बेंगलुरु केस- युगांडा से 23 मई को एक 28 वर्षीय महिला अहमदाबाद होते हुए बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरी. एयरपोर्ट स्क्रीनिंग के समय उसे कोई बड़ा लक्षण नहीं था, सिर्फ हल्की थकावट थी. बाद में होटल पहुंचने पर तेज बदन दर्द शुरू हुआ. खबर मिलने पर उसे तुरंत 'एपिडेमिक डिसीजेस हॉस्पिटल' में आइसोलेट किया गया. राहत की बात यह रही कि पुणे की NIV लैब में उसकी इबोला टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई. महिला अब भी आइसोलेशन में ही है.
वडोदरा/अहमदाबाद केस- कांगो के दो नागरिक करीब दस दिन पहले बिजनेस ट्रिप पर भारत आए. थर्मल स्कैनिंग के समय उनमें कोई गंभीर लक्षण नहीं थे. वे पहले पांच दिन मुंबई में रहे, फिर सिलवासा और दमन होते हुए 22 मई को वडोदरा पहुंचे. जहां इनमें से 37 वर्षीय एक शख्स की तबीयत बिगड़ने लगी. 26 मई को उसे आइसोलेशन में ले जाया गया, और जांच के लिए उसके सैंपल NIV लैब, पुणे भेज दिए गए. संतोष की बात यह रही कि रिपोर्ट निगेटिव आई. लेकिन, इस शख्स और उसके संपर्क में आए 20 लोगों को भी क्वारंटीन रखा गया है.
गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पनशेरिया कह रहे हैं कि इबोला संदिग्ध की रिपोर्ट निगेटिव आई है. अब चिंता की कोई जरूरत नहीं है. लेकिन, उनके इस बयान से ये सवाल और गंभीर हो जाता है कि यदि रिपोर्ट पॉजिटिव आई होती तो क्या होता? दस दिन से इधर-उधर घूम रहे यूगांडा और कांगो के ये नागरिक तो सुपर-स्प्रेडर बन गए होते? इबोला महामारी को ग्लोबल इमरजेंसी घोषित कर दिए जाने के बावजूद आखिर प्रभावित अफ्रीकी देशों से लोग भारत क्यों आ रहे हैं? यदि अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों ने जब टोटल ट्रेवेल बैन लगा दिया है, तो भारत क्यों सख्ती नहीं बरत रहा है?
कोरोना वायरस से होने वाली मृत्यु की दर महज 1 प्रतिशत के आसपास थी, फिर भी उसने पूरी दुनिया को थाम दिया था. कल्पना कीजिए, इबोला फैला तो क्या होगा? इस वायरस से संक्रमित होने पर मृत्यु की दर 50 से 60 प्रतिशत तक पहुंच सकती है! यानी हर दूसरा संक्रमित व्यक्ति अपनी जान गंवा सकता है. मौजूदा 'बुंडीबुजो स्ट्रेन' (Bundibugyo Strain) में भी मृत्यु दर 25 से 50 प्रतिशत तक है. यानी इबोला कोई सामान्य फ्लू या वायरस नहीं है, यह साक्षात मौत का दूसरा नाम है.
इस समय कांगो इबोला की 17वीं लहर का सामना कर रहा है. कांगो और युगांडा में 1,018 मामले और 238 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि 50 साल पहले पकड़ में आए इस वायरस का निश्चित इलाज या वैक्सीन मौजूद नहीं है. विशेषज्ञ इसे ’परफेक्ट स्टॉर्म’ कह रहे हैं, यानी वायरस के फैलने के लिए सबसे अनुकूल और खतरनाक परिस्थिति.
एयरपोर्ट स्क्रीनिंग क्यों नाकाफी है?
कोविड के दौरान हुई ICMR की अपनी स्टडी में यह सच सामने आया था कि एयरपोर्ट पर कोविड लक्षण वाले सभी लोगों (symptomatic cases) की पहचान होने के बावजूद महामारी को फैलने से सिर्फ 2.9 दिन से ज्यादा नहीं रोका जा सका. ऐसा इसलिए, क्योंकि जिन लोगों के अंदर वायरस का इनफेक्शन था, लेकिन लक्षण नहीं थे (asymptomatic cases), वे सहज ही एयरपोर्ट से सोसायटी में चले आए. और बाद में कोरोना वायरस के फैलने का कारण बने.
