ट्विशा मामले में 29 मई को सास गिरिबाला सिंह और पति समर्थ सिंह को आखिरकार सीबीआई में 2 जून तक की रिमांड पर भेज दिया गया है. यह रिमांड ट्विशा की मौत के पूरे 17 दिन बाद तब हुई है, जब हाईकोर्ट ने गिरीबाला सिंह को ट्रायल कोर्ट से मिली बेल को रद्द कर दिया और 28 मई को सास गिरीबाला सिंह की गिरफ्तारी हो गई. 12 मई को ट्विशा की मौत से लेकर 28 मई को सास गिरीबाला सिंह की गिरफ्तारी और फिर 29 मई को सीबीआई की रिमांड में जाने तक मैनें क्या देखा और कैसे इस मामले ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा आप भी पढ़िए.
12 मई से शुरू हुई ट्विशा शर्मा मौत की गुत्थी अगले 17 दिनों तक सिर्फ एक पुलिस जांच नहीं रही, बल्कि यह मामला मध्यप्रदेश की सबसे चर्चित, भावनात्मक और बहस छेड़ देने वाली घटनाओं में बदल गया. भोपाल से जबलपुर तक…पुलिस थानों से कोर्ट परिसर तक…टीवी स्टूडियो से सोशल मीडिया तक…हर जगह सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा था आखिर ट्विशा की मौत के पीछे सच क्या है? यह उन लगातार 16 दिनों की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट है, जिनमें आरोप लगे, आंसू बहे, रातभर पूछताछ हुई, कोर्ट में हलचल मची, पुलिस टीमों ने लगातार कार्रवाई की और मैनें करीब 43 डिग्री की झुलसाती गर्मी में बिना रुके हर अपडेट दर्शकों तक पहुंचाया.
12-13 मई: जब शुरू हुई मौत की रहस्यमयी कहानी
13 मई का दिन था और मैं दिन भर NEET परीक्षा रद्द होने के बाद छात्रों को हो रही परेशानी से जुड़ी खबरों पर काम कर रहा था. दोपहर बाद मुझे जानकारी मिली की किसी रिटायर्ड जज के घर बहू ने 12 तारीख की रात को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है. मामला कटारा हिल्स थाने का है. रिटायर्ड जज, यह शब्द सुनते ही लगा कि मामला हाई-प्रोफाइल है लिहाजा NEET से जुड़ी रिपोर्ट को फाइल कर मैं सीधा कटारा हिल्स थाने पहुंच गया और वहां एसीपी से मामले का आधिकारिक बयान लेकर एक खबर बनाने के लिए और एलिमेंट पर बात शुरु की.
जैसे ही मृतका और उसके ससुराल वालों की प्रोफाइल सामने आई तो मालूम चला कि यह मामला बेहद ही बड़ा और हाई-प्रोफाइल लोगों से जुड़ा हुआ है. दरअसल, जिसकी मौत हुई उसका नाम ट्विशा था जो मिस पुणे रह चुकी थी. साउथ की फिल्मों में रोल करने के साथ ही कई टीवी एड्स में भी काम कर चुकी थी. वहीं ससुराल पक्ष भी बेहद प्रभावशाली था. सास भोपाल जिला अदालत की रिटायर्ड जज गिरीबाला सिंह थी और पति भोपाल जिला अदालत में क्रिमिनल लॉयर.
पोस्टमार्टम हुआ लेकिन कुछ ही घंटों में कई सवाल खड़े होने लगे जब ट्विशा के परिवार वालों ने शव लेने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि उनकी बेटी की हत्या हुई है और पोस्टमार्टम में लापरवाही बरती गई है ताकि इसे आत्महत्या बताया जा सके. पोस्टमार्टम में मालूम हुआ कि मौत से एक हफ्ते पहले ही ट्विशा ने गर्भपात करवाया था. इसके बाद ट्विशा के शव वो भोपाल एम्स की मोर्चरी में रखवा दिया गया. इस बीच ट्विशा का पति समर्थ सिंह फरार हो गया. पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करते हुए ट्विशा की सास गिरीबाला सिंह और पति समर्थ सिंह को आरोपी बनाया.
