रियाद से लेकर दुबई तक, आसमान में मंडराते ड्रोंस और मिसाइलों ने अरब शासकों की नींद उड़ा दी है. ईरान की ओर से कहा गया है कि ये हमले उन्होंने अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों पर किए हैं, लेकिन जिस तरह से सिविल इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ साथ ऑयल और गैस इंडस्ट्री को टारगेट किया जा रहा है, वह किसी से छुपा नहीं है.
यूएई में मौजूद शारजाह, दुबई, अबू धाबी के हवाई अड्डों और होटलों को निशाना बनाया गया था. आज सोमवार दोपहर सऊदी अरब के तानुरा में मौजूद अरामको की ऑयल रिफाइनरी पर ईरानी हमले की खबर आई. कुछ देर बाद कतर के एक बड़े गैस प्लांट पर हमला किया गया. लेकिन इन तमाम हमलों के बावजूद एक सवाल जो दुनिया भर के जानकारों और आम लोगों के मन में है, वो यह कि आखिर ये अरब देश ईरान के खिलाफ सिर्फ 'कड़ी निंदा' के बयान क्यों दे रहे हैं? क्यों कोई बड़ा पलटवार अब तक नहीं हुआ है?
यूएई ने हाल ही में ईरान से अपने राजदूत को वापस बुला लिया है, लेकिन युद्ध की घोषणा नहीं की है. यूएई की तरह ही सऊदी अरब, कतर, बहरीन और कुवैत जैसे देश भी अपने यहां हमलों के बावजूद फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं. वे जानते हैं कि अगर आज उन्होंने गलती की, तो पूरे मध्य-पूर्व का नक्शा बदल सकता है.
खून का घूंट पीने के लिए अरब देश मजबूर क्यों हैं?
ईरानी हमलों के बावजूद अरब देशों की इस चुप्पी को कमजोरी समझना शायद सबसे बड़ी गलती होगी. दरअसल, इसके पीछे एक बहुत बड़ी बिसात बिछी है.
पहली और सबसे बड़ी चिंता 'इस्लामिक उम्मा' (मुस्लिम समुदाय) में बंटवारे की है. अगर अरब देश ईरान पर सीधा हमला करते हैं, तो यह सीधे तौर पर एक शिया-सुन्नी संघर्ष का रूप ले लेगा. ईरान बखूबी जानता है कि उसे कब 'कर्बला' की याद दिलानी है. ऐसे में अरब देशों का डर यह है कि कहीं वे अपनी ही जनता की नजरों में विलेन न बन जाएं.
दूसरी तरफ है अमेरिका और इजरायल के साथ इनके तालमेल की जटिलता. अरब देश यह नहीं चाहते कि वे सीधे तौर पर 'इजरायली मोहरे' या 'अमेरिकी कठपुतली' के रूप में देखे जाएं. मुस्लिम जगत में इजरायल के खिलाफ जो गुस्सा है, अरब शासक उससे वाकिफ हैं. खासतौर पर इजरायल के गाजा पर हमले के बाद मुस्लिम जगत के भीतर यही उम्मीद रही कि अरब देश अमेरिका और इजरायल के खिलाफ आवाज बुलंद करने में लीडरशिप लें. इसीलिए अब अरब देशों के नेतृत्व को डर है कि अगर उन्होंने इजरायल और अमेरिका संग मिलकर ईरान के खिलाफ कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई की, तो वे कट्टरपंथी संगठनों और आम जनता की नफरत का शिकार हो सकते हैं.
इसके अलावा, एक मास्टरमाइंड की तरह ईरान 'सहानुभूति कार्ड' खेल रहा है. ईरान बार-बार खुद को पश्चिमी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने वाला 'मसीहा' पेश करता है. यदि अरब देश उस पर हमला करते हैं, तो ईरान इसे 'अन्याय' और 'पश्चिम की गुलामी' का नाम देकर पूरे क्षेत्र में सहानुभूति बटोर लेगा. अरब देश ईरान को यह फायदा बिल्कुल नहीं देना चाहते.
क्या अरब देश हमेशा खामोश रहेंगे?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर ये देश कब तक सहेंगे? जवाब सीधा है- तब तक, जब तक 'रेड लाइन' पार न हो जाए.
आबादी पर बड़ा हमला: अभी तक ईरान के हमले काफी हद तक इन्फ्रास्ट्रक्चर और अमेरिकी सैन्य ठिकानों के आसपास केंद्रित हैं. जिस दिन कोई बड़ा नागरिक जनसंहार हुआ, अरब देशों की मजबूरी खत्म हो जाएगी और युद्ध का दायरा बदल जाएगा.
बड़े एसेट्स का विनाश: अरामको जैसी रिफाइनरी पर हमला एक चेतावनी है. अगर ऐसी और भी घटनाएं हुईं जिससे अरब देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ (तेल उत्पादन) पूरी तरह टूट जाए, तो उनके पास जवाबी हमले के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा.
अमेरिका की भूमिका: अरब देश अपनी सुरक्षा के लिए काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर हैं. अगर उन्हें लगा कि अमेरिका अब ईरान के खिलाफ कार्रवाई करने में आनाकानी कर रहा है या ढुलमुल रवैया अपना रहा है, तो वे खुद को अकेला महसूस करेंगे और अपनी रक्षा के लिए सख्त कदम उठाएंगे.
एयर डिफेंस फेल हो जाए: अगर मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम ईरान के आधुनिक ड्रोंस को रोकने में नाकाम रहने लगे, तो अरब देशों के लिए यह 'अस्तित्व की लड़ाई' बन जाएगी. तब वे 'निंदा' से आगे बढ़कर सीधे टकराव की राह चुन सकते हैं.
अरब देशों पर हमले के पीछे क्या है ईरान की रणनीति
ईरान की रणनीति साफ है, वो चाहता है कि अरब देश परेशान हों. अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित रहें. लेकिन सीधे जंग में न उतरें. वो उन्हें 'साइकोलॉजिकल वॉरफेयर' (मानसिक युद्ध) में उलझाए रखना चाहता है. ताकि आखिर में अरब देश ही अमेरिका को मजबूर करें कि वह सीजफायर घोषित करें. वहीं, अरब देश इस स्थिति को टालने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और कूटनीति के जरिए ईरान को घेरा जाए, न कि मिसाइलों के जरिए.
अरब देश जानते हैं कि ईरान को हराना आसान हो सकता है, लेकिन युद्ध के बाद जो आग पूरे क्षेत्र में फैलेगी, उसे बुझाना नामुमकिन होगा. फिलहाल गेंद ईरान के पाले में है. अगर ईरान ने अपने आक्रामक तेवर कम नहीं किए, तो हो सकता है कि कल तक 'निंदा' करने वाले ये देश अपनी सीमाओं और संपत्तियों की सुरक्षा के लिए 'बारूद' का इस्तेमाल करने पर मजबूर हो जाएं. तब तक, दुनिया बस सांस थामे देख रही है कि यह 'जंग-ए-खामोशी' कब और किस रूप में खत्म होती है.
धीरेंद्र राय