यूपी में कानून का राज, विकास को मिल रही रफ्तार... देश के अन्य सभी राज्यों के लिए बड़ी मिसाल है योगी मॉडल

पूर्व पुलिस महानिदेशक ए.के. जैन ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था, प्रशासनिक सुधार, तकनीक के उपयोग और पारदर्शिता के जरिए विकास को नई गति मिली है. उन्होंने दावा किया कि अपराध पर कार्रवाई, डीबीटी, डिजिटलीकरण, जवाबदेही और निवेश को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने राज्य की तस्वीर बदली है. यूपी के विकास मॉडल को अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक बताया गया है.

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यूपी के पूर्व डीजीपी ए.के. जैन ने कहा कि कानून का राज कायम होने से अपराधियों में डर बढ़ता है (Photo: ITG) यूपी के पूर्व डीजीपी ए.के. जैन ने कहा कि कानून का राज कायम होने से अपराधियों में डर बढ़ता है (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:48 PM IST

चाणक्य सूत्र में कहा गया है- ‘सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलं अर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यं.’ चाणक्य ने राज्य को अर्थ का मूल कहा, क्योंकि वह जानते थे कि सुदृढ़ शासन से ही धर्म टिकता है, समृद्धि पनपती है और जन-जीवन में स्थायित्व आता है. उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ सालों की यात्रा इस प्राचीन सूत्र का सबसे सजीव आधुनिक प्रमाण है. 

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सुशासन अर्थात ‘सबका साथ-सबका विकास’ जो आज उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है, वह रामराज्य की उस अवधारणा को स्थापित करता है, जहां राजा का कर्तव्य न्याय की स्थापना और भयमुक्त समाज का निर्माण था. 

योगी सरकार ने इसे ही आत्मसात किया है और उत्तर प्रदेश में व्यवस्था के संदर्भ में यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित भी है. वैचारिक धरातल पर उत्तर प्रदेश में सुशासन का तात्पर्य एक ऐसे प्रवाहपूर्ण और समावेशी तंत्र से है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से ऊर्जा लेता हो और वैश्विक मानकों पर खरा उतरता हो. ऐसी ही स्थिति में व्यवस्था केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि जन-कल्याण का साधन बनती है.

खोखलेपन से मरती है सभ्यता

किसी भी सभ्यता का अंत तब नहीं होता, जब उस पर बाहर से आक्रमण किया जाए, वे तब मरती हैं, जब भीतर से व्यवस्था खोखली होने लगती है. जब-जब शासन में अनुशासन शिथिल हुआ, जब-जब न्याय की जगह सिफारिश ने ली, जब-जब राज्यसत्ता जनसेवा की बजाय स्वार्थ का साधन बनी, तब-तब समाज की नींव हिली, विश्वास टूटा और विकास की धारा अवरुद्ध होती रही. 

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करीब एक दशक पहले की सरकारों का कार्यकाल देखें तो सामाजिक अराजकता के मूल में यही दिखाई देगा. देश के मानचित्र पर उत्तर प्रदेश के साथ बीमारू राज्य की संज्ञा इसीलिए दिखाई पड़ती थी.

सरकारी विभागों के प्रति लोगों में अविश्वास का माहौल था. निवेशक यूपी का नाम सुनते ही बिदकने लगते थे. सरकारी योजनाओं का पैसा बिचौलियों के माध्यम से कहां जा रहा था, किसी को पता नहीं चलता था. ऐसे प्रदेश में 2017 में जब योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी तो उसकी पहली आवश्यकता गहरी प्रशासनिक समझ और अदम्य इच्छाशक्ति की थी और यही सूत्र अंततः बदलाव ले भी आया.

जब डराने वाले लगे डरने

शासन की आत्मा और तंत्र की प्राथमिकता बदली तो सबसे पहला आक्रमण उन पर ही हुआ जो राजनीतिक संरक्षण की छत्र-छाया में कानून को अपनी मुट्ठी में रखते थे. यह कहने की जरूरत नहीं कि कानून का भय जब समाप्त हो जाता है तो जो शून्य बनता है, उसे अपराध व अराजकता भरती है. इस अराजकता का शिकार असहाय ही होता है. 

