'मुक्ति' का मुखौटा, तबाही का मंजर... इराक से ईरान तक अमेरिका की अराजकता वाली 'आज़ादी'

अमेरिका ने हमेशा सत्ता की राजनीति को सही ठहराने के लिए ऊंचे-ऊंचे सिद्धांतों का सहारा लिया है. कोल्ड वॉर के वक्त अमेरिका कहता था कि वह दुनिया को कम्युनिज़्म से बचा रहा है, और आज वह इसे लोकतंत्र और तानाशाही के बीच लड़ाई बताता है.यानी समय के साथ उसकी भाषा बदल जाती है, लेकिन असली मकसद वही रहता है अपनी ताकत और हितों को आगे बढ़ाना और सर्वोपरि रखना.

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अमेरिका-ईरान जंग का असर महिलाओं और बच्चों पर जमकर पड़ रहा है (Photo: AI) अमेरिका-ईरान जंग का असर महिलाओं और बच्चों पर जमकर पड़ रहा है (Photo: AI)

हेमंत पाठक

  • नई दिल्ली,
  • 21 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:57 PM IST

19 मार्च 2003 को जब अमेरिकी सेना इराक में दाखिल हुई, तब तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने व्हाइट हाउस से दुनिया को संबोधित करते हुए कहा कि अमेरिका और उसके सहयोगी ऐसे शासन के रहम-ओ-करम पर नहीं रहेंगे, जो विनाशकारी हथियारों से शांति को खतरा पहुंचाता हो. हम अपने बच्चों को वे सभी आज़ादियां देंगे, जिनका हम आज आनंद ले रहे हैं, और उनमें सबसे अहम है 'डर से आज़ादी'. इस संबोधन के कुछ ही हफ़्तों बाद अमेरिकी सेना ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल कर दिया. उनकी मूर्तियां गिराई गईं. इसका दुनियाभर में सीधा प्रसारण हुआ, जिसे 'मुक्ति' के प्रतीक के तौर पर प्रदर्शित किया गया, लेकिन साल के अंत तक इराक में विद्रोह भड़क उठा. 

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दशकों से अमेरिका अपनी विदेशी दखलंदाज़ियों को 'मुक्ति अभियान' बताता रहा है, जिनका मकसद लोगों को तानाशाही, आतंकवाद या दमन से आज़ाद कराना होता है. इराक से लेकर अफगानिस्तान तक अमेरिका ने लोकतंत्र, महिलाओं के अधिकारों और मानवीय गरिमा की बातें तो खूब की हैं, लेकिन उसके सैन्य अभियानों का दंश महिलाओं और बच्चों ने जमकर झेला है. 

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए. कुछ ही घंटों में ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया कि इन हमलों में देश के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत हो गई है. किसी देश के मौजूदा सुप्रीम लीडर का विदेशी सेना के हाथों मारा जाना अभूतपूर्व घटना थी. इससे पूरी दुनिया में हलचल मच गई. नतीजतन पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के कई देशों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. तेहरान, कराची और बगदाद में लोग सड़कों पर उतर आए. कश्मीर के लाल चौक पर भी लोगों ने प्रदर्शन किया. अमेरिका ने इस हमले को सही ठहराने के लिए कहा कि उसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी के प्रमुख राफेल ग्रॉसी ने कहा कि ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है कि ईरान परमाणु बम बना रहा है. इस युद्ध की आग में भी बेकसूर लोग झुलसे. अमेरिका-ईरान युद्ध में अब तक 1400 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. एक मार्च को अमेरिकी सेना ने ईरान के मिनाब शहर के एक स्कूल पर मिसाइल दागी, जिसमें 175 लोगों की मौत हुई, इनमें 168 स्कूली छात्राएं थीं, जिनकी उम्र महज  7 से 12 साल थी. 

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अमेरिका ने हमेशा सत्ता की राजनीति को सही ठहराने के लिए ऊंचे-ऊंचे सिद्धांतों का सहारा लिया है. कोल्ड वॉर के वक्त अमेरिका कहता था कि वह दुनिया को कम्युनिज़्म से बचा रहा है, और आज वह इसे लोकतंत्र और तानाशाही के बीच लड़ाई बताता है.यानी समय के साथ उसकी भाषा बदल जाती है, लेकिन असली मकसद वही रहता है अपनी ताकत और हितों को आगे बढ़ाना और सर्वोपरि रखना. 

