मुद्दा बिल्कुल अलग था, और मौका भी. लेकिन, निशाना एक ही रहा. संसद के बाहर ममता बनर्जी, और सदन में राहुल गांधी. आपसी मतभेदों के बावजूद, दोनों का राजनीतिक निशाना एक ही नजर आया. केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो दोनों के निशाने पर थे, लेकिन ममता बनर्जी के निशाने पर चुनाव आयोग भी रहा. राहुल गांधी भी पहले 'वोट चोर, गद्दी छोड़' नारा लगा रहे थे, लेकिन अब वो उससे आगे बढ़ चुके हैं.
संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा होनी थी. बजट को लेकर कहने के लिए दोनों नेताओं के पास कुछ नया नहीं था. संसद में भी, और सड़क पर भी. जो बातें थीं, वे पहले ही रखी जा चुकी थीं. ममता बनर्जी और राहुल गांधी के बीच राजनीतिक मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं. सत्ता की राजनीति को लेकर भी और बंगाल में कांग्रेस की भूमिका को लेकर भी.
राहुल गांधी ने तो सिर्फ राजनीतिक बयानों के जरिए विरोध जताया, लेकिन ममता बनर्जी ने तो शाल भी काले रंग का लिया हुआ था, अभिषेक बनर्जी भी ब्लैक ड्रेस में थे - और चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचे SIR से प्रभावित तृणमूल कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल में शामिल आम लोग भी.
एक अधूरी बैठक, और आरोप-प्रत्यारोप का दौर
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की. और, मीटिंग बीच में ही छोड़कर अपनी पूरी टीम के साथ बाहर आ गईं, करीब करीब वैसे ही जैसे नीति आयोग की बैठक छोड़कर निकल जाती रही हैं.
बताते हैं, शुरू में बैठक काफी सकारात्मक लग रही थी, लेकिन अचानक ममता बनर्जी ने टेबल पर हाथ मारा और बैठक छोड़कर बाहर निकल गईं. मीडिया से बातचीत में चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी ने तीखा हमला किया. चुनाव आयोग की तरफ से भी ममता बनर्जी पर दुर्व्यवहार का इल्जाम लगाया गया है.
चुनाव आयोग के साथ बैठक में ममता बनर्जी के साथ अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी के साथ वे परिवार भी मौजूद थे, जो SIR प्रक्रिया से प्रभावित बताए जा रहे हैं. ममता ने मीडिया से बातचीत में बताया कि उनकी शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया गया, इसलिए प्रतिनिधिमंडल ने बैठक के बहिष्कार का फैसला किया.
ममता बनर्जी बोलीं, चुनाव आयोग ने हमारा अपमान किया... हमारी बात नहीं सुनी, इसलिए हम बैठक छोड़कर बाहर आ गए.
SIR प्रक्रिया यानी विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर ममता बनर्जी ने ये भी आरोप लगाया कि ये सिर्फ चुनाव वाले राज्यों में ही की जा रही है. ममता बनर्जी ने सवाल उठाया है, असम जैसे राज्यों में, जहां बीजेपी की सरकार है वहां SIR नहीं किया गया, लेकिन पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में किया जा रहा है.
थोड़ा भावुक होते हुए ममता बनर्जी ने बताया कि अपने लंबे राजनीतिक जीवन में चुनाव आयोग का ऐसा व्यवहार कभी नहीं देखा. ममता बनर्जी ने कहा कि वो संस्था का सम्मान करती हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है.
ममता बनर्जी का कहना था, मैं बहुत दुखी हूं. मैं दिल्ली की राजनीति में लंबे वक्त से सक्रिय हूं. मैं चार बार मंत्री और सात बार सांसद रह चुकी हूं. मैंने आज तक ऐसा अहंकारी और झूठा चुनाव आयुक्त नहीं देखा. मैंने उनसे कहा कि मैं आपकी कुर्सी का सम्मान करती हूं, क्योंकि कोई भी कुर्सी हमेशा के लिए नहीं रहती. एक दिन तो आपको जाना ही होगा... बंगाल को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?