संगठित अपराध और अपराधियों के समूह पर योगी सरकार के निर्णायक अभियान ने माफिया की कमर तोड़ी तो भय का संतुलन पलटा. जो डराते थे, वे स्वयं भयभीत हुए. अपराधियों के हौसले पस्त होने का सामाजिक प्रभाव इस भाव में स्थापित हुआ कि अब कानून की पकड़ शक्तिशाली से शक्तिशाली अपराधी तक भी पहुंचती है. इसने सामान्य नागरिक के जीवन को नई ऊर्जा दी और निवेश का ऐसा वातावरण तैयार हुआ कि अब किसी भी उद्यमी को यूपी आने में कोई हिचक नहीं.

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नई कार्य संस्कृति का जन्म

किंतु यह भी सत्य है कि दंड व भय से सुरक्षा का भाव तो आता है, पर व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन तब होता है जब शासन के अनुरूप अफसरशाही की संस्कृति बदले. प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव लाना सबसे कठिन कार्य है क्योंकि दशकों से जड़ें जमा चुकी आदतों को तोड़ना आसान नहीं. इसके लिए जरूरी था कि समयबद्ध समीक्षाएं हों, अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही हो, विभागों के प्रदर्शन का पारदर्शी मूल्यांकन हो. 

जब यह सब शुरू हुआ तो एक नई कार्य संस्कृति की आधारशिला भी तैयार हुई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं विभागों का मूल्यांकन शुरू किया तो तंत्र में एक स्वाभाविक जागरूकता पैदा हुई, जिसने अधिकारियों के साथ कर्मचारियों को भी उत्तरदायी बनाया.

इसका एक महत्वपूर्ण पहलू तकनीक का भी रहा. तकनीक इस युग का वह दर्पण है, जिसमें शासन की सच्चाई सबसे निर्मम स्पष्टता से दिखती है. डीबीटी यानी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने एक ऐतिहासिक सत्य को व्यवहार में सिद्ध किया कि सरकारी योजनाओं का लाभ रिसते-रिसते, कटते-कटते पात्र तक पहुंचने की बाध्यता नहीं, वह सीधे भी दिया जा सकता है, पूरा भी दिया जा सकता है. भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण ने उस पुरानी पीड़ा का उपचार किया जो पीढ़ियों से लोगों को अदालतों के चक्कर काटने को, वकीलों को फीस देने के लिए मजबूर कर रही थी. जब जमीन का रिकॉर्ड पारदर्शी और सुलभ हो तो ग्रामीण क्षेत्रों के मुकदमों की संख्या भी कम होती जाती है.

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व्यवस्थागत बदलाव से निकली राह

व्यवस्था ही निवेश का मार्ग प्रशस्त करती है. टैक्स में छूट, भूमि की सुलभता के साथ ही निवेशक कानून व्यवस्था का पहलू भी देखता है. यह भी देखता है कि कहीं उसकी परियोजना अनुमोदन के लिए फाइलों में तो नहीं पड़ी रहेगी. 

सिंगल विंडो सिस्टम ने इस प्रक्रिया को न केवल सरल बनाया, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप की संभावना को भी सीमित करके उसे निष्पक्ष बनाया. निवेश परियोजनाओं की समयबद्ध निगरानी ने यह सुनिश्चित किया कि अनुमोदन मिलने के बाद भी परियोजना लालफीताशाही में न उलझे. उत्तर प्रदेश का आज देश की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में तेज़ी से स्थान बनाना इसी व्यवस्थागत परिवर्तन का परिणाम है।

योजनाओं का लाभ जब बिना भेदभाव, बिना सिफारिश और केवल पात्रता के आधार पर पहुंचता है, तब लोकतंत्र अपना वास्तविक अर्थ पाता है. तब लोक की प्रधानता स्थापित होती है. किसानों को उनकी फसल का समय पर उचित मूल्य, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, मंडियों में पारदर्शी व्यवस्था और फसल खरीद प्रक्रिया में सुधार, ये सब उस वर्ग को संबल देते हैं जो इस देश की खाद्य सुरक्षा का आधार होते हुए भी सबसे अधिक उपेक्षित और शोषित रहा है. आज किसानों का आत्मविश्वास लौटा है तो इसके मूल में राज्य सरकार के ये प्रयास ही हैं.

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उत्तर प्रदेश की विकास यात्रा बताती है कि व्यवस्था परिवर्तन ही वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत है. जब कानून का राज, पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीक साथ आते हैं, तब विकास गति पकड़ता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल का प्रमुख संदेश यही है कि ‘व्यवस्था से ही विकास का मार्ग प्रशस्त होगा’ और आज जब परिणाम सामने है तो अन्य राज्यों को भी इस मॉडल से प्रेरणा लेनी चाहिए.

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