अब आते हैं इबोला को लेकर एयरपोर्ट पर की जा रही केवल 'थर्मल स्क्रीनिंग' और 'हेल्थ फॉर्म' जैसी व्यवस्थाओं पर. घातक इबोला वायरस को रोकने में पूरी तरह फेल साबित होंगे. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इबोला का इन्क्यूबेशन पीरियड 2 से 21 दिनों का होता है. यानी, अगर कोई व्यक्ति वायरस से संक्रमित हो भी चुका है, तो वह एयरपोर्ट पर बिल्कुल सामान्य और स्वस्थ दिखेगा. थर्मल स्कैनर उसका बढ़ा हुआ तापमान नहीं पकड़ सकते क्योंकि बुखार या बदन दर्द जैसे लक्षण यात्रा के कई दिनों बाद सामने आते हैं, जैसा कि बेंगलुरु वाली महिला के साथ हुआ. वह स्क्रीनिंग पार कर अहमदाबाद से बेंगलुरु पहुंच गई. और फिर एक होटल में चेक-इन भी कर गई. जब तक ऐसे यात्रियों में लक्षण उभरते हैं, तब तक वे अनजाने में फ्लाइट के क्रू, साथी यात्रियों और कैब ड्राइवरों के संपर्क में आकर संक्रमण की चेन बना चुके होते हैं. बिना 'टोटल ट्रेवल बैन' या अनिवार्य 'इंस्टीट्यूशनल क्वारंटीन' के, केवल सतही स्क्रीनिंग भारत को एक बड़े खतरे में धकेल रही है.
ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका को 'किला' बना दिया, भारत को किस बात का इंतजार?
जनवरी 2026 में ट्रंप प्रशासन ने WHO से दूरी बना ली थी, लेकिन इबोला के मामले में उसका रवैया बेहद आक्रामक और सतर्क दिखाई दे रहा है. अमेरिका ने शुरुआत से ही ‘जीरो टॉलरेंस’ रणनीति अपनाई है.
अगर कोई दूसरे देश का नागरिक अमेरिका आ रहा है, जिसने पिछले 21 दिनों में उसने इबोला प्रभावित देशों की यात्रा की है, तो उसके लिए अमेरिका में प्रवेश बिल्कुल वर्जित है. 20 मई को एयर फ्रांस की पेरिस से डेट्रॉइट (यूएस) जा रही फ्लाइट को इसलिए कनाडा डायवर्ट कर दिया गया था क्योंकि उसमें एक कांगो का यात्री भी सवार था.
अमेरिका अब संक्रमित या वायरस के संपर्क में आए अपने नागरिकों को इलाज के लिए केन्या में तैयार किए जा रहे विशेष मेडिकल सेंटरों में भेजने की योजना पर काम कर रहा है, ताकि इबोला वायरस को अमेरिकी धरती तक पहुंचने से पहले ही रोका जा सके. अमेरिकी डॉक्टर पीटर स्टैफर्ड कांगो के इतुरी इलाके में सर्जरी के दौरान इबोला संक्रमित हो गए थे. उन्हें सीधे अमेरिका नहीं लाया गया. पहले जर्मनी भेजा गया ताकि लंबी यात्रा के दौरान संक्रमण का खतरा कम किया जा सके.
अमेरिका ने इबोला प्रभावित देशों से आने वाली सीधी उड़ानों को सिर्फ न्यूयॉर्क, अटलांटा और वॉशिंगटन जैसे चुनिंदा एयरपोर्ट तक सीमित कर दिया है. यहां केवल अमेरिकी नागरिकों को उतरने की अनुमति दी जा रही है. इन नागरिकों को पहले यहां बनी सबसे हाई-टेक BSL-4 (बायोसेफ्टी लेवल-4) लैब्स में निगरानी के लिए भेजा जाता है. BSL-4 लैब्स में वैज्ञानिक विशेष सिक्योरिटी सूट पहनते हैं, हवा और कचरे को पूरी तरह फिल्टर किया जाता है, और लैब को इस तरह बनाया जाता है कि वायरस बाहर न निकल सके.
और देशों ने भी सख्ती कीः इबोला के बढ़ते खतरे को देखते हुए कनाडा, बहामास, अमेरिका, जॉर्डन और बहरीन ने अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए बेहद सख्त 'ट्रेवल बैन' लागू कर दिए हैं. इन सभी देशों ने भी एक सुर में युगांडा, कांगो और साउथ सूडान जैसे इबोला प्रभावित देशों से आने वाले गैर-नागरिकों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. स्वदेश लौट रहे अपने नागरिकों के लिए इन देशों ने केवल चुनिंदा एयरपोर्ट्स तय किए हैं, जहां उन्हें अत्याधुनिक लैब्स की निगरानी और अनिवार्य इंस्टीट्यूशनल क्वारंटीन से गुजरना पड़ रहा है.
