साहित्य का राष्ट्रधर्म: 'आज के समय में देश की सबसे बड़ी चिंता है भीड़तंत्र'

साहित्य आजतक 2018 में सजे मंचों पर साहित्य और कलाप्रेमी शब्द, कला, कविता, संगीत, नाटक, सियासत और संस्कृति से जुड़ी बातों को देखेंगे और सुनेंगे. यहां मौजूद कई हस्तियां जिन्हें अबतक आपने सिर्फ पढ़ा है, या परदे पर देखा है. साहित्य आजतक पर इन हस्तियों से अब आप रूबरू होंगे.

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साहित्य का राष्ट्रधर्म सेशन के दौरान नंदकिशोर पांडेय, ममता कालिया और अखिलेश साहित्य का राष्ट्रधर्म सेशन के दौरान नंदकिशोर पांडेय, ममता कालिया और अखिलेश

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 16 नवंबर 2018,
  • अपडेटेड 6:24 PM IST

अंग्रेजी और हिंदी की जानी-मानी कथाकार ममता कालिया ने साहित्य आजतक के मंच पर मॉब लिंचिंग के मुद्दे पर चिंता व्यक्त की. साहित्य आजतक के हल्ला बोल पर मंच पर हुई साहित्य का राष्ट्रधर्म मुद्दे पर बहस के दौरान कहा कि आज देश की सबसे बड़ी चिंता है कि आज भीड़ खुद ही न्याय कर रही है.

उन्होंने कहा कि लेखक को इनके प्रति भी सचेत होना पड़ेगा, लेखक परिवर्तन करने वाली भूमिका में होता है. इस बारे में मनोज पांडे ने 'लालच के बारे में खजाना' में कहा है.

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वरिष्ठ लेखिका ममता ने बताया कि नागार्जुन ने कहा था, ''जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक, बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक''. उन्होंने कहा कि राष्ट्र शब्द को किसी पुलिसवाले की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

ममता कालिया ने कहा कि पुराने जमाने के लेखकों की रचनाओं में देशभक्ति कूट-कूट करभरी रहती थी, क्योंकि ये तब की मांग थी. तब सभी का मकसद अंग्रेजों को भगाना था, लेकिन अब देश आजाद है. देशभक्ति को अब हम झंडे की तरह उठाकर नहीं चल सकते हैं, कुछ गलत होने का विरोध करना भी राष्ट्रभक्ति ही कहलाता है.

बता दें कि इस सेशन में ममता कालिया के अलावा नंद किशोर पांडेय और अखिलेश जैसे बड़े लेखक भी शामिल हुए. इन लेखकों ने भी देश में राष्ट्रवाद, आज के साहित्य, लेखकों के बारे में बात है.

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