भारत ने आखिरकार एक ऐसे खेल में महारत हासिल कर ली है जिसके लिए न तो किसी स्टेडियम की जरूरत है, न रेफरी की और न ही फैंस की. ऐसा इसलिए, क्योंकि दर्शकों, जो वोटर भी हैं, को जानबूझकर इस स्टेडियम से बाहर रखा जाता है. आप इसे भारतीय राजनीति का आईपीएल (IPL) यानी 'इन्क्रेडिबल पोचिंग लीग' (खरीद-फरोख्त की अनोखी लीग) कह सकते हैं. इस लीग में 'ट्रांसफर विंडो' हमेशा खुली रहती है.
खबर है कि शिवसेना (यूबीटी) के नौ में से छह सांसदों से संपर्क नहीं हो पा रहा है. भारतीय राजनीति की भाषा में यह एक शालीन तरीका है ये कहने का कि वे 'बहुत ज्यादा' संपर्क में हैं, बस अपने पुराने मालिक के संपर्क में नहीं हैं. ऐसा लगता है कि संजय राउत के लंबे-चौड़े भाषणों के मुकाबले उन्हें एक चार्टर्ड एयरक्राफ्ट ज्यादा दमदार और भरोसेमंद लगा. राउत, जो इतनी बार खतरे का अलार्म बजा चुके हैं कि खुद अपनी ही आवाज से थक गए होंगे, उनका दावा है कि इस खेल में प्रति सांसद 'रेट' 50 करोड़ रुपये है, जिसमें से 15 करोड़ रुपये का एडवांस रात होने तक पहुंचा दिया जाता है. उनका कहना है कि सांसदों ने तब तक विमान में बैठने से मना कर दिया जब तक कि कैश नहीं आ गया.
तो, आजकल के बोर्डिंग पास ऐसे दिखते हैं: आधा पैसा एडवांस में और ईमान चेक-इन लगेज में. आईपीएल (IPL) में इसे 'रिटेंशन फीस' कहा जाता, लेकिन यहां हम इसे एक 'रहस्य' कहते हैं.
उधर, TMC के लगभग 20 सांसदों ने (अभी सस्पेंस है कि यह गिनती 20 के पार है या कम) अपने बंगाली कारोबारी अंदाज में दलबदल नहीं किया. उन्होंने तो बस 'नेशनल सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) नाम की एक पार्टी के साथ खुद का 'मर्जर' (विलय) कर लिया. यह पार्टी इतनी अनजान और गुमनाम है कि इसका शॉर्ट फॉर्म NCPI किसी सरकारी दफ्तर के उस फॉर्म जैसा लगता है जिसे भरने के बाद कभी कोई जवाब नहीं आता. हम सब जानते हैं कि सारी नदियां समंदर में जाकर मिलती हैं. लेकिन इस बार एक समंदर ही नदी में समा गया. त्रिपुरा की सोच और हावड़ा में हेडक्वार्टर वाली यह NCPI पार्टी असल में सांसदों के लिए एक 'ट्रांजिट लाउंज' है, जहां वे एक विचारधारा से दूसरी विचारधारा में जाने के दौरान कुछ देर रुकते हैं. एविएशन (विमानन) की भाषा में यह एक 'टेक्निकल स्टॉपओवर' है, IPL की भाषा में यह 'प्लेयर ट्रेडिंग' है और लोकतांत्रिक भाषा में एक विडंबना.
इस NCPI वाले दांव की खूबसूरती इसकी संवैधानिक चतुराई में है. आप रातों-रात अपनी सीट 'कट्टर आई हेट हिंदुत्वा' से 'आई लव हिंदुत्वा' वाली लाइन में नहीं बदल सकते. इसलिए सबसे बढ़िया तरीका यह है कि खुद को किसी अनजान क्षेत्रीय पार्टी में पार्क कर लो, जो तुरंत ही सत्ताधारी गठबंधन के लिए अपने अटूट प्यार का ऐलान कर दे. यह कुछ ऐसा है जैसे उसने अपना फेसबुक स्टेटस बदलकर दिया हो— "इट्स कॉम्प्लिकेटेड, बट NDA इज वेरी सपोर्टिव."
1967 के हरियाणा का 'आया राम, गया राम' दौर तो इसके सामने बहुत सीधा-साधा था. गया लाल ने पंद्रह दिनों में तीन बार पाला बदला था. तब उन्हें मंत्री पद के अलावा किसी ने कुछ खास नहीं दिया था. वे धोखेबाजी के बड़े सीधे-सादे और मासूम दिन थे, जब ट्रांसफर मार्केट में सिर्फ 'बार्टर इकोनॉमी' यानी लेन-देन पर चलता था. आज का दलबदल एक बकायदा 'स्ट्रक्चर्ड फाइनेंशियल प्रोडक्ट' है, जिसमें एडवांस पेमेंट है, मंथली रिटेनरशिप है और शायद साथ में एक GST इनवॉइस भी होता होगा जिस पर लिखा हो- "देश के लिए दी गईं प्रोफेशनल सर्विसेज."
