है, जो अफ्रीका के पास गर्म पानी का क्षेत्र है और भारत की ओर अतिरिक्त नमी खींच सकता है. इसके अलावा यूरेशियन बर्फ भी कम होने की संभावना है, जो अच्छे मानसून से जुड़ा है.

कमजोर मानसून का मतलब

अगर मानसून कमजोर रहा तो खरीफ की बुवाई प्रभावित होगी, फसल कम होगी, खाद्य कीमतें बढ़ेंगी और जलाशयों में पानी कम रहेगा. देश के करोड़ों किसान जो बारिश पर निर्भर हैं, उनकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

भविष्य की चुनौती

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अल-नीनो आता-जाता रहता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसे गर्म साइकिल तेजी से और बार-बार आ रहे हैं. भारत को अब फसलों की किस्में बदलने, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, समय पर सलाह और भंडारण क्षमता बढ़ाने की जरूरत है. 

वैज्ञानिक चेतावनी साफ है - पैसिफिक महासागर का बुखार भारत के खेतों पर भारी पड़ सकता है. किसानों, सरकार और नीति-निर्माताओं को इस बार पहले से तैयारी करनी होगी ताकि कमजोर मानसून का असर कम किया जा सके.

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