मनरेगा के मुद्दे पर कर्नाटक में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच विवाद गहरा गया है. 20 जनवरी को ऐसा ही विवाद तमिलनाडु में भी हुआ था, जब राज्यपाल अभिभाषण पूरा किए बगैर ही सदन से बाहर चले गए थे. राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच विवाद का ऐसा नमूना केरल और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में देखा जा चुका है.
विधानसभा के बजट सत्र में 22 जनवरी को राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कर्नाटक सरकार की तरफ से तैयार अभिभाषण का कुछ हिस्सा पढ़ने से इनकार कर दिया, और सदन से चले गए. विवाद की वजह बना है मनरेगा के मुद्दे पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का स्टैंड, जो राज्यपाल को मंजूर नहीं था.
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्यपाल के कदम को असंवैधानिक बताया है. सिद्धारमैया ने कहा, कैबिनेट ने जिस भाषण को मंजूरी दी थी, उसे न पढ़कर राज्यपाल ने संविधान का उल्लंघन किया है... वो केंद्र सरकार के टूल के रूप में काम कर रहे हैं... हम इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार करेंगे.
'लोकभवन बनाम राज्य सरकार' के चले आ रहे विवाद पर हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की थी. एमके स्टालिन का कहना है कि उनकी पार्टी संविधान में संशोधन करने का प्रयास करेगी, ताकि साल के शुरू में विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण को अनिवार्य बनाने वाले प्रावधानों को हटाया जा सके.
केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह नया कानून ला दिया है, वीबी जी राम जी यानी विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण). कांग्रेस नए कानून का विरोध कर रही है. राहुल गांधी तो अभी अभी अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली दौरे में मनरेगा बचाओ चौपाल में भी शामिल हुए थे - और कांग्रेस की तरफ से इसे लेकर मुहिम भी चलाई जा रही है - कर्नाटक में कांग्रेस की ही सरकार है, ऐसे में राज्यपाल के साथ ये टकराव तो स्वाभाविक ही है.
कर्नाटक में क्या हुआ है
कर्नाटक सरकार ने अभिभाषण का ड्राफ्ट राज्यपाल के पास भेजा था, लेकिन उनके कार्यालय ने विवादित अंश ड्राफ्ट से हटाने की सलाह के साथ लौटा दिया था. रिपोर्ट के मुताबिक, अभिभाषण में 11 पैराग्राफ ऐसे थे जिन पर राज्यपाल को आपत्ति थी.
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्यपाल के पास अपने कानून और संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल के साथ एक प्रतिनिधिमंडल भी भेजा था. प्रतिनिधिमंडल की तरफ से राज्यपाल को अभिभाषण के लिए मनाने की कोशिश की गई, लेकिन वो अपने रुख पर कायम रहे. मुख्यमंत्री के कानूनी सलाहकार के मुताबिक, सरकार तथ्यों की गलतियों और त्रुटियों को सुधारने के लिए तैयार थी, लेकिन पूरे 11 पैराग्राफ को हटाना मंजूर नहीं था. बाद में 11 में से 7 बिंदुओं के संशोधन पर सहमति भी बन गई थी, लेकिन कांग्रेस सरकार को मनरेगा से जुड़े अनुच्छेद 11 में कोई भी तब्दीली स्वीकार नहीं था.
राज्यपाल के अभिभाषण ड्राफ्ट में कर्नाटक सरकार ने बीजेपी की केंद्र सरकार पर टैक्स और फंड के बंटवारे में भेदभाव करने का आरोप लगाया था. मनरेगा वाले हिस्से के साथ ही राज्यपाल ने इसे भी पढ़ने से मना कर दिया. परंपरा के अनुसार राज्यपाल थावरचंद गहलोत सदन में पहुंचे. भाषण देना भी शुरू किया, लेकिन सिर्फ तीन लाइनें पढ़कर सदन से बाहर चले गए.
राज्यपाल गहलोत ने कहा, ‘मैं आप सभी का स्वागत करता हूं... मुझे खुशी है कि मैं एक बार फिर कर्नाटक विधानमंडल को संबोधित कर रहा हूं... मेरी सरकार राज्य के आर्थिक, सामाजिक और भौतिक विकास की गति को दोगुना करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है... जय हिंद, जय कर्नाटक.’
उसके आगे पढ़ने से मना करते हुए राज्यपाल बाहर चल दिए. ये देखते ही सत्ता पक्ष के विधायक नारेबाजी करने लगे, और राज्यपाल को घेरने की भी कोशिश की. माहौल खराब होते देख विधानसभा के मार्शलों ने दखल देकर सुरक्षा मुहैया कराते हुए राज्यपाल को सदन से बाहर निकाला.