भारत की तैयारियां: कितनी सख्त और कितनी लचर?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने इबोला को लेकर समीक्षा बैठकें की हैं. बताया गया है कि भारत सरकार ने एयरपोर्ट्स पर स्क्रीनिंग बढ़ाई है, और यात्रियों के लिए सेल्फ-डिक्लेरेशन हेल्थ फॉर्म और 21 दिन का सेल्फ-क्वारंटीन अनिवार्य किया है. लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था बेहद नाकाफी और ढीली है.
21 दिन का साइलेंट खतरा: इबोला का इन्क्यूबेशन पीरियड (Incubation Period) 21 दिनों का होता है. यानी संक्रमित व्यक्ति 21 दिनों तक बिना किसी लक्षण के बिल्कुल सामान्य दिख सकता है, यात्रा कर सकता है और लोगों से मिल सकता है. लक्षण कुछ दिनों के बाद भी आ सकते हैं. जैसा कि बेंगलुरु केस में युगांडा की महिला के साथ हुआ. ऐसे में सिर्फ थर्मल स्क्रीनिंग से उसे पकड़ पाना नामुमकिन है.
'सेल्फ-क्वारंटीन' का मजाक: कोविड के दौरान हम देख चुके हैं कि डंडे के जोर पर भी लोगों को क्वारंटीन करना कितना मुश्किल था. ऐसे में 'सेल्फ-क्वारंटीन' के भरोसे इतनी घातक बीमारी को छोड़ देना सुसाइड करने जैसा है.
रिसोर्स की भारी कमी: इबोला की जांच के लिए बेहद सुरक्षित BSL-4 लैब्स की जरूरत होती है. अमेरिका के पास ऐसी 14 लैब्स हैं, जबकि भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में ऐसी सिर्फ 3 लैब्स हैं (जिसमें NIV पुणे मुख्य है). संक्रमण बढ़ने पर देश के कोने-कोने से सैंपल पुणे भेजना समय और सिक्योरिटी के लिहाज से भारी दबाव पैदा कर देगा.
कंटेनमेंट और PPE का संकट: इबोला मरीजों के लिए विशेष बायो-कंटेनमेंट यूनिट (जहां नियंत्रित एयर प्रेशर हो) और डॉक्टरों के लिए फुल PPE किट अनिवार्य होता है. कोविड की पहली वेव में हम N-95 मास्क तक के लिए तरस गए थे, ऐसे में इबोला जैसी जानलेवा बीमारी से निपटने के लिए हमारे अस्पतालों की बुनियादी तैयारी अभी भी कमजोर है.
वक्त आ गया है कड़े फैसले लेने का
इबोला भले ही कोविड की तरह हवा से नहीं फैलता, लेकिन यह संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों (Fluids) जैसे पसीने से तेजी से फैलता है. भारत इस समय भीषण गर्मी और हीटवेव (Heatwave) का सामना कर रहा है. ऐसे माहौल में पब्लिक ट्रांसपोर्ट और भीड़भाड़ वाली जगहों पर पसीने के जरिए संक्रमण फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
कोविड ने हमें सिखाया है कि किसी भी महामारी की रोकथाम के लिए शुरुआती दिन ही सबकुछ तय करते हैं. कि आगे स्थिति कितनी भयावह होगी. जब तक हमने कोविड में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर बैन लगाया, वायरस पूरे देश में फैल चुका था और लाखों लोगों को बिना ऑक्सीजन और इलाज के दम तोड़ना पड़ा था.
हमें इबोला के खिलाफ इस ढीले रवैये को छोड़कर इसे एक युद्ध की तरह लेना होगा. सरकार को सिर्फ 'एडवाइजरी' जारी करने के बजाय प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए या फिर हर यात्री को अनिवार्य रूप से 21 दिन के सरकारी आइसोलेशन यूनिट में रखना चाहिए. अगर इस बार भी हमने हिचकिचाहट दिखाई, तो अगली चेतावनी संभलने का मौका भी नहीं देगी!
(अमेरिका से सोनिया तोमर के इनपुट शामिल)
धीरेंद्र राय