इसके 2-3 दिन तक तो मामले में बहुत ज्यादा डेवलपमेंट नहीं हुआ. 15 मई को भोपाल की ट्रायल कोर्ट मे ट्विशा की सास गिरीबाला सिंह को अग्रिम जमानत दे दी लेकिन बेटे समर्थ सिंह के लिए 17 मई की तारीख तय की गई. इस मामले ने 16 मई के दिन से नया मोड़ लिया जब ट्विशा के परिजन और रिश्तेदार भोपाल में मुख्यमंत्री निवास के बाहर धरने पर बैठ गए. उस दिन पहली बार मेरी ट्विशा के परिजनों से मुलाकात हुई. करीब 5 घंटे तक तपती दोपहर में खुले आसमान के नीचे ट्विशा के परिजन धरना देते रहे और सीएम मोहन यादव से मिलने की मांग की. काफी देर बाद ट्विशा के पिता नवनिधी शर्मा को सीएम हाउस के अंदर बुलाया गया लेकिन मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई लिहाजा सीएम के ओएसडी से मुलाकात कर उन्होंने ट्विशा के सेकंड पोस्टमार्टम और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की और गिरीबाला सिंह की अग्रिम जमानत को गलत बताया. परिवार ने शादी के बाद मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए और सबूत के तौर पर मुझे कई वॉट्सएप चैट दिखाए. ट्विशा के परिवार ने उसके ससुराल वालों पर आरोप लगाए कि वो बेहद प्रभावशाली लोग हैं जो जांच को प्रभावित कर सकते हैं. धीरे-धीरे यह मामला उन महिलाओं की भावनाओं से भी जुड़ने लगा, जिन्होंने अपने वैवाहिक जीवन में मानसिक दबाव और सामाजिक बोझ को महसूस किया है
17 मई: समर्थ को नहीं मिली बेल
इस दिन मैं सुबह ही अदालत पहुंच गया लेकिन समर्थ की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई दोपहर बाद ही हुई और कोर्ट ने समर्थ सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी जिससे परिजनों को एक उम्मीद दिखी लेकिन समर्थ अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर था. दूसरी तरफ सास गिरीबाला सिंह पर लगातार ट्विशा के परिजनों की ओर से प्रभावशाली होने के आरोप लगाए जा रहे थे जिसके बाद 17 मई की शाम गिरीबाला सिंह ने मीडिया से बात की और अपना पक्ष रखा. लेकिन मीडिया में उनके सामने आने के बाद मामला ठंडा पड़ने की बजाय और तूल पकड़ गया. गिरीबाला सिंह ने आरोप लगाए कि उनकी बहु ट्विशा एक ड्रग एडिक्ट थीं और उसने ही अपनी मर्जी से पति और उन्हे बिना भरोसे में लिए गर्भपात करवा लिया. ट्विशा की सास ने कहा कि वो ग्लैमर दुनिया से आती थी लिहाजा उसका नेचर ससुराल के माहौल से एकदम अलग था. गिरीबाला सिंह ने दहेज के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उल्टा उन्होंने और उनके बेटे समर्थ सिंह ने बीते 5 महीनों में करीब 8 लाख रुपए ट्विशा के खाते में डाले जिसकी यूपीआई रिसिप्ट कोर्ट में जमा करवाई गई. सास गिरीबाला सिंह ने यह भी बताया कि भोपाल के मशहूर मनोचिकित्सक डॉक्टर सत्यकांत त्रिवेदी से ट्विशा का इलाज चल रहा था और उन्होंने ही ट्विशा को एक काउंसलर का नंबर भी दिया था.