दुनिया की हर स्पोर्ट्स लीग अपनी ट्रांसफर फीस को जगजाहिर करती है. IPL करोड़ों लोगों के सामने एक बड़ी स्क्रीन पर हर खिलाड़ी की नीलामी कीमत (ऑक्शन प्राइस) दिखाता है. आईएसएल (ISL), प्रीमियर लीग, प्रो कबड्डी— ये सभी इस बात को लेकर ईमानदार हैं कि एक फ्रैंचाइजी खिलाड़ी की सेवाओं के लिए कितना पैसा दे रही है. लेकिन यहां, पूरे देशप्रेम के भाषणों और संजीदगी के साथ 1985 में पास किया गया 'दलबदल विरोधी कानून' यमुना एक्सप्रेसवे पर लगे 'स्पीड-लिमिट' के बोर्ड जितना ही असरदार साबित हुआ है. इस कानून ने बस इतना किया कि फुटकर दलबदल पर रोक लगा दी और थोक दलबदल को जरूरी बना दिया. हर बार जब संसद ने कानून का कोई लूपहोल बंद किया, नेताओं ने दो नए रास्ते ढूंढ निकाले.
अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ आ जाएं, तो वे मर्जर करके आराम से निकल सकते हैं. दलबदल करने से पहले इस्तीफा दे दो, तो आप पाक-साफ हैं. किसी 'ट्रांजिट पार्टी' में शामिल हो जाओ, तो आप बिल्कुल पवित्र हैं. ये नियम खुद राजनेताओं ने बनाए हैं, जो बिल्कुल वैसा ही है जैसे कुख्यात तस्कर संसार चंद से वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन पॉलिसी ड्राफ्ट करने के लिए कह दिया जाए.
शेयर मार्केट हर ट्रांजैक्शन को रियल टाइम में पब्लिश करता है. प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री पब्लिक रिकॉर्ड होती है. यहां तक कि आपके पड़ोसी के बिजली का बिल भी RTI के तहत देखा जा सकता है. IPL कुछ ही घंटों में पूरी ऑक्शन लिस्ट जारी कर देता है. लेकिन जनता द्वारा चुने गए एक प्रतिनिधि की आत्मा की क्या कीमत लगी, उसे किन अनजान लोगों ने और किस अज्ञात सोर्स के पैसे से खरीदा, यह एक 'स्टेट सीक्रेट' है.
हमने एक लंबे संघर्ष के बाद आजादी पाई और दशकों तक लोकतंत्र को संवारा, लेकिन आज जो हालात हैं, उसमें हमारा लोकतंत्र खतरे में है. वोटर, जो इस लोकतंत्र का असली फ्रैंचाइजी मालिक है, जो अपने टैक्स से इन सांसदों की सैलरी देता है, जो इतनी भीषण गर्मी में पोलिंग बूथ तक चलकर जाता है और बटन दबाता है, उसे इस पूरे खेल की कोई जानकारी नहीं मिलती.
इसलिए मेरी एक छोटी सी मांग है. मैं हॉर्स ट्रेडिंग (सांसदों की खरीद-फरोख्त) को पूरी तरह खत्म करने की मांग नहीं कर रहा, क्योंकि इसकी उम्मीद उतनी ही है जितनी घोड़ों द्वारा अस्तबल खत्म करने की, और हमें एक 'स्टेबल' लोकतंत्र की जरूरत है. मैं तो बस एक 'रेट कार्ड' चाहता हूं. एक ऐसा रेट कार्ड जो सार्वजनिक रूप से दिखाई दे, जिसका ऑडिट हो, जो SEBI द्वारा रेगुलेटेड हो और जीएसटी GST के दायरे में आता हो. इसे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर डाल दिया जाए और हर तिमाही में अपडेट किया जाए.
इसमें बकायदा कैटेगरी होनी चाहिए: राज्यसभा सांसद, लोकसभा सांसद, राज्य के विधायक (MLA) और नगर निगम के पार्षद. और हां, जब आप एक साथ किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायकों को खरीदें, तो 'बल्क डिस्काउंट' का भी जिक्र हो. कृपया 'एंड ऑफ सीजन सेल' की घोषणा पहले से कर दी जाए. यदि ‘प्रीमियम’ दिया जाए, तो वह भी बताया जाए कि क्यों दिया गया. यह भी साफ-साफ बताया जाए कि चार्टर्ड फ्लाइट का खर्चा इसी में शामिल है या उसका बिल अलग से आएगा.
वोटर ने तो अपना वोट एक बिरयानी, एक बोतल, एक साड़ी, या 'लाडला भाई' और 'लाडली बहना' जैसी जो भी स्कीम या रेट चल रहा था, उसके बदले बेच दिया. उसे उस सौदे की पूरी जानकारी थी. लेकिन नेता ने अपना वोट, जो कि असल में हजारों-लाखों वोटर्स के वोटों का जोड़ है, उसे करोड़ों रुपये में बेच दिया. यह भी एक सौदा ही है, लेकिन यह 'टॉप सीक्रेट' है. ऐसा कैसा चलेगा! तानाशाही नहीं चलेगी, पर्देदारी नहीं चलेगी!
एक लोकतंत्र में, ऐसी इकलौती कीमत जिसके बारे में कभी खुलकर चर्चा नहीं होती, वो लोकतंत्र की कीमत खुद है. बिकती हुई आत्माओं पर भी RTI लागू हो- मैं बस यही मांग रहा हूं.
कमलेश सिंह