सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जिससे NCR के 40 हजार होम बॉयर्स का कल्याण हो जाएगा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट अथॉरिटी (NOIDA) की एक याचिका को खारिज कर दिया. कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह भी कहा कि नोएडा अथॉरिटी फाइनेंशल क्रेडिटर नहीं केवल ऑपरेशनल क्रेडिटर है.

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होम बॉयर्स के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला होम बॉयर्स के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अभि‍षेक आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2022,
  • अपडेटेड 10:32 PM IST
  • पोसेशन का इंतजार कर रहे ग्राहकों को फायदा
  • NOIDA का फैसलों में वोटिंग का अधिकार समाप्त

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट अथॉरिटी (NOIDA) की एक याचिका को खारिज कर दिया. उस याचिका के खारिज होने के बाद कहा जा रहा है कि जो भी होम बायर्स अपने फ्लैट के पोसेशन का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें बड़ी राहत मिलने वाली है. कंपनी द्वारा उनसे अब कम पैसे मांगे जाएंगे. 

इस बारे में याचिकाकर्ता मनीष गुप्ता बताते हैं कि न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट अथॉरिटी (NOIDA) अब क्रेडिटर्स वाली कमेटी का हिस्सा नहीं होगा. सिर्फ बैंक होगा, ग्राहक होगा और उनसे डील करने वाली कंपनी. यहां ये जानना भी जरूरी हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद NOIDA का अहम फैसलों में वोटिंग का अधिकार भी समाप्त हो जाएगा. मनीष गुप्ता ने इस बात की भी जानकारी दी है कि पहले NOIDA का जो भी बकाया होता था, वो सब कुछ उस डिफॉल्ट बिल्डर के सिर चढ़ता था. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वो बकाया भी कम रह जाएगा क्योंकि उस राशि को लेकर निर्णय क्रेडिटर्स के समूह द्वारा लिया जाएगा. नोएडा अथॉरिटी की कोई भूमिका नहीं रहने वाली है.

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फैसले के बाद 40 हजार होम बॉयर्स को भी सीधा फायदा पहुंचने वाला है क्योंकि जमीन की बकाया राशि की मांग में नोएडा प्राधिकरण की कम भागीदारी के कारण दिवालिया होने की मांग करने वाले बिल्डरों का काम आसान हो जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की बात करें तो उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि NCLT और NCLAT दोनों इस आधार पर आगे बढ़े हैं कि याचिकार्ता (NOIDA) एक ऑपरेशनल क्रेडिटर है. इस आधार पर हम मानते हैं कि अपीलकर्ता फाइनेंशल क्रेडिटर नहीं बल्कि ऑपरेशनल क्रेडिटर है. यहां यह जानना भी जरूरी है कि NCLT एक न्यायनिर्णायक प्राधिकारी है जो कि IBC के तहत कंपनियों की दिवाला समाधान प्रक्रिया को देखता है. इसके फैसले के खिलाफ NCLAT पर अपील की जा सकती है.

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