क्या आपने कभी दिल्ली के सरोजनी नगर, लाजपत नगर या गांधी नगर जैसे बाजारों में घूमते हुए सोचा है कि जिस जींस की कीमत किसी बड़े मॉल में 5,000 रुपये लिखी होती है, वही कपड़ा यहां 800 या 1,000 रुपये में कैसे मिल जाता है? पहली नजर में ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि इतनी कम कीमत है, मतलब कपड़ा नकली होगा. लेकिन सच्चाई कुछ और है. कुछ कपड़े वाकई नकली होते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे कपड़े भी होते हैं जिनके सस्ते होने के पीछे एक पूरी कहानी छिपी होती है.
सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसी रील और पोस्ट वायरल होती हैं, जिनमें दावा किया जाता है कि बाजार में बहुत सस्ते या आधे दाम पर मिलने वाले कपड़े मरे हुए लोगों के होते हैं. लेकिन अब तक इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई विश्वसनीय सबूत या आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है. कई मामलों में सस्ते कपड़े एक्सपोर्ट सरप्लस, फैक्ट्री के बचे हुए स्टॉक या हल्की-फुल्की कमी या रिजक्ट कपड़े होते हैं, जिन्हें कम कीमत पर बेचा जाता है. इसलिए सोशल मीडिया पर वायरल दावों पर आंख बंद करके भरोसा करने के बजाय हमेशा भरोसेमंद जानकारी पर ही विश्वास करें.
दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी कहानी की शुरुआत किसी बाजार, मॉल या दुकान से नहीं होती, बल्कि कई बड़े-बड़े फैक्ट्रियों से होती है जहां दुनिया के नामी फैशन ब्रांड्स के कपड़े तैयार किए जाते हैं. भारत की हजारों फैक्ट्रियों में हर साल करोड़ों कपड़े तैयार होते हैं, जिनमें से बड़ी मात्रा अमेरिका, यूरोप और दुनिया के कई देशों में एक्सपोर्ट की जाती है. यही वजह है कि भारत वैश्विक गारमेंट उद्योग का एक अहम केंद्र बन चुका है. नोएडा, गुरुग्राम, तिरुपुर, बेंगलुरु और लुधियाना जैसे शहरों में दिन-रात हजारों फैक्ट्रियां में काम होता है.
क्यों सस्ते मिलते हैं ब्रांडेड कपड़े
इन्हीं फैक्ट्रियों में Zara, H&M, Levi's, Puma, Adidas, Marks & Spencer समेत कई अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के लिए लाखों कपड़े तैयार किए जाते हैं. जांच पूरी होने के बाद इनका बड़ा हिस्सा अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप, मध्य-पूर्व और दुनिया के कई देशों में भेज दिया जाता है, लेकिन यहीं से शुरू होती है उस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. हर तैयार हुआ कपड़ा विदेश नहीं पहुंचता. कुछ कपड़े ज्यादा प्रोडक्शन, एक्सपोर्ट सरप्लस, स्टॉक क्लियरेंस या कई कारणों से भारत में ही रह जाते हैं और बाद में अलग-अलग सप्लाई चैनलों के जरिए हमारे बाजारों तक पहुंचते हैं. यही वजह है कि कई बार हजारों रुपये की ब्रांडेड शर्ट या जींस आपको उसकी असली कीमत से आधे या उससे भी कम दाम में मिल जाती है.
गांधी नगर में कान्हा कलेक्शन शोरूम मालिक शमीम अहमद ने बताया कि कैसे दिल्ली के मार्केट में कई ब्रांडेड कपड़े सस्ते में मिल जाते हैं. शमीम बताते हैं कि मान लीजिए किसी विदेशी ब्रांड ने 1 लाख टी-शर्ट का ऑर्डर दिया. फैक्ट्री कई बार सुरक्षा के तौर पर 1.03 लाख या 1.05 लाख टी-शर्ट तैयार कर देती है ताकि अगर कुछ पीस क्वालिटी चेक में रिजेक्ट हो जाएं, तब भी ऑर्डर पूरा हो सके. जब ऑर्डर पूरा हो जाता है, तो बचे हुए अतिरिक्त कपड़ों को अक्सर एक्सपोर्ट सरप्लस कहा जाता है. यही एक्सपोर्ट सरप्लस बाद में अलग-अलग चैनलों के जरिए स्थानीय बाजारों तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि कई बार आपको बिल्कुल नए, अच्छी क्वालिटी वाले कपड़े सामान्य कीमत से काफी कम दाम में मिल जाते हैं.
ओवररन और स्टॉक क्लीयरेंस भी बड़ा कारण
कई बार कंपनियां जरूरत से थोड़ा ज्यादा प्रोडक्शन कर देती हैं. इसे ओवररन कहा जाता है. वहीं जब किसी ब्रांड का नया कलेक्शन आने वाला होता है, तो पुराने स्टॉक को जल्दी निकालने के लिए भारी छूट दी जाती है. यही स्टॉक बाद में फैक्ट्री आउटलेट, डिस्काउंट स्टोर या थोक व्यापारियों तक पहुंच जाता है. यही कारण है कि कुछ बाजारों में आपको वही ब्रांडेड शर्ट या जींस आधी कीमत पर मिल सकती है, जिसे आपने कुछ महीने पहले मॉल में कई हजार रुपये में देखा था.
