अप्रैल में देश के चार बड़े राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में चुनाव होने हैं. इनमें से तमिलनाडु और बंगाल से कांग्रेस को खास उम्मीद नहीं है, लेकिन असम और केरल में पिछले दस साल से वही प्रमुख चैलेंजर है. 2016 में केरल में बनी वामपंथियों की LDF सरकार ने परंपरा को तोड़ते हुए 2021 में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की, और वो पिछले 10 साल से सत्ता में रही. वहीं, असम में 15 साल सत्ता में रही कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार को उखाड़कर भाजपा ने वहां अपने पैर गहरे तक जमा लिए हैं. इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है. लेकिन, दिलचस्प है इन राज्यों में हुई कांग्रेस के सिपहसालारों की तैनाती. खासतौर पर केरल के वायनाड से सांसद प्रियंका गांधी को केरल के बजाय असम भेजा जाना.
प्रियंका गांधी असम में पिछले चुनाव में भी काफी सक्रिय देखी गई थीं. प्रियंका गांधी के साथ साथ छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार को सीनियर ऑब्जर्वर बनाया गया है. भूपेश बघेल 2021 में भी असम में प्रियंका गांधी के साथ थे, जो यूपी और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में साथ रहे हैं.
चुनावी राजनीति में स्क्रीनिंग कमेटी का काम हर विधानसभा सीट के लिए उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि, संगठन के प्रति उनकी निष्ठा, इलाके में लोकप्रियता को बारीकी से देखना होता है. दलबदल की आशंका को देखते हुए उम्मीदवारों की छंटनी का काम भी स्क्रीनिंग कमेटी के जिम्मे ही होता है. उम्मीदवारों के नाम फाइनल तो केंद्रीय चुनाव समिति ही करती है, लेकिन उम्मीदवारों के नाम स्क्रीनिंग कमेटी की तरफ से ही भेजे जाते हैं.
केरल में कैसी है कांग्रेस और प्रियंका की स्थिति...
1. हाल के स्थानीय चुनाव के नतीजे केरल में सत्ताधारी एलडीएफ के लिए भी चिंताजनक रहे, लेकिन कांग्रेस के लिए तो हैरान करने वाले थे. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन केरल में अच्छा होता है. लेकिन, तिरुवनंतपुरम नगर निगम में एनडीए सबसे बड़ा गठबंधन बनकर उभरा है. एनडीए को तिरुवनंतपुरम के 101 वार्डों में से 50 में जीत हासिल हुई है - जबकि वहां कांग्रेस के शशि थरूर ही सांसद हैं, जो बीजेपी के राजीव चंद्रशेखर को हराकर चुनाव जीते हैं.
2. केरल पर बीजेपी की इस बार खास नजर है. हर बार केरल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा रही है, लेकिन 2021 में पी. विजयन की वापसी के चलते अपवाद बन गया. स्थानीय चुनाव के नतीजे बीजेपी और कांग्रेस दोनों की उम्मीद की वजह बन रहे हैं. अगर केरल में कांग्रेस कुछ हासिल कर पाती है, तो 2025 में दिल्ली और बिहार से मिला दर्द कुछ कम हो सकता है.
3. 2024 में राहुल गांधी के रायबरेली लोकसभा सीट अपने पास रखने और वायनाड से इस्तीफा देने के बाद प्रियंका गांधी चुनाव लड़ीं, और जीतकर लोकसभा पहुंची हैं. अब जबकि प्रियंका गांधी केरल के ही वायनाड का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर रही हैं, असम का प्रभारी बनाया जाना थोड़ा अजीब लग रहा है.
4. 2021 के केरल चुनाव के दौरान राहुल गांधी के मछुआरों के साथ नाव पर और नदी में छलांग लगाते वीडियो काफी वायरल हुए थे. कांग्रेस वो चुनाव भले न जीत पाई हो, लेकिन पार्टी यह समझती है कि अन्य राज्यों की तुलना उसकी स्थिति यहीं सबसे मजबूत है.
केरल का कांग्रेसी कलेश, प्रियंका को दूरी
क्लेश- केरल में कांग्रेस संगठन के भीतर कई पावर सेंटर्स हैं. एक तरफ केसी वेणुगोपाल और उनके संगी साथी हैं तो दूसरी तरफ शशि थरूर जैसे 'फ्री रैडिकल'. जिनसे कांग्रेस हाईकमान को हमेशा शिकायत रही है. ऐसे में कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव से पहले चुनौती पार्टी के भीतर के हालात को दुरुस्त करने की होगी.
