सिद्धपुरुष कभी मछली खाएगा? स्वामी विवेकानंद पर बोले अमोघ लीला दास, लगा 1 महीने का बैन

इस्कॉन ने स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस के बारे में अनुचित टिप्पणी करने के लिए संत अमोघ लीला दास (Amogh Lila Das) पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसमें उन्होंने अपने एक 'प्रवचन' के दौरान उनके मछली खाने पर सवाल पर सवाल उठाया था.

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सूर्याग्नि रॉय

  • कोलकाता,
  • 12 जुलाई 2023,
  • अपडेटेड 11:33 AM IST

इस्कॉन मंदिर सोसाइटी से जुड़े स्वामी आमोघ लीला दास की स्वामी विवेकानंद और गुरु रामकृष्ण परमहंस पर विवादित टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई है. मंगलवार को इस्कॉन मंदिर ने बयान जारी करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की टिप्पणी को लेकर आमोघ लीला दास पर एक महीने का बैन लगाया जा रहा है.

दरअसल, इस्कॉन से जुड़े स्वामी आमोघ लीला दास का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह स्वामी विवेकानंद के मछली खाने को लेकर सवाल उठाते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो में स्वामी आमोघ लीला दास कह रहे हैं कि एक सिद्धपुरुष कभी भी किसी जानवर को नुकसान नहीं पहुंचाता. 

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अमोघ लीला दास ने क्या कहा?

प्रवचन के दौरान, अमोघ लीला दास ने स्वामी विवेकानन्द द्वारा मछली के सेवन पर सवाल उठाते हुए कहा था कि एक सिद्धपुरुष व्यक्ति कभी भी किसी जानवर को नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी चीज का सेवन नहीं करेगा. 

उन्होंने आगे कहा, 'क्या कोई दिव्यपुरुष कोई जानवर को मारकर खाएगा? क्या कभी मछली खाएगा? मछली को भी दर्द होता है ना? और अगर विवेकानंद मछली खाएं तो क्या एक सिद्धपुरुष मछली खा सकता है? नहीं खाएगा. सिद्धपुरुष के ह्रदय में करुणा होती है.'

स्वामी विवेकानंद के अलावा उन्होंने उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के विचार 'जातो मत, ततो पथ' (जितने विचार, उतने रास्ते) पर भी टिप्पणी की और कहा कि हर रास्ता एक ही मंजिल तक नहीं जाता है.' 

इस्कॉन ने किया बैन

अमोघ लीला दास के इस वीडियो के वायरल होने पर सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ गया जिस कारण इस्कॉन ने अमोघ लीला प्रभु को के खिलाफ कार्रवाई की. 

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इस्कॉन ने अपने बयान में कहा कि वह अमोघ लीला दास की अनुचित और अस्वीकार्य टिप्पणियों और इन दो व्यक्तित्वों की महान शिक्षाओं के बारे में उनकी समझ की कमी से दुखी हैं.उन्हें इस्कॉन से एक महीने की अवधि के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाएगा.

बयान में आगे बताया गया है कि अमोघ लीला दास ने अपनी टिप्पणियों के लिए माफी मांगी थी और वह गोवर्धन की पहाड़ियों में एक महीने के लिए प्रायश्चित पर जाने का संकल्प लिया है. वह तत्काल प्रभाव से खुद को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह अलग कर लेंगे.

स्वामी विवेकानंद के मांसाहार पर विचार

स्वामी विवेकानंद ने कई बार मांसाहार पर विचार भी रखे. शिष्यों ने भी अपने गुरू यानी स्वामी विवेकानंद से मांसाहार पर सवाल किए, जिस पर उन्होंने अपनी राय रखी. एक बार शिष्य ने स्वामी से पूछा था कि क्या मछली और मांस का सेवन जरूरी है? इस पर स्वामी विवेकानंद ने शिष्य को मांस व मछली खाने की सलाह दी थी. स्वामी विवेकानंद ने कहा कि अगर ऐसा करने से किसी तरह का कोई नुकसान पहुंचता है तो मैं उसका खयाल रखूंगा. 

स्वामी विवेकानंद ने शिष्य से आगे कहा कि हमारे देश की भीड़ को देखो, हर किसी चेहरे पर उदासी और दिल में साहस और उत्साह की कमी नजर आती है. इन लोगों के बड़े-बड़े पेट हैं और हाथ-पांव में बिल्कुल भी जान नहीं है. यह छोटी-छोटी बातों पर डरने वाले कायरों का एक समूह है.

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शिष्य ने आगे सवाल करते हुए पूछा था, क्या मछली और मांस खाने से ताकत मिलती है? फिर बौद्ध धर्म और वैष्णववाद क्यों हत्या ना करने को सर्वोच्च गुण मानते हैं?