सूत्रों के हवाले से चुनाव आयोग के साथ हुई बैठक के अंदर से अलग खबर आ रही है. चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त पूरे धैर्य के साथ सभी सवाल सुन रहे थे, 'लेकिन ममता बनर्जी को गुस्सा आ गया, मेज पर हाथ मारा और बिना जवाब सुने बैठक छोड़कर चली गईं.'
चुनाव आयोग का यहां तक कहना है कि ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाब देने तक का मौका नहीं दिया. एक अधिकारी के हवाले से आई रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि तृणमूल कांग्रेस के विधायक आयोग खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ खुलेआम अपमानजनक और धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं.
SIR विरोध पर ममता बनर्जी और राहुल गांधी के स्टैंड में फर्क
पश्चिम बंगाल से पहले SIR प्रक्रिया बिहार में हुई थी, और तगड़ा विरोध भी. बिहार में विरोध का नेतृत्व राहुल गांधी ने किया था, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कर रही हैं. बिहार में तेजस्वी यादव एसआईआर विरोध के मामले में राहुल गांधी के पीछे नजर आए थे. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने एसआईआर के बिहार में वोटर अधिकार यात्रा भी निकाली थी.
वोटर अधिकार यात्रा में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के साथ बिहार में महागठबंधन के नेता भी साथ चल रहे थे. बिहार के बाहर से अखिलेश यादव से लेकर एमके स्टालिन तक इंडिया ब्लॉक के बिहार से बाहर के नेताओं ने भी हिस्सा लिया था - लेकिन बिहार चुनाव में एसआईआर विरोध का कोई प्रभाव नहीं देखने को मिला. नतीजे आए तो एनडीए दो सौ के पार, और विपक्ष 25 सीटों पर सिमट चुका था.
एसआईआर के विरोध के मामले में ममता बनर्जी और राहुल गांधी के स्टैंड में भी बड़ा फर्क दिखाने को मिलता है. ममता बनर्जी शुरू से ही पश्चिम बंगाल पर फोकस हैं, लेकिन राहुल गांधी कर्नाटक और दूसरे राज्यों के चुनावों से केस स्टडी पेश कर रहे थे. चुनाव बिहार में हो रहे थे, लेकिन राहुल गांधी वोट चोरी को राष्ट्रीय मुद्दे के तौर पर पेश कर रहे थे. बाद में हालत यह हो गई थी कि चुनाव कैंपेन के दौरान अकेले राहुल गांधी को ही एसआईआर पर बोलते देखा और सुना गया. 'वोट चोरी' का नारा भी वो 'सूट बूट की सरकार' की तरह ही अकेले लगा रहे थे.
ममता बनर्जी शुरू से ही अपने एजेंडे पर फोकस हैं. चाहे सड़क पर उतरना हो. चाहे अदालत जाना हो. चाहे चुनाव आयोग को पत्र लिखना हो. ममता बनर्जी एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त से मिल भी रही हैं, और सुप्रीम कोर्ट में भी अपनी शिकायतों के साथ याचिका दायर कर रही हैं.
चुनाव आयोग के दफ्तर में अकेले नहीं जातीं, बल्कि पूरे सदल बल के साथ पहुंचती हैं. चुनाव आयोग पहुंचे टीएमसी प्रतिनिधिमंडल में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी, सांसद कल्याण बनर्जी और SIR प्रक्रिया से प्रभावित 12 परिवारों के सदस्य भी शामिल होते हैं. जो 12 लोग पहुंचते हैं, उनमें 5 ऐसे वोटर हैं जिन्हें मृत घोषित करके वोटर लिस्ट से उनका नाम हटा दिया गया है. पांच ऐसे परिवारों के सदस्य हैं, जिनकी SIR नोटिस मिलने के बाद मौत हो गई थी - और 3 ऐसे परिवारों के सदस्य भी जिनके घर के बीएलओ की कथित रूप काम के दबाव के कारण मौत हो चुकी है.
मृगांक शेखर