ममता, माया, जया... भारतीय राजनीत‍ि की 3 देव‍ियां, तीनों की पार्टी रसातल में क्‍यों?

भारतीय राजनीति की तीन सबसे तेजतर्रार नेता- ममता बनर्जी, मायावती और जयललिता. तीनों की पैनी सियासत ने नई सदी में देश के विमर्श को नई दिशा दी. लेकिन, अब इन तीनों की विरासत संघर्ष करती दिख रही है. जिसमें काफी हद तक कसूर इनकी लीडरशिप का भी है.

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ममता, माया और जया की पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट आ गया है. (फोटो - AI generated) ममता, माया और जया की पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट आ गया है. (फोटो - AI generated)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2026,
  • अपडेटेड 10:41 AM IST

जब भारत ने 21वीं सदी की दहलीज पर कदम रखा था, तब देश की राजनीति में एक क्रांतिकारी बदलाव आकार ले रहा था. पुरुषों के वर्चस्व वाली भारतीय सियासत के फलक पर तीन महिला नेत्रियां पूरे दमखम के साथ दमक थीं. दक्षिण में जे. जयललिता, उत्तर में मायावती और पूर्व में ममता बनर्जी. इन तीनों के राजनीतिक मिजाज में गजब की आक्रामकता थी, तेवरों में वैचारिक कड़वाहट और जन-आकर्षण का एक अनूठा संगम था. इनके पास अपने-अपने राज्यों में एक ऐसा समर्पित मतदाता वर्ग था, जो उनके एक इशारे पर राजनीतिक फिजा बदलने की कूवत रखता था.

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अटल बिहारी वाजपेयी सरकार वाले दौर में इन्हें भारतीय राजनीति की 'तीन देवियां' कहा गया. यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस दौर की सत्ता की सच्चाई थी. दिल्ली के तख्त पर कौन बैठेगा, किसकी सरकार बचेगी और किसकी गिरेगी, इसका रिमोट कंट्रोल काफी हद तक इन्हीं तीनों नेताओं के हाथों में था. जयललिता ने एक बार चाय की चुस्की लेते हुए केंद्र सरकार गिरा दी थी, मायावती ने अप्रत्याशित पाला बदलकर इतिहास की धारा मोड़ दी थी, और ममता बनर्जी की सहमति के बिना रेल मंत्रालय का पत्ता तक नहीं हिलता था.

लेकिन 21वीं सदी की पहली सिल्वर जुबली होते होते समय का चक्र पूरी तरह घूम चुका है. जो राजनीतिक दल कभी क्षेत्रीय अस्मिता और वंचितों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा प्रतीक थे, वे आज या तो इतिहास के पन्नों में सिमट रहे हैं या फिर अपने अस्तित्व को बचाने के लिए अंतिम संघर्ष कर रहे हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि 'वन-वुमेन आर्मी' कहलाने वाली इन नेताओं के साम्राज्य भरभराकर ढह गए? क्यों इन तीनों की पार्टियां आज राजनीतिक रसातल की ओर अग्रसर हैं?

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'वन-वुमेन आर्मी', लेकिन आंतरिक लोकतंत्र नदारद

इन तीनों नेताओं की सबसे बड़ी ताकत और बाद में उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वे अपनी पार्टियों में 'सुप्रीमो' थीं. उन्होंने किसी स्थापित राजनीतिक खानदान की बैसाखी के बिना, केवल अपने जुझारूपन से यह मुकाम हासिल किया था. जयललिता ने एमजीआर (MGR) की विरासत को संभालने के लिए अपनों और बेगानों, दोनों से लंबी लड़ाई लड़ी. तमिलनाडु की सड़कों पर उनके साथ जो अभद्रता हुई, उसे उन्होंने एक चुनौती की तरह लिया और AIADMK को राज्य की सबसे मजबूत कैडर आधारित मशीनरी में बदल दिया.

उत्तर प्रदेश में मायावती ने कांशीराम के 'बहुजन आंदोलन' को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया. एक दलित की बेटी का मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना भारतीय लोकतंत्र की सबसे क्रांतिकारी घटनाओं में से एक था. उन्होंने नौकरशाही को एक नई दिशा दी और एक ऐसा संगठन खड़ा किया, जहां 'बहनजी' का आदेश ही अंतिम कानून था. वहीं, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने वह कर दिखाया जो समकालीन राजनीति में असंभव माना जाता था. उन्होंने 34 वर्ष के अजेय और सांगठनिक रूप से क्रूर वामपंथी शासन को सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों के बल पर उखाड़ फेंका.

इन तीनों नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में पूर्ण बहुमत की सरकारें बनाईं और उन्हें कड़े नियंत्रण के साथ चलाया. परंतु इस सफलता के पीछे एक बड़ी खामी भी ताकतवर होती चली गई. इन दलों में संगठन का पर्याय केवल 'एक चेहरा' बन गया था. पार्टी सुप्रीमो. जब तक इन नेताओं का जादुई असर रहा, पार्टियां चलती रहीं, लेकिन जैसे ही नेतृत्व पर संकट आया, पूरी संगठन ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा.

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पावर सेंटर, लेकिन आरोपों की कालिख में

जब ये नेत्रियां अपनी सियासत के चरम पर थीं, तब वे धीरे-धीरे भ्रष्टाचार, कुशासन और पावर सेंट्रलाइजेशन के आरोपों से घिरती चली गईं. जयललिता के कार्यकाल में आय से अधिक संपत्ति के मामलों ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं. उनकी सहेली शशिकला और उनके परिवार का सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप इस कदर बढ़ा कि जनता के बीच एक नकारात्मक संदेश गया. न्यायिक प्रक्रियाओं और कारावास ने जयललिता के अंतिम वर्षों को राजनीतिक रूप से काफी कमजोर कर दिया.