1. केंद्र सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना वाले हिस्से को न पढ़ने को लेकर राज्यपाल थावरचंद गहलोत का कहना था कि वो संवैधानिक पद पर हैं, और केंद्र सरकार के खिलाफ अभिभाषण में शामिल टिप्पणियां पढ़ना उनके लिए उचित नहीं है.
2. अभिभाषण में वीबी जी राम जी की भी आलोचना की गई थी. बताया गया था कि ये मनरेगा को खत्म करने की साजिश है. ऐसे बिंदुओं को सरकारी प्रोपेगैंडा करार देते हुए राज्यपाल का कहना था, चूंकि ये कानून संसद द्वारा पारित हो चुका है, इसलिए इसके खिलाफ बोलना असंवैधानिक होगा.
अन्य राज्यों में राज्यपाल बनाम मुख्यमंत्री विवाद
कर्नाटक की तरह तमिलनाडु और केरल में भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव और विवाद होता रहा है. तमिलनाडु में राज्यपाल और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बीच तो विवाद के कई मौके देखे जा चुके हैं.
1. हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि राष्ट्रगान के अपमान का आरोप लगाते हुए भाषण दिए बगैर ही विधानसभा से बाहर चले गए. राज्यपाल रवि का कहना था कि तमिल सॉन्ग के बाद राष्ट्रगान भी हो, लेकिन स्पीकर ने मना कर दिया, तो वो भाषण दिए बिना ही चले गए. ऐसा वाकया 2024-25 में भी हो चुका है.
राज्यपाल के चले जाने के बाद लोक भवन ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा गया कि राज्यपाल को बोलने नहीं दिया गया. राष्ट्रगान के अपमान करने के आरोप के साथ साथ राज्यपाल का माइक बार-बार बंद किए जाने का भी आरोप लगाया गया.
2. केरल में भी 20 जनवरी को राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने अभिभाषण के उन हिस्सों को छोड़ दिया जिनमें केंद्र सरकार की वित्तीय नीतियों की आलोचना की गई थी. मुख्यमंत्री पी. विजयन के मुताबिक, राज्यपाल ने भाषण के 12वें पैरा का शुरुआती हिस्सा, और 15वें पैरा के अंतिम हिस्से को नहीं पढ़ा. विजयन ने ये भी आरोप लगाया है कि भाषण के 16वें पैरा में राज्यपाल की तरफ से एक लाइन भी जोड़ी गई.
जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
राज्यपाल का अभिभाषण राज्य सरकार ही तैयार करती है. राज्यपाल को सिर्फ पढ़ना होता है. राज्यपाल न तो कोई बदलाव कर सकते हैं, न अपने व्यक्तिगत विचार जोड़ सकते हैं. राज्यपाल का अभिभाषण राज्य सरकार की नीतियों और उपलब्धियों का स्टेटमेंट होता है. अगर राज्यपाल पढ़ने से मना करते हैं या बदलाव करते हैं, तो ये संवैधानिक परंपरा का उल्लंघन माना जा सकता है.
कई राज्यों के राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच का विवाद सुप्रीम कोर्ट पहले ही पहुंच चुका है. ऐसे मामलों में राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख तब किया है, जब राज्यपाल ने विधानसभा से पारित विधेयकों को रोक रखा था.
1. सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है, राज्यपाल को सामान्यतया कैबिनेट द्वारा तैयार किए गए भाषण को ही पढ़ना चाहिए, क्योंकि वह सरकार की नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है, राज्यपाल की व्यक्तिगत राय का नहीं.
2. एक केस में पश्चिम बंगाल सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दलील थी, किसी विधेयक को मंजूरी देने का मुद्दा पूरी तरह राज्यपाल के विवेक पर छोड़ने का मतलब आम लोगों की इच्छा को नकारना है. राज्यपाल को विधानसभा में पारित किसी विधेयक की विधायी क्षमता की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है. कोई व्यक्ति अदालत में किसी कानून को भले चुनौती दे सकता है, लेकिन राज्यपाल उसे रोक नहीं सकते.
3. तमिलनाडु का मामला देखें तो साफ है कि राज्यपाल के बहिष्कार के बावजूद सरकारें अभिभाषण को पढ़ा हुआ मानकर प्रस्ताव पास कर सकती हैं. 20 जनवरी, 2026 को राज्यपाल एन. रवि के वॉकआउट के बाद भी तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से रिजॉल्यूशन पास किया है कि सरकार का मूल भाषण ही रिकॉर्ड में दर्ज रहेगा.
मृगांक शेखर