ये लोकतंत्र है, SIR

जिन राज्यों में SIR का काम बाकी है वहां अगर इलेक्शन कमीशन अभी से इस प्रक्रिया में लग जाए तो चुनाव के समय शोर कम होगा, साथ ही राजनीतिक पार्टियों को भी आरोप लगाने के मौके कम मिलेंगे. यही नहीं प्रभावित व्यक्ति समय से अपील कर सकेंगे और अपना नाम जुड़वा सकेंगे. तब ये पूरी प्रक्रिया स्वस्थ रूप से मुकम्मल हो सकेगी.

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चुनाव आयोग के मूल रूप से दो काम हैं. (Photo: ITG) चुनाव आयोग के मूल रूप से दो काम हैं. (Photo: ITG)

पाणिनि आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 28 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:20 AM IST

भारत बहुत पुराना देश है. सदियों पुराना. लोकतंत्र की परंपरा के कई उदाहरण हमारे प्राचीन इतिहास में मौजूद हैं. आज़ाद भारत ने भी आगे चलने के लिए जिस संविधान को अंगीकृत किया, वो लोकतंत्र के वादे का एक आधारभूत और मज़बूत उदाहरण है. लेकिन इस लोकतंत्र की सबसे बुनियादी चीज़ पता है क्या है? हमारा मताधिकार. वोट. मतदान. वोट की ताक़त ही हमारे लोकतंत्र की ताक़त है. वोट ही हमें लोकतंत्र बनाता है. किसी राजा के नियंत्रण में स्थितियां आज से बेहतर भी हो जाएं तो भी उसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता. लोकतंत्र है क्योंकि लोग बनाते हैं इस तंत्र को. वो चुनते हैं अपनी सरकारें. सरकारें लोक सहमति के अनुरूप बनाती हैं क़ानून और इन्हीं कानूनों, नीतियों और नियमों से चलता है देश. यही एक लोकतांत्रिक देश की बुनियादी पहचान और गुण है. 

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देश में मतदान हो, चुनाव हो, इसके लिए एक संस्था है- चुनाव आयोग. इस आयोग का दायित्व है कि वो लोगों का वोट पंजीकृत करे. और फिर समय-समय पर चुनाव कराए. लोगों को मतदान का अवसर दे. और लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करें. अपनी पसंद की सरकार चुनें. सामुदायिक और निकाय स्तर से लेकर विधायिका की विधानसभा और लोकसभा तक लोगों को अपना जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार है. इतने विविधता भरे और विशाल देश में इस प्रक्रिया का होना ख़ुद में एक दुर्लभ और बहुत ठोस चीज़ है. और यही हमारे लोकतंत्र की सबसे मज़बूत बात भी है.

तो चुनाव आयोग का क्या काम है. मूलतः दो. पहला, मतदाता बनाना. दूसरा, चुनाव कराना. मतदाता बनाने के लिए कुछ नियम हैं. इसको पूरा करने वाले व्यक्ति को वोट देने का अधिकार मिलता है. लेकिन वोट देने वाले लोग कई बार जीविका या अन्य कारणों से दूसरे राज्यों, शहरों और देशों में भी जाते हैं. कई मतदाता ऐसे भी होते हैं जो अपना जीवन चक्र पूरा कर चुके होते हैं और मर चुके होते हैं. इससे मतदाताओं की सूची में ऐसे कई नाम भी जुड़े रह जाते हैं जो या तो वोट देने के लिए उपलब्ध नहीं हैं और या फिर इस दुनिया से ही जा चुके हैं. इससे दो नुक़सान हैं. अगर वो व्यक्ति कहीं और पंजीकरण कराकर वोट दे रहा है तो बेवजह दो-दो जगहों पर दर्ज रहेगा. यह क़तई ठीक नहीं है. दूसरा, चुनाव का सही मत प्रतिशत निकाला नहीं जा सकेगा क्योंकि असल में जितने लोग मतदान के लिए उपलब्ध होंगे, संख्या उससे ज्यादा होगी. इस बढ़ी हुई संख्या में मरे हुए लोग और जा चुके लोग भी शामिल होंगे. नतीजतन, अगर असल संख्या का मतदान अगर सत्तर प्रतिशत है तो वो निष्क्रिय मतदाताओं की वजह से 60-65 प्रतिशत ही दर्ज होगा. एक तीसरा जोखिम है और वो यह है कि मतदाता सूची में दर्ज निष्क्रिय नामों का ग़लत इस्तेमाल भी हो सकता है और फर्जी वोट का खतरा पैदा हो सकता है. मतदाता सूची की इन्हीं चुनौतियों को सुलझाने और उसे सटीक बनाए रखने के लिए एसआईआर की प्रक्रिया बनाई गई है. इसका मक़सद है मतदाताओं का सर्वे करके मतदाता सूची को सटीक रखना.  

