वे अयोध्या में उम्मीदों के मौसम में पैदा हुए और सात साल की उम्र में शायरी लिखनी शुरू कर दी. यानी कि इससे पहले कि वो समझ पाते चाहत क्या चीज होती है, वे उसे बयां करने के लिए शब्दों की तलाश में थे. 91 साल की लंबी जिंदगी में उन्होंने 18,000 से ज़्यादा शेर लिखे. अमूमन यह तादाद बहुत ज़्यादा है. लेकिन यह कोई आंकड़ा नहीं है. यह तो एक दरिया है.
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
बशीर बद्र का 28 मई, 2026 को भोपाल में निधन हो गया और उनके साथ ही एक खास तरह की शायरी भी विदा हो गई. जो कोमल थी, बहुत आत्मीय, बिना किसी हड़बड़ी वाली, और जिसकी आवाज किसी आम दोपहर की तरह सहज थी.
उनकी गजल कोई ऐसी राजकुमारी नहीं थी जो भारी-भरकम भाषा से सजी-धजी हो, या जिसमें दार्शनिक उलझनों के नखरे और शब्दों की चालाकी भरी अदाएं हों. उनकी गजल तो एक ऐसी महबूबा की तरह थी जिसके साथ वे ह्रदय की कंपन और फुसफुसाहटों को साझा करते थे; जिसमें प्यार के नाजुक एहसास और सच्ची बातें बड़ी सहजता और बातचीत के अंदाज में कही जाती थीं.
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ
मिरा लफ़्ज़ लफ़्ज़ हो आईना तुझे आइने में उतार लूँ
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा
उन्हें किसी कला-पारखी की तारीफ भरी सहमति नहीं, बल्कि आम आदमी की वह आह-भरी 'वाह' चाहिए थी. जो जिंदगी की जद्दोजहद में फंसा तो है, लेकिन जिसका दिल अब भी जज़्बातों से धड़कता है. सबसे बड़ी बात यह थी कि वे जानी-पहचानी चीजों के शायर थे. उनके विषय थे प्यार, तड़प, बिछड़न, धोखा और यादें, यानी इंसानी दिल के वे एहसास जिन्हें हम सब महसूस करते हैं. उनकी पंक्तियां ऐसी लगती थीं, मानो कोई बात जो हमारे मन में तो थी, पर जिसे हम खुद शब्दों में नहीं ढाल पा रहे थे.
कोई काँटा चुभा नहीं होता
दिल अगर फूल सा नहीं होता
कुछ तो मजबूरियाँ रहीं होंगी
यूँ कोई बेवफा नहीं होता
यही उनकी प्रतिभा और उनका लोकतांत्रिक नजरिया था. उर्दू शायरी लंबे समय से एक खास भव्यता से बंधी रही है. क्लासिकल परंपरा का भारी-भरकम शब्द-भंडार, उसकी फारसी विरासत, उसकी जटिल नियम-कायदे. बद्र ने इस विरासत को न तो छोड़ा और न ही नकारा- वे मानते थे कि मीर या गालिब के बिना उनकी शायरी मुमकिन नहीं थी- उसने इसे शुक्रगुजारी और आदर के साथ लिया, लेकिन बिना किसी अंधानुकरण या डर के. खास बात यह थी कि उन्होंने 'शॉल', 'पुलओवर', 'रिबन' जैसे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल इस तरह किया कि वे आम बोलचाल की भाषा का ही हिस्सा बन गए.
कोई फूल धूप की पत्तियों में, हरे रिबन से बंधा हुआ वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ.
अपनी गजलों में रोजमर्रा की बोलचाल की भाषा को कुशलता से पिरोकर, उन्होंने पारंपरिक नियमों की बंदिशों को तोड़ा और शायरी को आम लोगों के लिए बेहद सुलभ बना दिया. ये लाइनें इतनी सहज थीं कि किसी अनुवाद की जरूरत नहीं थी. आम जिंदगी और रोजमर्रा की बातें तो पहले से ही गजल का हिस्सा थीं.
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो
उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और बाद में मेरठ कॉलेज में पढ़ाया. मेरठ में ही 1987 में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में उनका घर और उसमें मौजूद हर चीज़- जिसमें कई अप्रकाशित पांडुलिपियां भी शामिल थीं- जलकर खाक हो गईं. तब उन्होंने फिर से रचा.
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
एक कवि जिसने अपनी जिंदगी नश्वरता के बारे में लिखते हुए बिताई थी, शायद उसने नुकसान को सहने की एक अनोखी तैयारी कर ली थी. वे आगे बढ़ते रहे. और लिखते रहे-
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है
उन्हें 1999 में उनके कविता संग्रह 'आस' (उम्मीद) के लिए पद्म श्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. पीछे मुड़कर देखने पर इस संग्रह का यह नाम किसी विदाई संदेश जैसा लगता है.
उन्होंने उर्दू शायरी के सात से ज़्यादा संग्रह प्रकाशित किए. जब बुढ़ापे में उन्हें डिमेंशिया हुआ और इसने बेरहमी से वे शेर छीन लिए जिन्हें रचने में उन्होंने अपनी जिंदगी लगा दी थी, तब भी उनकी शायरी जिंदा रहीं- दूसरों की ज़ुबान पर, ट्रकों पर लिखी हुई और व्हाट्सएप फॉर्वर्ड के तौर पर. आख़िरकार, वे यही तो चाहते भी थे.
मुझे ख़ुदा ने ग़ज़ल का दयार बख़्शा है ये सल्तनत मैं मोहब्बत के नाम करता हूं.
बशीर बद्र ने एक ऐसी बात समझी थी जो कई बड़े शायरों से कभी-कभी छूट जाती हैं. गजल की ताकत आम बोलचाल से दूर रहने में नहीं, बल्कि उसके करीब रहने में है. सबसे दिल को छू लेने वाली लाइन अक्सर वही होती है जो आपको हमेशा से जानी-पहचानी लगती है. उन्होंने लोगों को उनकी अपनी अनकही भावनाएं तुकबंदियों में लौटाईं. और लोगों ने उन्हें इसके लिए पसंद किया, भले ही वे पूरी तरह से इसकी वजह न जानते हों.
देश के किसी छोटे से शहर के कॉलेज कैंटीन में यह मिसरा सुनाइए.
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
पीछे से 'कोई' आवाज आएगी और लाइनें पूरी हो जाएंगी.
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
वो 'कोई' जो इस शायरी को पूरा करेगा, हो सकता है कि शायर का नाम भी नहीं जानता हो... लेकिन बशीर बद्र की यही सबसे बड़ी कामयाबी है.
बंदीप सिंह