SC/ST एक्ट पर कोर्ट में बहस, केंद्र ने कहा- कानून नहीं बना सकता सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट में FIR से पहले अफसर संतुष्ट हों कि किसी को झूठा तो नहीं फंसाया जा रहा है. जरूरत पड़ने पर ही गिरफ्तारी की जाए. इस पर केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि ये कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट

संजय शर्मा / अनुषा सोनी / राहुल विश्वकर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 03 मई 2018,
  • अपडेटेड 5:50 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में आज SC/ST एक्ट पर सुनवाई के दौरान जमकर बहस हुई. कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट में FIR से पहले अफसर संतुष्ट हों कि किसी को झूठा तो नहीं फंसाया जा रहा है. जरूरत पड़ने पर ही गिरफ्तारी की जाए. इस पर केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि ये कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं है.

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केंद्र सरकार के बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर इस देश में जीने के अधिकार को कोर्ट लागू नहीं करेगा तो कौन करेगा? क्यों कोर्ट अपने अधिकार का इस्तेमाल कर जीने के अधिकार को लागू नहीं कर सकता? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के आदेश को गलत तरीके से समझा जा रहा है. हमने कहा है कि FIR से पहले अफसर संतुष्ट हों कि किसी को झूठा तो नहीं फंसाया जा रहा है.

कोर्ट ऐसे नया कानून नहीं बना सकता: अटॉर्नी जनरल

कोर्ट के सवाल पर केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि कोर्ट इस तरह नया कानून नहीं बना सकता. ये उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है. संविधान ने न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारों का बंटवारा किया है. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि कोर्ट के इस आदेश के बाद 200 से ज़्यादा वर्षों से दमित लोगों के आत्मविश्वास पर असर पड़ा है.

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इस फैसले पर विचार के लिए मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए. इस मामले में अब अगली सुनवाई 16 मई को होगी. आज अटॉर्नी जनरल ने अपना तर्क पूरा कर लिया है.

जांच के बाद जरूरत लगे तो ही गिरफ्तारी हो: कोर्ट

इससे पहले सुनवाई शुरू होने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारा फ़ैसला ये नहीं है कि FIR को दर्ज न किया जाए या फिर अपराध करने वाले वालों सजा न मिले. हमने आदेश में कहा है कि किसी को गिरफ़्तार करने से पहले जांच की जाए और अगर जरूरत हो तो ही गिरफ्तारी की जाए.

कोर्ट ने पूछा- क्यों नहीं दी जा सकती अग्रिम जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टाडा, पोटा जैसे कानूनों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है और न ही तुरंत जमानत का, इसे समझा जा सकता है. लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं है. अगर जिसके खिलाफ शिकायत की गई है और गिरफ्तारी के बाद उसे अदालत में पेश किया जाता है तो वो जमानत के लिए योग्य हो जाता है. इस एक्ट में कुछ प्रावधान ऐसे भी हैं जहां केवल 6 महीने की सजा होगी. ऐसे में अग्रिम जमानत क्यों नहीं?

जरूरी नहीं कि 85% मामले सही ही हों: कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने केवल एक फिल्टर लगाया है, ताकि गिरफ्तारी करने से पहले ये देखा जाए कि वो गिरफ्तार करने योग्य है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ये कह रही है कि 15 फीसदी ही मामले इस एक्ट के तहत झूठे दर्ज किए गए हैं. इसका मतलब ये नहीं की बाकी 85 फीसदी सही हों.

85 फीसदी में से 75% मामलों में आरोपी बरी

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा कि अगर आपके पास कोई डाटा है तो दीजिये. तब एमिकस (न्याय मित्र) अमरेंद्र सरण ने कहा कि बाकी 85 फीसदी मामलों में से 75 फीसदी में आरोपी अदालत से बरी हो गए. दरअसल केंद्र सरकार ने रिकॉर्ड पेश करते हुए कहा कि केवल 15 फीसदी ही मुकदमे झूठे पाए गए थे.

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