19 मई: मनोचिकित्सक ने कहा 'हां, मेरे क्लीनिक आई थी ट्विशा'
सास गिरीबाला के खुलासे के बाद मेरा अगला लक्ष्य था डॉक्टर सत्यकांत त्रिवेदी. 19 तारीख की सुबह से डॉक्टर सत्यकांत त्रिवेदी को मैनें कई कॉल किए लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि इस मामले में वो मीडिया से कोई बात नहीं करेंगे. लेकिन हार मानकर पीछे हटने वालों में से मैं भी नहीं था लिहाजा करीब 42 डिग्री तापमान में मैनें दोपहर से लेकर रात 9 बजे तक डॉक्टर सत्यकांत त्रिवेदी के क्लीनिक के बाहर डेरा डाल दिया और रात करीब 9 बजे जब वो क्लीनिक से निकले तो सामने मुझे खड़ा पाया. इसके बाद उन्होंने पहली बार इस मामले में किसी चैनल को इंटरव्यू दिया और मुझसे कहा कि हां ट्विशा उनके क्लीनिक आई थी और उन्होंने ट्विशा को एक काउंसलर के पास भी भेजा था. अगले दिन सुबह से यह इंटरव्यू वायरल हो गया.
लेकिन दूसरी तरफ ट्विशा के परिजनों ने लगातार ट्विशा की मौत को लेकर प्रदर्शन और प्रेस कांफ्रेंस का दौर जारी रखा और इस मामले ने धीरे-धीरे नेशनल मीडिया के प्राइम टाइम पर बाकी सभी खबरों को पछाड़ दिया. दिल्ली से अलग-अलग चैनलों के रिपोर्टरों और एंकर्स ने भोपाल में डेरा डाल दिया. एक टीम ट्विशा के परिजनों के पास, एक टीम गिरीबाला के घर के पास तो एक टीम पुलिस स्टेशन पर दिन-दिन भर खड़ी होने लगी. इस बीच 20 मई को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने ट्विशा के परिजनों को मिलने बुलाया और मंत्रालय में ट्विशा के पिता और भाई हर्षित से सीएम मोहन यादव ने मुलाकात कर मामले की सीबीआई जांच के लिए हामी भरी और परिवार को हर संभव मदद का भरोसा दिया.
22 मई: सेकंड पोस्टमार्टम पर मुहर और हाईकोर्ट में समर्थ की गिरफ्तारी का हाई-वोल्टेज ड्रामा
इस मामले में 22 मई का दिन बेहद अहम साबित हुआ जब हाईकोर्ट ने ट्विशा के सेकंड पोस्टमार्टम को मंजूरी दे दी और कहा कि दिल्ली एम्स की टीम भोपाल आकर ट्विशा के शव का दोबारा पोस्टमार्टम करे. लेकिन इसी दिन शाम को अचानक समर्थ जबलपुर हाईकोर्ट में सरेंडर करने पहुंच गया. हालांकि कोर्ट ने साफ कर दिया कि सरेंडर के लिए भोपाल जिला अदालत जाना होगा. इसके बाद समर्थ करीब 2 घंटे तक पुलिस और ट्विशा के परिजन के वकील अनुराग श्रीवास्तव को छकाता रहा लेकिन जबलपुर पुलिस ने उसे आखिरकार हिरासत में लिया और भोपाल पुलिस के सुपुर्द कर दिया. जिसके बाद पुलिस उसे लेकर जबलपुर से भोपाल के लिए रवाना हो गई. इसी दिन एमपी सरकार ने ट्विशा की मौत की जांच सीबीआई से करवाने की सिफारिश भी कर दी.