इतिहास के पन्नों को खंगालने पर मालूम होता है कि बहुत कम ऐसे देश हैं जहां अमेरिका के सैन्य हस्तक्षेप के बाद सच में स्थिर लोकतंत्र बन पाया हो. इराक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां 'आजादी' की बात और असली हालात में बड़ा फर्क दिखता है. 1998 में अमेरिका ने 'इराक लिबरेशन एक्ट' पास किया. इसमें साफ कहा गया कि सद्दाम हुसैन को हटाना और इराक में लोकतंत्र लाना अमेरिका की नीति है. 11 सितंबर के हमलों के बाद अमेरिका ने सरकार बदलने को जरूरी और सही कदम बताया. तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कई बार कहा कि यह युद्ध इराक के लोगों को तानाशाही से आज़ाद कराने के लिए है. उन्होंने यह भी कहा था कि इराक के लोग अपने देश को खुद चलाने की क्षमता रखते हैं और उन्हें इसका अधिकार है, लेकिन हकीकत ये रही कि इराक में कभी कोई 'तबाही के हथियार' नहीं मिले. ब्राउन यूनिवर्सिटी के 'कॉस्ट्स ऑफ़ वॉर प्रोजेक्ट' के मुताबिक इस युद्ध की वजह से 2003 से 2018 के बीच लगभग 2.95 लाख लोग मारे गए, जिनमें 1.8 लाख आम नागरिक थे. सांप्रदायिक हिंसा ने इराकी समाज को पूरी तरह से तोड़ दिया, लाखों लोग बेघर हो गए. सरकारी संस्थाओं के ढहने से ISIS का उभार हो गया. तब एक इराकी सरकारी कर्मचारी ने कहा था कि हमें आज़ादी चाहिए थी, अराजकता नहीं.

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9/11 अटैक के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया. उसका मकसद अल-कायदा को खत्म करना और तालिबान सरकार को हटाना था. शुरुआत में इस कदम को दुनियाभर का समर्थन मिला, लेकिन धीरे-धीरे यह युद्ध लंबा खिंचता गया और करीब 20 साल तक चला. इस दौरान अमेरिका ने इसे लोकतंत्र और महिला अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. 2001 में तत्कालीन फर्स्ट लेडी लॉरा बुश ने कहा था कि आतंकवाद के खिलाफ यह लड़ाई महिलाओं के अधिकार और सम्मान की भी लड़ाई है. कुछ समय के लिए हालात बदले भी. लड़कियां स्कूल जाने लगीं, देश के निर्माण के लिए अरबों डॉलर खर्च किए गए और चुनाव भी हुए, लेकिन तालिबान पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. जब 2021 में अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से वापस लौटी, तो कुछ ही हफ्तों में सरकार गिर गई और तालिबान फिर से सत्ता में आ गया. तब अफगान की एक एक्टिविस्ट ने कहा कि अमेरिका ने हमें आज़ाद कराने की बात की थी, लेकिन सुरक्षा के बिना आज़ादी कुछ समय के लिए ही होती है. ये सच है कि सत्ता-परिवर्तन से संघर्षों का अंत नहीं होता, बल्कि इससे नए संघर्षों की शुरुआत हो जाती है.

2011 में लीबिया में गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह हुआ. इस दौरान अमेरिका ने NATO के साथ मिलकर सैन्य कार्रवाई की. इसे लोगों को बचाने और नरसंहार रोकने के नाम पर किया गया था. इस कार्रवाई से गद्दाफी तो सत्ता से हट गए, लेकिन इसके बाद लीबिया में शांति नहीं आई. देश अलग-अलग गुटों और मिलिशिया के बीच बंट गया और हालात और खराब हो गए. वहीं सूडान में लंबे समय से लगाए गए प्रतिबंध और बातचीत के बावजूद देश को एक और बड़े गृहयुद्ध से नहीं बचाया जा सका. दरअसल, बदलाव को सैन्य ताक़त के ज़रिए थोपा नहीं जा सकता. असली राजनीतिक बदलाव तो समाज के भीतर ही पैदा होता है. अमेरिका की बयानबाज़ी और हकीकत के बीच का विरोधाभास दुनियाभर को प्रभावित कर रहा है. 

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