इस वर्ष देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को मनाई जाएगी. इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ भी हो जाएगा. धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु इस दिन चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं. इस अवधि में विवाह, मुंडन और जनेऊ जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं. चातुर्मास का समापन कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर होता है. इस दौरान साधना, भक्ति, संयम और धार्मिक अनुष्ठानों को विशेष महत्व दिया जाता है, जबकि सांसारिक आयोजनों से परहेज करने की परंपरा रही है.
चातुर्मास में क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?
धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जब भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं, तब विवाह, मुंडन, जनेऊ और अन्य शुभ संस्कारों का आयोजन नहीं किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस समय किए गए मांगलिक कार्यों को भगवान का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता है. इसलिए इन चार महीनों में लोग धार्मिक साधना, व्रत, पूजा और आत्मचिंतन पर अधिक ध्यान देते हैं.
वैज्ञानिक कारण भी समझिए
चातुर्मास का समय वर्षा ऋतु का होता है. प्राचीन काल में परिवहन और यात्रा की सुविधाएं सीमित थीं. बारिश के कारण रास्तों में जलभराव और आवागमन में कठिनाई होती थी. ऐसे में बड़े सामाजिक आयोजनों का संचालन आसान नहीं होता था. इसी वजह से विवाह जैसे कार्यक्रमों को टालने की परंपरा विकसित हुई. साधु-संत भी इस दौरान एक ही स्थान पर रहकर भजन, कीर्तन और आध्यात्मिक साधना करते थे.
कब से फिर शुरू होंगे विवाह?
देवशयनी एकादशी के साथ 25 जुलाई से विवाह के मुहूर्त समाप्त हो जाएंगे. इसके बाद अगले चार महीनों तक शादी-विवाह की शुभ तिथियां नहीं रहेंगी. देवउठनी एकादशी जो कि इस वर्ष 20 नवंबर को पड़ेगी, उसी दिन से भगवान विष्णु के जागरण के साथ मांगलिक कार्यों की शुरुआत फिर से होगी और विवाह के शुभ मुहूर्त उपलब्ध होने लगेंगे.
चातुर्मास में किस तीर्थ का विशेष महत्व?
धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान पृथ्वी के सभी प्रमुख तीर्थों का पुण्य ब्रजभूमि में प्राप्त हो सकता है. इसलिए इस अवधि में यदि कोई तीर्थयात्रा करना चाहता है, तो ब्रज क्षेत्र की यात्रा और दर्शन को विशेष फलदायी माना गया है. यही कारण है कि चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना और भगवान की भक्ति के लिए अत्यंत शुभ समय माना जाता है.
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