धार से भोपाल तक का वो सफर
जिस दिन जबलपुर हाईकोर्ट में यह ड्रामा चल रहा था उसी दिन मैं धार के भोजशाला में हाईकोर्ट के फैसले के बाद आए पहले शुक्रवार की कवरेज पर था. लेकिन भोजशाला से ज्यादा चैनल को मेरा लाइव ट्विशा मामले पर चाहिए था लिहाजा मैंने तय किया कि धार को जल्द छोड़ सीधा भोपाल रवाना हुआ जाए. इसके बाद तो पूरे रास्ते लाइव और फोनो में कट गया और जो रास्ता करीब 5 घंटे में पूरा हो जाता उसे पूरा होने में 7 घंटे लगे और रात करीब 12 बजे मैं भोपाल पहुंच गया. अब यहीं से एक पत्रकार के सामने वो पल होता है जिसमें उसे दो विकल्पों में से एक चुनना होता है. एक था दिन भर के कवरेज और 7 घंटे के सफर की थकान तो दूसरा था समर्थ की गिरफ्तारी के बाद उसकी सबसे पहली तस्वीर. मैनें फैसला किया कि एक रात सोए बगैर गुजारते हैं लिहाजा गाड़ी सीधे कटारा हिल्स थाने की ओर घुमा दी और रात 3 बजे जब पुलिस समर्थ को लेकर कटारा हिल्स थाने आई तो आजतक के कैमरे पर उसकी एक्सक्लूजिव तस्वीर भी मिल गई. लगा कि आराम और नींद त्यागने का फल तो मिला जिसने पूरी थकान दूर कर दी. कटारा हिल्स थाने से करीब 1 किलोमीटर दूर 11 मील बायपास पर बाकि 43 की रात चाय पीते कटी और सुबह 6 बजे से मैं फिर पहुंच गया थाने के सामने.
23 मई: 43 डिग्री सेल्सियस और दिन भर की भागदौड़
यह ट्विशा की मौत मामले की कवरेज के सबसे कठिन दिनों में से एक था जब 43 डिग्री की तेज गर्मी में थाने के बाहर खड़ा रहना पड़ा. सुबह से ही सूरज आग उगल रहा था और थाने के बाहर एक ही पेड़ के नीचे पूरी की पूरी नेशनल और रीजनल मीडिया की टीमों ने डेरा डाल दिया. 4-5 घंटे बाद पुलिस थाने से समर्थ को लेकर पुलिस मेडिकल के लिए निकली तो यब पहला मौका था उससे सवाल पूछने का. पुलिस जीप में बैठते समय पुलिस की धक्कों और भीड़ के बीच समर्थ से मैंने कई सवाल किए हालांकि उसने कोई जवाब नहीं दिया. पुलिस उसे सीधे जेपी अस्पताल ले गई जहां उसका मेडिकल हुआ और इसके बाद उसे कोर्ट में पेश किया. कोर्ट में समर्थ को देखने के लिए आम लोगों के साथ-साथ वकीलों को भी हुजूम उमड़ पड़ा और कोर्ट रूम जैसे एक भट्टी बन गया.
थोड़ी देर बाद पसीने से बेहाल आखिरकार मैं कोर्टरूम के बाहर आकर बैठ गया और देखते ही देखते करीब 2 घंटे बीत गए. शाम को कोर्ट ने फैसला सुनाया कि समर्थ को सात दिनों की पुलिस रिमांड में भेजा जाता है. इसके बाद पुलिस की गाड़ी का पीछा शुरु हुआ और ऐसे लगा जैसे भोपाल की सड़कों पर मीडिया की गाड़ियों की फॉर्मुला वन रेस चल रही हो. हर चैनल समर्थ की तस्वीर दिखाना चाहता था लेकिन किसी-किसी को ही वो मौका मिल सका. मेरी किस्मत हर बार अच्छी रही और हर कवरेज में समर्थ मेरे कैमरे में एक साफ दिखा.
