Mahashivratri 2026 Shubh Muhurt: महाशिवरात्रि कल, सुबह जल्दी शुरू हो जाएगा शुभ मुहूर्त, नोट कर लें टाइमिंग

इस साल महाशिवरात्रि पर 10 बड़े ही शुभ योग रहने वाले हैं. चार प्रहर की पूजा के अलावा शिवलिंग के जलाभिषेक के लिए भी अलग-अलग समय पर चार मुहूर्त रहेंगे. महाशिवरात्रि के व्रत का पारण 16 फरवरी को सुबह 06:59 बजे से दोपहर 3:24 बजे तक होगा.

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महाशिवरात्रि पर 10 बड़े ही शुभ योग भी रहने वाले हैं. (Photo: ITG) महाशिवरात्रि पर 10 बड़े ही शुभ योग भी रहने वाले हैं. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:12 AM IST

Mahashivratri 2026: कल देशभर में महाशिवरात्रि का त्योहार धूमधाम से मनाया जाएगा. मान्यता है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इसलिए हर साल इस तिथि पर महाशिवरात्रि मनाई जाती है. इस दिन भोलेनाथ के भक्त व्रत रखते हैं. शिवलिंग का जलाभिषेक और विधिवत पूजा करते हैं. इस बार भी भक्त पूरी आस्था और उत्साह के साथ जलाभिषेक करने मंदिरों और शिवालयों में पहुंचेंगे. आइए जानते हैं कि महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त क्या रहने वाला है.

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महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त
पहला मुहूर्त- सुबह 08.24 बजे से सुबह 09.48 बजे तक
दूसरा मुहूर्त- सुबह 09.48 बजे सुबह 11.11 बजे तक
तीसरा मुहूर्त- सुबह 11.11 बजे से दोपहर 12.35 बजे तक. 
चौथा मुहूर्त- सुबह 06.11 बजे से 07.47 बजे तक

चार प्रहर की पूजा का मुहूर्त
पहला प्रहर- 15 फरवरी को शाम 06:11 से रात 09:23 बजे तक
दूसरा प्रहर- रात 09:23 बजे से रात 12:35 बजे तक
तीसरा प्रहर- 16 फरवरी रात 12:35 बजे से सुबह 03:47 बजे तक.
चौथा प्रहर- 16 फरवरी को सुबह 03:47 से सुबह 06:59 बजे तक.

महाशिवरात्रि की तिथि और पारण 
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी 15 फरवरी को शाम 05:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी को शाम 05:34 बजे तक रहेगी. महाशिवरात्रि का व्रत 15 फरवरी को मान्य होगा. जबकि पारण 16 फरवरी को सुबह 06:59 बजे से दोपहर 3:24 बजे के बीच होगा.

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महाशिवरात्रि पर दस शुभ योग
इस साल महाशिवरात्रि पर 10 बड़े ही शुभ योग रहने वाले हैं. इस दिन शिव योग से लेकर सर्वार्थ सिद्धि, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, साध्य, शुक्ल और ध्रुव जैसे कई योग बनेंगे. साथ ही, इस दिन व्यतिपात और वरियान योग भी रहने वाले हैं.

चार प्रमुख राजयोग
महाशिवरात्रि पर कुंभ राशि में चार प्रमुख राजयोग रहने वाले हैं. इस दिन बुध और सूर्य की युति से बुधादित्य राजयोग बनेगा. बुध और शुक्र मिलकर लक्ष्मी नारायण राजयोग बनाएंगे. जबकि सूर्य और शुक्र से शुक्रादित्य योग का निर्माण होगा. शनि अपनी मूल त्रिकोण राशि कुंभ में रहकर शश महापुरुष राजयोग बनाएंगे. इसके अलावा, सूर्य, बुध, शुक्र और राहु की एक साथ उपस्थिति से चतुर्ग्रही योग भी बन रहा है.

पूजन सामग्री
बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, भांग, दीपक, आक का फूल, सफेद फूल, चंदन, रोली, सिक्का, अक्षत (चावल), सुपारी, कलश, लौंग और इलायची, जनेऊ, नारियल, मिठाई, फल

महाशिवरात्रि की पूजन विधि
महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर व्रत का संकल्प लें. पूजा के लिए एक साफ-सुथरे स्थान पर चौकी रखें और उस पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं. फिर वहां थोड़े से चावल रखकर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कर दें. इसके बाद मिट्टी या तांबे के कलश पर स्वास्तिक बनाएं. पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर इस कलश में भर दें. इसमें सुपारी, सिक्का, हल्दी की गांठ भी डालें. इसके बाद भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाएं और पास में एक छोटा शिवलिंग रखें. आप चाहें तो मिट्टी से खुद भी नए शिवलिंग का निर्माण कर सकते हैं.

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इसके बाद गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और मिश्री) से शिवलिंग का अभिषेक करें. अभिषेक करते हुए 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करते रहें. अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और फल-फूल आदि अर्पित करें. इसके बाद महाशिवरात्रि की कथा पढ़ें और कपूर से आरती करें. अंत में भगवान को मिठाई, खीर आदि का भोग लगाकर प्रसाद के रूप में बांट दें.

महाशिवरात्रि की कथा
महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को  भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इसलिए इस दिन व्रत रखकर शिवलिंग का अभिषेक और रात्रि जागरण करने से शिव-पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. दांपत्य जीवन में खुशियों का संचार होता है. कहा जाता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से भक्तों की प्रत्येक मनोकामना पूरी हो जाती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है.

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार देवताओं और दानवों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया. मंथन के दौरान सबसे पहले भयंकर विष हलाहल निकला, जिसकी ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे. तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने वह विष अपने कंठ में धारण कर लिया. विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए. देवताओं ने पूरी रात जागकर उनका स्तुति-गान किया, जिससे शिव प्रसन्न हुए. मान्यता है कि महाशविरात्रि का रात्रि जागरण इसी घटना को समर्पित है.

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