उत्तर प्रदेश में मायावती पर भी आइडियालॉजी से भटकने के आरोप लगे. ताज कॉरिडोर घोटाला हो या स्मारकों में मूर्तियों की स्थापना का विवाद, इन सबने मायावती की छवि को एक 'मिशनरी नेता' के बजाय एक 'वैभवशाली शासक' के रूप में स्थापित किया. पार्टी में टिकटों की कथित खरीद-फरोख्त के आरोपों ने उस समर्पित कैडर को निराश किया, जो कभी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए निस्वार्थ भाव से लगा हुआ था.

ममता बनर्जी की कहानी और भी विरोधाभासी है. उन्होंने वामपंथ के कुशासन को समाप्त करने का संकल्प लिया था, परंतु सत्ता में आने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर उसी हिंसक राजनीतिक मॉडल और सिंडिकेट राज को अपनाने के आरोप लगे. शारदा चिटफंड, नारदा स्टिंग और हालिया शिक्षक भर्ती घोटालों ने पार्टी की साख को गंभीर नुकसान पहुंचाया. संदेशखाली जैसी घटनाओं ने ममता बनर्जी के सबसे मजबूत आधार महिला वोटर को झकझोर कर रख दिया. जब राज्य सरकार इन मामलों में घिरे अपने नेताओं का बचाव करती दिखी, तो जनता का मोहभंग हो गया.

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उत्तराधिकार का संकट, पारिवारिक हस्तक्षेप

इन तीनों नेताओं के राजनीतिक जीवन में एक और समानता थी. तीनों अविवाहित रहीं और उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह राजनीति को समर्पित कर दिया. परंतु इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि इन पार्टियों के भीतर कोई स्वाभाविक उत्तराधिकारी तैयार नहीं हो सका. चूंकि संगठन का आकार बहुत व्यापक हो चुका था, इसलिए इन्हें किसी न किसी 'नंबर 2' यानी संकटमोचक पर निर्भर रहना पड़ा. विडंबना यह रही कि जिन पर भी भरोसा किया गया, वहां से वफादारी के बजाय विवाद और आंतरिक कलह ही उत्पन्न हुई.

किस ओर बढ़ रही है विरासत

जयललिता के निधन के बाद AIADMK जिस तरह गुटबाजी में बंटी, उससे जनता का पार्टी से मोहभंग हो गया. आज स्थिति यह है कि जयललिता की मृत्यु के लगभग एक दशक बाद पार्टी तमिलनाडु में तीसरे स्थान पर खिसक गई है. और पार्टी के टूटने का सिलसिला थमा नहीं है. अन्नाद्रमुक की राजनीतिक जमीन अब तमिल सिनेमा के अभिनेता विजय की नई पार्टी 'TVK' और परंपरागत प्रतिद्वंद्वी DMK के बीच बंटती नजर आ रही है.

उत्तर प्रदेश में 2012 के बाद से बहुजन समाज पार्टी लगातार हाशिए पर है. भाजपा ने अपनी कुशल 'सोशल इंजीनियरिंग' के माध्यम से गैर-जाटव दलितों को अपने पाले में कर लिया, जबकि बचे हुए दलित मतों पर अब समाजवादी पार्टी और चंद्रशेखर आजाद की 'आजाद समाज पार्टी' ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. नतीजा, बसपा एक गहरे राजनीतिक शून्य की ओर अग्रसर है, जहां भाई और भतीजे के इर्द-गिर्द सिमटी पार्टी राजनीति कैडर को कोई ठोस वैचारिक दिशा देने में विफल हो रही है.

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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार के जाते ही उनकी पार्टी TMC की दीवारें दरकने लगी हैं. अभिषेक बनर्जी के दबदबे के कारण पार्टी के पुराने और वफादार नेताओं में तीव्र असंतोष है. सत्ता विरोधी लहर और आंतरिक कलह का सीधा लाभ भाजपा ने खूब उठाया, जिसने ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों में तृणमूल के पारंपरिक जनाधार में बड़ी सेंध लगाई है. गंभीर आरोपों और जांच के घेरे में आई तृणमूल आज अलग-थलग पड़ रही है.

तीनों दलों की दो बुनियादी भूलें

पहला, इन्होंने अपनी पार्टियों को एक लोकतांत्रिक संस्था बनाने के बजाय 'व्यक्ति-केंद्रित कल्ट' में तब्दील कर दिया. दूसरा, इन्होंने अपने प्रभाव को बचाए रखने के डर से कभी भी दूसरी कतार का मजबूत नेतृत्व पनपने नहीं दिया. इसके अलावा, ये पार्टियां 21वीं सदी के बदलते मतदाता की आकांक्षाओं को पढ़ने में भी विफल रहीं, जो अब केवल अस्मिता या भावुकता के नाम पर नहीं, बल्कि सुशासन, रोजगार और पारदर्शिता के आधार पर मतदान करता है.

इतिहास साक्षी है कि समय की नब्ज को न पहचानने वाले राजनीतिक दलों को समय कभी क्षमा नहीं करता. महिला नेताओं को भी कोई रियायत नहीं है. इन तीन देवियों और उनके दलों का यह हश्र देश के अन्य तमाम क्षेत्रीय दलों के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि यदि उन्होंने समय रहते अपने भीतर आंतरिक लोकतंत्र और ईमानदारी को बहाल नहीं किया, तो इतिहास के पन्नों में सिमट जाना ही उनकी नियति होगी.

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