24 मई: सेकंड पोस्टमार्टम और ट्विशा का अंतिम संस्कार
यही वो दिन था जब 12 दिनों से एम्स भोपाल के शवगृह में रखे ट्विशा के शव को आखिरकार मुक्ति मिलने वाली थी क्योंकि इसी दिन दिल्ली एम्स की टीम भोपाल एम्स पहुंची और करीब 4 घंटे तक ट्विशा के शव का सेकंड पोस्टमार्टम किया. इस दौरान ट्विशा के परिवार बाहर डटे रहे और फैसला किया कि पोस्टमार्टम खत्म होते ही ट्विशा का अंतिम संस्कार किया जाएगा. पोस्टमार्टम के बाद ट्विशा का शव जब पहली बार शवगृह से बाहर आया तो परिवार के इतने दिनों की हिम्मत जवाब दे गई और वो फूट-फूट कर रोने लगे. फिर शुरु हुआ शवगृह से श्मशान घाट तक ट्विशा का अंतिम सफर और मीडिया की गाड़ियों का रेला जो हर तस्वीर सबसे पहले और सबसे नजदीक से दिखाना चाहता था. करीब आधे घंटे बाद भदभदा श्मशान घाट जब ट्विशा का शव लेकर परिवार पहुंचा तो वहां मौजूद हर आंख नम हो गई. श्मशान की खामोशी में सिर्फ उसके परिवार का रूदन शोर को तोड़ रहा था. भाई हर्षित ने अपनी बहन की चिता को मुखाग्नी दी और इस तरह मौत के 12 दिन बाद ट्विशा पंचतत्व में विलीन हो गई.
25 मई की रात सीबीआई की एक टीम भोपाल पहुंच गई और अगले ही दिन 26 मई को टीम गिरिबाला के घर पहुंची और करीब 2 घंटे तक वहां मौजूद रही. इसके बाद टीम ट्विशा के परिजनों से मिलने के लिए सीबीआई की टीम भोपाल कैंट गई. इस दौरान मेरी गाड़ी लगातार सीबीआई की टीम के साथ तेज रफ्तार से चलती रही और हर एक तस्वीर दर्शकों तक सबसे पहले और एक्सक्लूसिव पहुंचाई. लेकिन शाम होते-होते मामले में नया मोड़ आया जब एमपी पुलिस की एसआईटी समर्थ को लेकर घर पहुंची और पूछताछ की. 26 मई को दिन भर पुलिस केस डायरी तैयार करती रही और आकिरकार रात करीब 10 बजे केस डायरी सीबीआई को सौंप दी गई. इस तरह करीब 15 घंटे चली कवरेज के बाद दिन कुछ इस तरह खत्म हुआ.
27 मई को सीबीआई ने समर्थ की कस्टडी हासिल की. इस दौरान मैने दो बार समर्थ से सवाल पूछे लेकिन वो चुप रहा. दिन भर पुलिस थाने, एम्स, कोर्ट के चक्कर काटने के बाद जब हमें लगा कि अब दिन ढल रहा है तो थोड़ा आराम कर लें तभी अचानक से कटारा हिल्स थाने से पुलिस समर्थ को लेकर तेजी से रवाना हुई. मैनें भी गाड़ी पुलिस जीप के ठीक पीछे लगाई और पीछा करते हुए देखा कि गाड़ी समर्थ के घर की ओर मुड़ गई है. जैसे ही हम वहां पहुंचे तो पाया कि सीबीआई वहां पहले से मौजूद है और वो समर्थ को लेकर घर के अंदर गई और करीब 3 घंटे तक समर्थ और गिरिबाला से पूछताछ की गई. इसी दिन सीबीआई ने पूरे घर का डिजिटल नक्शा भी हाईटेक मशीनों से तैयार करवाया.