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अब समस्या यह है कि चुनाव आयोग के दोनों की दायित्व, मतदाता बनाना और चुनाव कराना, सवालों के घेरे में आ रहे हैं. विपक्षी दल और उनके समर्थक बार-बार कह रहे हैं एसआईआर अंतिम समय में, जल्दबाज़ी में किया गया. इससे मतदाताओं को अपील का पर्याप्त समय तक नहीं मिल सका. एसआईआर की टाइमिंग पर सवालों को राजनीतिक लोग चुनाव आयोग के पक्षपात तक लेकर चले गए. चुनाव कराने और ईवीएम के मामले में यह सवाल पहले से ही उठते आ रहे हैं और अब विश्वसनीयता की बहस को बढ़ाकर आयोग की निष्पक्षता तक खींच दिया गया है. राजनीतिक दल उतनी ही तत्परता से केंद्र सरकार पर हमला करते हैं और उतनी ही तेजी से चुनाव आयोग पर. निष्पक्ष चुनाव कराने के दायित्व वाली संस्था इस तरह अब चुनाव के इर्द-गिर्द होने वाली बहस की पार्टी बन चुकी है. लोकतंत्र के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. फ़िलहाल बात एसआईआर पर.

पिछले कुछ महीनों के दौरान देश के कुछ राज्यों में चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया चलाई. सात करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए. इसकी तीखी आलोचना भी हुई क्योंकि कई राजनीतिक दलों का आरोप है कि मतदाता सूची में लाखों ऐसे नाम हटा दिए गए हैं जो जीवित हैं, और अपने मताधिकार से वंचित कर दिए गए हैं. इसका विवाद सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक भी पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को वैध क़रार दिया है. लेकिन सवाल है मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने का. सवाल है लोगों के मताधिकार से वंचित हो जाने का. सवाल है कि क्या लोग वोट देना चाहते थे और इसलिए नहीं दे सके, क्योंकि उनके नाम एसआईआर के कारण हटा दिए गए थे. सवाल है कि क्या वाक़ई किसी को उसकी पहचान या किसी अन्य कारण से मतदान से वंचित किया जा रहा है. अगर ये सवाल उठे हैं तो इनका जवाब भी सामने आना ज़रूरी है और इनका निदान होना भी.

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बात फिर लोकतंत्र के बुनियादी गुण पर पहुंचती है. बात मोटी है और इतनी सी है कि एक-एक वोट हमारे लिए ज़रूरी है. क्योंकि वोट है तो लोकतंत्र है. जैसे क़ानून बनाने के क्रम में अपराधी को सजा दिलाने से ज्यादा बड़ा दायित्व है निरपराध को सजा से बचाना. किसी बेगुनाह को सज़ा न हो जाए, यह सुनिश्चित करना. उसी तरह यह भी बहुत ज़रूरी है कि हमारे बीच एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं होना चाहिए जो वोट देने की पात्रता तो रखता हो लेकिन उसका वोट काट दिया जाए या वोट न दे पाए. किसी एक व्यक्ति का भी मतदान से वंचित रह जाना लोकतंत्र के प्रति अपराध से कम नहीं. इसलिए किसी एक नाम को भी हटाने से पहले उसकी पड़ताल और पूरी जानकारी आयोग के पास होना ज़रूरी है.

हम जनमत के बड़े प्रतिशत के साथ यह कहकर अपनी पीठ थपथपाते नहीं रह सकते कि हमने सफलतापूर्वक चुनावों का आयोजन करा दिया. सरकार बन गई और इस तरह सारे सवाल बेमानी हो गए. अगर इस पूरी प्रक्रिया में कुछ लोग वोट देने इसलिए नहीं पहुंचे क्योंकि यह उनका व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि आयोग की ओर से उनका नाम हटा दिया जाना ही असली वजह था तो यह इसे लोकतंत्र के प्रति एक गैर-जिम्मेदाराना और आपराधिक कृत्य के रूप में देखा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट, सरकार और चुनाव आयोग, तीनों का यह दायित्व है कि लोकतंत्र के वृहद हित में वो वचनपूर्वक यह सुनिश्चित करें कि एक भी वोट छूटे न. पोलियो अभियान के दिनों की एक लाइन याद आती है. उसे मंत्र मानकर इन संस्थाओं को आगे बढ़ना होगा. यदि एक भी वोटर छूट गया, तो लोकतंत्र के प्रति दायित्व टूट गया. 

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अगले चुनावों में अभी समय है. अगर आयोग अभी से इस प्रक्रिया में लग जाए तो चुनावों के वक्त शोर कम होगा. राजनीतिक दलों को सवाल उठाने और आरोप लगाने का मौका कम मिलेगा. सबसे बड़ी बात, लोग समय से अपील कर सकेंगे. अपने नाम जुड़वा सकेंगे और चुनाव से पहले ही इसे पूरी तरह पुख्ता किया जा सकेगा. एसआईआर कीजिए. ईवीएम से मतदान कराइए. लेकिन सवालों को अनुत्तरित मत रहने दीजिए. सवाल संदेह से बनते हैं. और संदेह संस्थाओं को कमज़ोर करता है. विश्वसनीयता को ढीला करता है. भूमिकाओं को संदिग्ध बनाता है. और इस अविश्वास का नुक़सान दूर तक जाता है. लोकतंत्र इसकी क़ीमत चुकाता है.

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