Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, हर इच्छा होगी पूरी

Devshayani Ekadashi 2026: इस एकादशी से अगले चार माह तक श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा मे चले जाते हैं. इसलिए अगले चार माह तक शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं. इसी समय से चातुर्मास की शुरुआत भी हो जाती है. इस एकादशी से तपस्वियों का भ्रमण भी बंद हो जाता है. इन दिनों में केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है.

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देवशयनी एकादशी 2026 (Photo: ITG) देवशयनी एकादशी 2026 (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 8:00 AM IST

Devshayani Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में आषाढ़ महीने की देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, तब वे पाताल लोक में निवास करते हैं. इसी कारण इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है, जो चार महीनों तक चलता है. इस समय को साधना, भक्ति और नियम पालन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है.

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इन चार महीनों के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों को करना शुभ नहीं माना जाता. क्योंकि यह समय भगवान विष्णु के विश्राम का होता है, इसलिए नए शुभ कार्यों की शुरुआत से बचा जाता है. तो चलिए जानते हैं देवशयनी एकादशी से जुड़ी उस पौराणिक कथा के बारे में, जिसे सुनने और पढ़ने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है.

देवशयनी एकादशी की कथा

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवशयनी एकादशी की कथा का वर्णन भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था. इस कथा में सूर्यवंश के एक महान और न्यायप्रिय राजा मांधाता का उल्लेख मिलता है, जो अपनी प्रजा की देखभाल अपने बच्चों की तरह करते थे.

एक समय उनके राज्य में भयंकर सूखा पड़ गया. बारिश न होने के कारण चारों ओर संकट का माहौल बन गया और लोग बहुत परेशान हो गए. अपनी प्रजा के कष्ट को दूर करने के लिए राजा मांधाता उपाय खोजने निकल पड़े और जंगल की ओर चले गए.

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वहीं उन्हें ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि अंगिरा का आश्रम मिला. राजा ने ऋषि को अपने राज्य की समस्या बताई और समाधान पूछा. तब महर्षि अंगिरा ने उन्हें देवशयनी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी और इसका महत्व समझाया.

राजा ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत को किया. इसके प्रभाव से उनके राज्य में अच्छी वर्षा हुई, जिससे अकाल समाप्त हो गया और प्रजा को फिर से सुख-समृद्धि प्राप्त हुई.

ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. जो लोग मोक्ष की कामना रखते हैं, उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिए.

देवशयनी एकादशी पूजन विधि

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं. स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद घर के मंदिर के सामने हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें. फिर, पूजा स्थान को साफ करके गंगाजल छिड़कें. एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें. साथ ही माता लक्ष्मी की मूर्ति भी रखें. भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं. इसके बाद उन्हें पीले वस्त्र, चंदन, अक्षत, और पीले फूल अर्पित करें.

भगवान विष्णु को ऋतु फल, मिठाई और विशेष रूप से पीले रंग के भोग अर्पित करें. ध्यान रखें कि भगवान विष्णु के भोग में तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) जरूर शामिल हो, क्योंकि इसके बिना वे भोग स्वीकार नहीं करते. धूप और दीप जलाकर देवशयनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें. कथा पूरी होने के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें. चूंकि, इस दिन से भगवान चार महीने के लिए सोते हैं, इसलिए पूजा के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा को एक छोटे गद्दे या सुंदर वस्त्र वाले बिस्तर पर सुलाया जाता है. उन्हें तकिया और ओढ़ने के लिए पीला वस्त्र (चादर) दिया जाता है और हाथ जोड़कर उनसे निद्रा में जाने की प्रार्थना की जाती है.

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