दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत एवरेस्ट की चढ़ाई सबके बस की बात नहीं है. एवरेस्ट पर जाने वाले कई लोग चढ़ाई से पहले परिवार वालों के पास यह लिखकर जाते हैं कि अगर ऊपर कोई हादसा हो गया या मेरी मौत हो गई, तो मेरी बॉडी को नीचे मत लाना. इसी तरह कई पर्वतरोहियों के परिवार स्वेच्छा से किसी हादसे के बाद उनके शव को ऊपर ही छोड़ देते हैं. अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है?
नेपाल और तिब्बत के बीच स्थित एवरेस्ट की चोटी 29,032 फीट (8,849 मीटर) ऊंची है. माउंट एवरेस्ट पर पाई जाने वाली सामान्य परिस्थितियां, इसकी चढ़ाई को और भी ज्यादा मुश्किल और दुर्गम बना देती है.
काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एवरेस्ट पर चढ़ाई के रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से अब तक 300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और अनुमानित 200 शव अभी भी पर्वत पर मौजूद हैं. इनमें से कई 8,000 मीटर से ऊपर स्थित 'डेथ जोन' में पड़े हैं. यह इलाका पर्वतरोहियों के लिए सबसे बड़ा चैलेंज होता है. इसकी वजह अत्यधिक ऊंचाई, खराब मौसम और ऑक्सीजन की कमी है. यही वो इलाका है जहां सबसे ज्यादा पर्वतरोहियों की जान गई है.
क्या है एवरेस्ट का 'डेथ जोन'
ऐसे में 8000 मीटर से ऊपर स्थित डेथ जोन में किसी हिमस्खलन या ऑक्सीजन की कमी की वजह से कई बार पर्वतरोहियों की मौत हो जाती है. तब इनके शवों को ऊपर ही छोड़ दिया जाता है. क्योंकि अत्यधिक ऊंचाई, खराब मौसम और दुर्गम भूभाग के कारण शवों को निकालना पर्वतारोहण के सबसे खतरनाक अभियानों में से एक बन जाता है.
ऊपरी शिविरों से शवों को निकालना जोखिम भरा और खर्चीला दोनों है. क्योंकि वहां हवा बहुत पतली होती है और इसके लिए बहुत अधिक जनशक्ति की आवश्यकता होती है. पर्वतारोहण अधिकारियों के अनुसार, एवरेस्ट से शव को निकालने में शव के स्थान और अभियान की जटिलता के आधार पर 20,000 डॉलर से लेकर 200,000 डॉलर तक का खर्च आ सकता है. यानी एक शव को निकालने में 25 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च आ सकता है.
क्यों एवरेस्ट पर ही छोड़ दिए जाते हैं शव
एवरेस्ट क्षेत्र में अपशिष्ट प्रबंधन के लिए जिम्मेदार संगठन सागरमाथा पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी (एसपीसीसी)के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शेरिंग शेरपा के मुताबिक, खराब मौसम से उत्पन्न कठिनाइयों और लागत संबंधी कारणों से अधिकांश पर्वतारोहियों के शव एवरेस्ट पर ही छोड़ दिए जाते हैं. कुछ परिवार स्वेच्छा से शव को एवरेस्ट पर ही छोड़ना देना चाहते हैं, जबकि अन्य शव को लाने का खर्च वहन नहीं कर सकते. वहीं कुछ पर्वतरोही पहले से ऐसा लिखकर जाते हैं कि मरने के बाद उनके शव नीचे नहीं लाए जाए.
एवरेस्ट पर चढ़ना कितना मुश्किल या यूं कहें कि नामुमकिन है, इस बारे में सीएनएन से एवरेस्ट पर चढ़ने वाले एक ट्रॉमा सर्जन डॉ. जैकब वीजल ने अपना अनुभव शेयर किया था. उन्होंने लगभग एक साल की तैयारी के बाद 2023 मई में एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक विजय प्राप्त की.
यहां एक घंटे के अंदर हो सकती है मौत
उन्होंने बताया कि अगर आप किसी को एवरेस्ट के शिखर पर भी नहीं, बल्कि उसके हाई कैंप में ही छोड़ दें, तो संभावना है कि वह 10 से 15 मिनट के भीतर कोमा में चला जाएगा. और वे एक घंटे के भीतर मर जाएंगे क्योंकि उनका शरीर ऑक्सीजन के इतने कम स्तर के अनुकूल नहीं है.
अपनी उच्चतम ऊंचाई पर, एवरेस्ट पर मानव जीवन लगभग असंभव है और 23,000 फीट (8000 मीटर) से ऊपर अधिकांश पर्वतारोही सप्लीमेंट्री ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं. ऑक्सीजन की कमी शिखर पर चढ़ने का प्रयास करने वाले पर्वतारोहियों के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है, क्योंकि एवरेस्ट के 'डेथ जोन' तक पहुँचने पर ऑक्सीजन का स्तर 40% से भी कम हो जाता है.
26,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित अंतिम हाई कैंप यानी डेथ जोन के किनारे तक पहुंचने पर पर्वतारोहियों को हवा की एक अत्यंत पतली परत, शून्य से नीचे के तापमान और इतनी शक्तिशाली हवाओं का सामना करना पड़ता है जो किसी व्यक्ति को पहाड़ से नीचे गिरा सकती हैं. ऐसे में अगर वहां किसी की मौत हो जाए तो उसके शव को नीचे लाना मौत को दावत देने वाला अभियान साबित हो सकता है.
aajtak.in