जीत की संभावना- राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि पिछले दस साल की एंटी इनकंबेंसी और भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते वामदलों वाली LDF सरकार की हालत कमजोर है. ऐसे में वोटरों के पास कांग्रेस ही सबसे बड़ा विकल्प होगी. केरल की चुनावी संभावनाओं को देखते हुए कांग्रेस के भीतर भी यह मंथन तो हुआ ही होगा कि वह अपनी जीत को कैसे आत्मसात करना चाहेगी.
प्रियंका को क्रेडिट- कांग्रेस के लिए केरल में बड़ी चुनौती होगी निर्विवाद रूप से उम्मीदवारों में टिकट का बंटवारा. ऐसा नहीं है कि प्रियंका गांधी केरल में यह रोल नहीं निभा सकती हैं. बल्कि उन्होंने देशभर में पार्टी के भीतर उपजे ऐसे कई संकटों का समाधान किया भी है. लेकिन, केरल जैसे अति महत्वपूर्ण राज्य में सारे सूत्र राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल ने अपने हाथ ही रखे. प्रियंका यदि केरल के मैदान में होंगी, तो उन्हें सेंट्रल रोल निभाने से कोई रोक नहीं पाता.
दिलचस्प है केरल में मधुसूदन मिस्त्री की नियुक्ति
जैसी जिम्मेदारी असम में प्रियंका गांधी को सौंपी गई है, उसी भूमिका को केरल में मधुसूदन मिस्त्री निभाएंगे. गुजरात में जन्मे 81 वर्षीय मिस्त्री केरल की स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन होंगे. उन्हें कांग्रेस पार्टी के भीतर 'टीएन शेषन' कहा जाता है. ये नाम उन्हें पार्टी के भीतर निष्पक्ष चुनाव कराने में उनकी निपुणता के कारण मिला है. खड़गे बनाम शशि थरूर वाले कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में भी निर्वाचन अधिकारी वे ही थे. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि केरल जैसे संवेदनशील राज्य में मिस्त्री की तैनाती क्यों हुई है. मिस्त्री को केरल का प्रभारी बनाने के कई लाभ हैं. वे केरल के नहीं हैं, इसलिए उनके प्रति स्थानीय नेताओं का लगाव-दुराव नहीं होगा. वरिष्ठ और तटस्थ की छवि होने के नाते उनके फैसलों पर सवाल नहीं होंगे. और यदि मिस्त्री से कोई गलती हुई भी तो राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल जैसे नेता 'अपील कोर्ट' की भूमिका निभा पाएंगे. और यही सब प्रियंका गांधी के साथ होना मुश्किल था.
प्रियंका गांधी को अब तक मिली चुनावी जिम्मेदारियां
2019 में कांग्रेस में औपचारिक एंट्री मिलने और महासचिव बनाए जाने से पहले प्रियंका गांधी अमेठी और रायबरेली में चुनाव कैंपेन की जिम्मेदारी संभालती आ रही थीं. कांग्रेस महासचिव बनाए जाने के बाद प्रियंका गांधी को पहली बार औपचारिक रूप से यूपी चुनाव में राज्य के एक हिस्से का प्रभारी बनाया गया था.
1. 2017 में मालूम हुआ कि रायबरेली और अमेठी के अलावा सुल्तानपुर का चुनाव कैंपेन भी प्रियंका गांधी के ही अधिकार क्षेत्र में आता है. तब प्रियंका गांधी के चचेरे भाई वरुण गांधी वहां के सांसद हुआ करते थे. ये बात तब मालूम हुई जब यूपी में कांग्रेस का चुनाव कैंपेन संभाल रहे प्रशांत किशोर को अमेठी और रायबरेली के साथ साथ सुल्तानपुर को भी स्किप कर देने का इशारा किया गया.
2. 2019 के आम चुनाव में प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का कांग्रेस प्रभार दिया गया था, लेकिन राहुल गांधी का अमेठी से चुनाव हार जाना भी प्रियंका गांधी के खाते में ही दर्ज हो गया. 2019 में राहुल गांधी वायनाड सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे.
3. 2021 के असम विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी अघोषित जिम्मेदारी निभा रही थीं. चुनाव कैंपेन के दौरान उनको चाय बागानों में जाकर मजदूरों से बात करते भी देखा गया था. लेकिन, कांग्रेस छोड़कर ही बीजेपी में गए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने प्रियंका गांधी के हर संभावित प्रभाव को बेअसर कर दिया.
4. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव की पूरी जिम्मेदारी प्रियंका गांधी के पास ही थी, और वो अपने तरीके से चुनाव में कई प्रयोग भी कर रही थीं. कांग्रेस दो ही सीटें जीत पाई थी, जिसमें तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की हार भी शुमार थी.
5. 2022 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी प्रियंका गांधी को असम की तरह ही सक्रिय देखा गया, लेकिन नतीजे अलग रहे. कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया, और सुखविंदर सिंह सुक्खू मुख्यमंत्री बने.
मृगांक शेखर