शिष्य के जवाब में स्वामी विवेकानंद ने कहा कि बौद्ध धर्म और वैष्णववाद अलग-अलग नहीं हैं. जब भारत में बौद्ध धर्म का पतन हो रहा था, उस समय हिंदू धर्म ने बौद्ध आचरण के कुछ प्रमुख सिद्धांतों को उनसे लेकर अपना बना लिया था, जिन्हें बाद में वैष्णववाद के रूप में पहचाना जाने लगा. 

स्वामी विवेकानंद ने आगे कहा कि, बौद्ध धर्में हत्या न करना सर्वोच्च गुण है जो काफी अच्छा भी है. लेकिन बड़े पैमाने पर लोगों की क्षमताओं का ध्यान रखे बिना इसे कानून के जरिए सभी पर लागू करने की कोशिश में, बौद्ध धर्म ने भारत को बर्बाद कर दिया है. स्वामी विवेकानंद ने आगे कहा कि, भारत में उन्होंने ऐसे धार्मिक लोगों को देखा है जो चींटियों को तो चीनी खिलाते हैं, लेकिन पैसे के लिए अपने सगे भाई को बर्बाद करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं.

शिष्य ने अगला सवाल पूछा, गुरुजी लेकिन वेदों में और मनु स्मृति के नियमों के तहत भी मांस-मच्छी खाने की मनाही है. 

स्वामी विवेकानंद ने इस सवाल के जवाब में कहा कि, इन दोनों में हत्या करने से भी दूर रहने का आदेश दिया गया है. वेदों में कहा गया है कि कभी किसी भी प्राणी को चोट न पहुंचाओं, वहीं महर्षि मनु ने भी कहा है कि इच्छा को खत्म करने से ही महान परिणाम मिलते हैं. मारने या नहीं मारने का आदेश लोगों की व्यक्तिगत क्षमता और अनुकूलन क्षमता पर निर्भर करता है.

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शिष्य ने आगे पूछा, आजकल यह फैशन बन गया है कि धर्म को अपनाते ही मछली और मांस को छोड़ देना चाहिए? और ऐसा न करना कई लोगों के लिए  व्यभिचार (एडल्ट्री) जैसे बड़े पाप करने से भी पापपूर्ण है. आपको क्या लगता है, ये धारणाएं अस्तित्व में कैसे आईं?

स्वामी विवेकानंद ने जवाब में कहा कि, यह जानकर क्या फायदा कि यह धारणाएं कैसे आईं, जबकि आप साफ रूप से देख रहे हैं. क्या आपको नहीं जानते कि ऐसी धारणाएं हमारे देश और समाज को बर्बाद कर रही हैं. स्वामी जी ने आगे कहा कि पूर्वी बंगाल में काफी लोग ज्यादा मछली और मांस खाते हैं और वे लोग बंगाल के उस हिस्से से ज्यादा स्वस्थ हैं, जहां ऐसा नहीं किया जाता है.  

स्वामी विवेकानंद ने आगे कहा कि पूर्वी बंगाल में अमीर लोग रात में रोटी नहीं खाते हैं, इसलिए ही वे हमारी तरह अपच और एसिडिटी के पीड़ित नहीं है. स्वामी जी ने आगे कहा कि उन्होंने सुना है कि पूर्वी बंगाल में गांवों में लोगों को यह तक नहीं अंदाजा है कि अपच का मतलब क्या होता है.

स्वामी जी ने आगे कहा कि बिना किसी आलोचना के डर से खूब चावल और मछली खाइए. देश में उन अपच पीड़ित बाबाओं की बाढ़ आ गई है, जो सिर्फ सब्जियां खाते हैं. यह सत्व नहीं बल्कि गहरे तमस (मौत की छाया) का संकेत है. स्वामी विवेकानंद ने आगे कहा कि चेहरे पर चमक, दिल में उत्साह और जबरदस्त गतिविधि, ये सभी सत्व से उतपन्न होते हैं, जबकि आलस, सुस्ती और नींद तमस के लक्षण हैं. 

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शिष्य ने स्वामी विवेकानंद से आगे पूछा, क्या मांस-मच्छी खाने से शरीर में जुनून बढ़ जाता है?

स्वामी जी ने जवाब में कहा, "मैं यही चाहता हूं कि तुम्हारे अंदर जुनून हो. इस समय जुनून की सबसे ज्यादा जरूरत है.' स्वामी जी ने आगे कहा कि, जिन लोगों को आप सत्व गुण वाले व्यक्ति मानते हैं, उनमें से 90 फीसदी से ज्यादा गहरे तमस में डूबे हुए हैं. 

स्वामी जी ने आगे कहा कि इस धरती के लोगों को खाना खिलाना और कपड़े पहनाने होंगे, जागृत करना होगा और ज्यादा सक्रिय बनाना होगा. वरना ये लोग जड़ हो जाएंगे और पेड़ व पत्थरों की तरह बेजान रहेंगे. इसलिए मैं कहता हूं कि बड़ी मात्रा में मछली और मांस खाओ.

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