धर्मनगरी हरिद्वार में इन दिनों 'वेज बिरयानी बनाम वेज पुलाव' को लेकर एक नई मुहिम चर्चा का विषय बनी हुई है. इस अभियान की शुरुआत अखंड परशुराम अखाड़ा और संत समाज की ओर से की गई थी, जो अब तेजी से आगे बढ़ रही है. श्री हिंदू तख्त के प्रदेश अध्यक्ष यश देव कौशिक के नेतृत्व में संत समाज, ब्राह्मण समाज और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मिलकर हरिद्वार और कनखल क्षेत्र में दुकानों, ठेलियों और रेहड़ी-पटरियों पर लगे 'वेज बिरयानी' के पोस्टर हटाए और उनकी जगह 'वेज पुलाव' के पोस्टर व स्टिकर लगाए.
अभियान में शामिल लोगों का कहना है कि हरिद्वार एक धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी है, इसलिए यहां की पहचान और परंपराओं को बनाए रखना जरूरी है. यश देव कौशिक ने कहा कि मायापुरी और हर की पौड़ी क्षेत्र में 'बिरयानी' शब्द के बजाय 'पुलाव' शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. उनका मानना है कि बिरयानी शब्द लोगों के मन में मांसाहारी भोजन की छवि पैदा करता है, जबकि पुलाव भारतीय संस्कृति के अधिक करीब माना जाता है.
इस अभियान को जूना अखाड़े के संतों का भी समर्थन मिला है. माया देवी मंदिर के मुख्य पुजारी भास्करपुरी महाराज ने कहा कि शब्दों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है. उनका मानना है कि यदि 'बिरयानी' की जगह 'पुलाव' शब्द का प्रयोग किया जाए तो लोगों की सोच और खानपान की धारणा में भी बदलाव आएगा. उन्होंने इसे गंगा तट और धार्मिक स्थलों की पवित्रता बनाए रखने से जुड़ा प्रयास बताया.
दिलचस्प बात यह रही कि इस मुहिम में मुस्लिम समाज के लोग भी शामिल हुए. राष्ट्रीय सूफी संत फाउंडेशन के अध्यक्ष नौशाद अली शबरी ने कहा कि बिरयानी और पुलाव दोनों शब्द फारसी भाषा से जुड़े हैं, लेकिन पुलाव का संबंध भारतीय परंपरा और संस्कृत मूल से भी माना जाता है.
उन्होंने कहा कि यदि किसी शब्द से किसी समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं तो उसका विकल्प अपनाने में कोई हर्ज नहीं है. अब यह अभियान हरिद्वार में चर्चा का केंद्र बन गया है और इसे धर्मनगरी की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है.
मुदित अग्रवाल