रात करीब 10 बजे सीबीआई अपनी गाड़ी में समर्थ को बैठाकर रवाना हो गई. लेकिन मेरा काम अभी ख़त्म नहीं हुआ था क्योंकि इसी दिन जबलपुर हाई कोर्ट में गिरिबाला की बेल एप्लीकेशन को रद्द करने पर सुनवाई हो चुकी थी लेकिन जज ने फ़ैसला यह कहकर सुरक्षित रख लिया था कि फ़ैसला आज ही होगा लेकिन उस फ़ैसले को आते आते रात के 1 बज़ गए और उसके बाद ही मैं उस रात घर जा सका लेकिन सिर्फ़ कुछ घंटों के लिए क्यूँकि जमानत रद्द होने का मतलब था कि सीबीआई किसी भी समय गिरिबाला को गिरफ़्तार कर सकती है लिहाजा सुबह जल्दी आना ही इकलौता विकल्प था.
28 मई: 7 घंटे की पूछताछ और सास की गिरफ्तारी
28 मई की सुबह लगभग 7 बजे मैं गिरिबाला के घर पर पहुंच गया. देखा कि इतने दिनों से मीडिया की गाड़ियां जिस जगह बिना रोकटोक के आ रही थी वहां आज पुलिस के बैरिकेड लगे हुए थे. घर के बाहर एकदम शांति थी. तभी अचानक गिरिबाला सिंह आई और घर के सामने एक स्ट्रीट डॉग को आकर खाना दिया और मीडिया से बिना बात किए घर के अंदर चली गई. साढ़े दस बजे जैसे ही सीबीआई की टीम गिरिबाला सिंह के घर पहुंची, पूरे इलाके की धड़कनें तेज़ हो गईं. सीबीआई की एक गाड़ी सीधे घर के अंदर चली गईं। इसके बाद शुरू हुआ पूछताछ का वो सिलसिला, जो लगातार पूरे सात घंटे तक चला.
हर हलचल, हर मूवमेंट और हर अपडेट पर मेरी नज़र थी. तपती मई की गर्मी, सिर पर चुभती धूप और लगातार चलती कवरेज के बीच कई लीटर पानी पीना पड़ा, लेकिन जगह नहीं छोड़ी. कैमरा लगातार ऑन था और निगाहें सिर्फ उस दरवाज़े पर टिकी थीं जहाँ से हर कुछ देर में नई हलचल दिख रही थी. घंटों की पूछताछ के बाद शाम होते-होते वो पल आया जिसका पिछले सोलह दिनों से इंतज़ार किया जा रहा था. सीबीआई ने गिरिबाला सिंह को गिरफ्तार किया और जब उन्हें बाहर लाया गया, तब सबसे नज़दीक की तस्वीर मेरे ही कैमरे में कैद हुई. उस वक्त वहाँ मौजूद हर चेहरे पर तनाव, बेचैनी और लंबे इंतज़ार के खत्म होने का एहसास साफ दिखाई दे रहा था. ये सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं थी.
ये ट्विशा के परिवार के उस इंतज़ार का अंत था, जो पिछले सोलह दिनों से न्याय की उम्मीद में हर दिन गिन रहा था. और मेरे लिए भी ये उन सोलह दिनों की लगातार दौड़भाग, 42 डिग्री की गर्मी, धूल, पसीना, मोबाइल पर लिखते हर अपडेट्स और रोज़ाना 15-16 घंटे की शिफ्ट्स का एक निर्णायक पड़ाव था. मेरे लिए यह कवरेज लगभग बिना रुके चलने वाली ड्यूटी बन चुकी थी. 16 दिनों तक मानो नींद और समय दोनों पीछे छूट गए.
मैं जो इस केस को लगातार कवर कर रहा था, उसके लिए ये 16 दिन सिर्फ दिन नहीं थे बल्कि यह थे-
धूप में घंटों इंतजार.
अचानक कोर्ट मूवमेंट.
आधी रात की अपडेट.
बिना रुके लाइव कवरेज.
और कई ऐसे भावुक दृश्य जो कैमरे बंद होने के बाद भी दिमाग से नहीं निकले. लेकिन 16 दिनों की इस भागदौड़ के बाद भी सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है “आखिर ट्विशा को इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर किसने किया?”
रवीश पाल सिंह