विदेशों से भी आते हैं कपड़े
कमला नगर में दुकान चलाने वाले युसूफ कहते हैं कि बहुत से लोगों को लगता है कि भारत में बिकने वाले सभी सस्ते ब्रांडेड कपड़े यहीं बनते हैं. ऐसा पूरी तरह सही नहीं है. कुछ कपड़े, बांग्लादेश, वियतनाम, चीन, कंबोडिया, इंडोनेशिया, तुर्की और श्रीलंका जैसे देशों से भी आते हैं. ये देश दुनिया के बड़े गारमेंट निर्माण केंद्र हैं, जहां कई अंतरराष्ट्रीय फैशन ब्रांड अपना प्रोडक्शन करवाते हैं. इन देशों से कभी-कभी स्टॉक क्लीयरेंस, लिक्विडेशन स्टॉक या अधिकृत अतिरिक्त माल अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के जरिए दूसरे देशों तक पहुंचता है. इसके बाद यही माल भारत के कुछ थोक बाजारों तक भी पहुंच सकता है.
क्या विदेशों के पहने हुए कपड़े भी भारत आते हैं?
इस सवाल का जवाब थोड़ा दिलचस्प है. दुनिया के कई देशों में थ्रिफ्ट और सेकेंड-हैंड फैशन का चलन काफी पुराना है. अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के कई देशों में लोग ऐसे कपड़े दान कर देते हैं जिन्हें उन्होंने कम इस्तेमाल किया हो. कई लोग फैशन बदलने पर भी अपने कपड़े बेच देते हैं.
इन कपड़ों का एक हिस्सा स्थानीय थ्रिफ्ट स्टोर में बिकता है, जबकि कुछ देशों में इन्हें बड़े स्तर पर छांट कर दूसरे देशों को एक्सपोर्ट भी किया जाता है. हालांकि भारत में इस्तेमाल किए गए कपड़ों के आयात पर नियम लागू होते हैं और हर सेकेंड-हैंड कपड़ा सीधे बाजार में नहीं बिक सकता. इसलिए यह मान लेना गलत होगा कि बाजार में मिलने वाला हर सस्ता कपड़ा विदेश से पहना हुआ आता है.
आखिर सरोजिनी नगर इतना मशहूर क्यों है?
दिल्ली का सरोजिनी नगर सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि फैशन प्रेमियों के लिए किसी खजाने से कम नहीं माना जाता. यहां आपको ट्रेंडी कपड़े, एक्सपोर्ट सरप्लस, स्टॉक क्लियरेंस और कई तरह के फैशन प्रोडक्ट्स एक ही जगह मिल जाते हैं. अच्छी बात यह है कि अगर आपको मोलभाव करना आता है, तो कीमत और भी कम हो सकती है. लाजपत नगर भी अच्छी क्वालिटी के कपड़ों और एथनिक फैशन के लिए जाना जाता है. वहीं गांधी नगर एशिया के सबसे बड़े रेडीमेड गारमेंट होलसेल बाजारों में गिना जाता है, जहां से देश के कई राज्यों में कपड़ों की सप्लाई होती है.
दिल्ली के जाफराबाद इलाके का नाम भी ब्राइडल वियर और लहंगे के कारोबार में लिया जाता है. यहां कई छोटे-बड़े निर्माता शादी-ब्याह के कपड़े तैयार करते हैं. इसके अलावा कुछ दुकानों पर प्री-ओन्ड या एक-दो बार इस्तेमाल किए गए ब्राइडल परिधान भी कम कीमत पर मिल सकते हैं, हालांकि यह हर दुकान पर उपलब्ध हो, ऐसा जरूरी नहीं है.
लेकिन हर सस्ता कपड़ा ओरिजिनल नहीं होता
यहीं सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है. बाजार में आपको एक्सपोर्ट सरप्लस के साथ-साथ फर्स्ट कॉपी, रेप्लिका और बिना लाइसेंस वाले प्रोडक्ट भी मिल सकते हैं. कई बार ब्रांड का लोगो देखकर लोग उसे असली मान लेते हैं, जबकि असलियत कुछ और होती है. अगर आप अच्छी खरीदारी करना चाहते हैं, तो हमेशा कपड़े की सिलाई, फैब्रिक, टैग, बटन, जिप और फिनिशिंग ध्यान से देखें. किसी भी दुकान पर सिर्फ ब्रांड का नाम देखकर भरोसा न करें.
आखिर इतने सस्ते कैसे मिल जाते हैं?
इसका जवाब एक नहीं, बल्कि कई कारणों में छिपा है. कहीं एक्सपोर्ट सरप्लस होता है, कहीं ओवररन, कहीं स्टॉक क्लीयरेंस, कहीं फैक्ट्री आउटलेट और कहीं बड़े थोक व्यापारियों का नेटवर्क. इसी वजह से एक ही तरह का कपड़ा अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग कीमत में दिखाई देता है. अगली बार जब आप किसी बाजार में 800 रुपये की ब्रांडेड जींस या 500 रुपये की ब्रांडेड शर्ट देखें, तो तुरंत यह मत मान लीजिए कि वह नकली ही होगी. हो सकता है वह एक्सपोर्ट सरप्लस हो, स्टॉक क्लीयरेंस का हिस्सा हो या किसी फैक्ट्री के अधिक प्रोडक्शन से आया हो. यह भी संभव है कि वह फर्स्ट कॉपी हो.
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