सिजेरियन डिलीवरी की याचिका SC से खारिज, याचिकाकर्ता पर 25 हजार का जुर्माना

सिजेरियन डिलीवरी से संबंधित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता रीपक कंसल पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसे 4 हफ्ते के अंदर जमा कराना होगा.

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सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट

अजीत तिवारी / संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 03 अगस्त 2018,
  • अपडेटेड 12:33 PM IST

ऑपरेशन से प्रसव यानी सिजेरियन डिलीवरी को लेकर गाइडलाइन बनाने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने याचिकाकर्ता पर जुर्माना भी लगाया है. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता रीपक कंसल से कहा कि आप चाहते हैं कि कोर्ट सिजेरियन डिलीवरी को लेकर दिशानिर्देश बनाये! क्या ये सब भी हम ही करें?

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सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 25 हजार का जुर्माना लगाया. जुर्माने की रकम तय करने को भी कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा. इसके बाद याचिकाकर्ता की खामोशी को देखते हुए कोर्ट ने खुद ही जुर्माने की रकम तय कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि जुर्माने की रकम 4 हफ्ते के भीतर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन यानी SCBA में जमा करानी होगी.

याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका के नाम पर इस तरह की याचिका दाखिल करना न्यायायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है. दरसअल, ऑपरेशन से प्रसव यानी सिजेरियन डिलीवरी के बढ़ते चलन और निजी अस्पतालों द्वारा इसे आमदनी का जरिया बना लेने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस बारे में दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई थी.

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सुप्रीम कोर्ट में इस बाबत जनहित याचिका दाखिल कर कोर्ट से केन्द्र और राज्य सरकारों को ऑपरेशन से डिलीवरी (सिजेरियन डिलीवरी) के बारे में नीति तय करने का निर्देश दिए जाने की गुहार लगाई गई थी. ऑपरेशन से डिलीवरी के बारे में मीडिया में आए आंकड़ों का उल्लेख करते हुए याचिका में कहा गया है कि कुछ राज्यों में स्थिति बेहद चिंताजनक है.

याचिका के मुताबिक तेलंगाना के शहरी क्षेत्रों के निजी अस्पतालों में हुई कुल डिलीवरी की 74.8 फीसद सिजेरियन है. इसी तरह केरल में 41 फीसद और तमिलनाडु में 58 फीसद प्रसव के जरिए हुए हैं. दिल्ली में ये दर 65 फीसद से ज्यादा है.

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