ये है कश्मीर के लिए केंद्र का 'सिक्सर', जानें दहकती घाटी पर क्या होगा इसका असर

4 और 5 सितंबर को कश्मीर दौरे के दौरान सिविल सोसाइटी, राजनीतिक दलों और सरकारी अधिकारियों की डेलीगेशन के साथ तमाम मसलों पर बातचीत हुई. इस दौरान राज्य से जुड़ी कई समस्याएं सामने आईं हैं.

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अंजलि कर्मकार

  • नई दिल्ली,
  • 08 सितंबर 2016,
  • अपडेटेड 9:19 AM IST

बीते दो महीने से कश्मीर में हिंसक आंदोलन का दौर जारी है. कश्मीर पर सर्वदलीय प्रतिनिधि‍मंडल के लौटने के बाद दिल्ली में हुई बैठक में सभी इस बात पर सहमत हुए कि देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा. साथ ही इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत पर भी सहमति बनी है. 4 और 5 सितंबर को कश्मीर दौरे के दौरान सिविल सोसाइटी, राजनीतिक दलों और सरकारी अधिकारियों की डेलीगेशन के साथ तमाम मसलों पर बातचीत हुई. इस दौरान राज्य से जुड़ी कई समस्याएं सामने आईं.

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कश्मीर पर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे में ये बड़े मुद्दे सामने आए. जानिए, क्या राज्य पर क्या होगा इनका असर...

1. जम्मू में सचिवालय कैंप की मांग
यह होगा असर: जम्मू शहर की शीतकालीन राजधानी है. घाटी में आए दिन होने वाले विरोध-प्रदर्शन की वजह से सरकार का कामकाज ठप हो जाता है. घाटी में बीते दो महीने से जारी हिंसा से सरकारी कामकाज ठप पड़ा हुआ है. डेलीगेशन के दौरे पर सचिवालय का परमानेंट कैंप कार्यालय बनाए जाने की मांग उठी. ऐसे में जम्मू में कैंप ऑफिस बनता है तो सरकारी कामकाज पर सामान्य तौर चलता रहेगा.

2. लेह-लद्दाख के लिए यूटी का दर्जा दिए जाने की मांग
यह होगा असर: डेलीगेशन के दौरे पर भी लेह-लद्दाख रीजन को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने की मांग उठी. जम्मू-कश्मीर के लद्दाख को 'बर्फीला रेगिस्तान' भी कहा जाता है. यहां के लेह में बौद्ध बहुल आबादी जबकि कारगिल में 99 फीसदी मुस्लिम आबादी है. इस इलाके को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने से यहां खुद का प्रशासनिक ढांचा तैयार हो सकेगा. जम्मू-कश्मीर के 69.6 फीसदी हिस्से में फैले लद्दाख रीजन को अलग भू-राजनीतिक और भू-सांस्कृतिक पहचान मिल सकेगा.

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3. जम्मू-कश्मीर के अल्पसंख्यकों की चिंताएं सामने आईं
ये होगा असर: जम्मू-कश्मीर के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार की खबरें आती रही हैं. डेलीगेशन के दौरे पर इनके हितों की रक्षा को लेकर चिंता जाहिर की गई. राज्य में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और हैं, इसके बावजूद राज्य में 68 फीसदी मुस्लिमों को ही अल्पसंख्यक के तहत लाभ मिल रहे हैं, जबकि वास्तव में हिन्दुओं को यह सुविधाएं मिलनी चाहिए. पिछले 50 साल से राज्य में अल्पसंख्यकों को लेकर कोई गणना नहीं हुई है और न ही अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया है. इसलिए जम्मू कश्मीर के लिए अल्पसंख्यक और एससी/एसटी आयोग बनाए जाने की मांग उठी कि अल्पसंख्यक आयोग बनाया जाना जरूरी है.

4. लवाना सिख समुदाय को ओबीसी का दर्जा दिए जाने की मांग
यह होगा असर: पंजाब में लबाना सिख समुदाय को मिला हुआ है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इस समुदाय के लोगों को यह दर्जा नहीं हासिल है. इस वजह से इस समुदाय के लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए यह कदम उठाया जाना जरूरी है. राज्य में पहाड़ि‍यों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग भी उठी है.

5. अल्पसंख्यकों को एमएलसी, राज्यसभा का मौका
यह होगा असर: अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं को गवर्नर की ओर से विधान परिषद सदस्य, राज्यसभा सदस्य के तौर पर नामित किए जाने की मांग उठी है. इससे इस समुदाय के लोगों को का हिस्सा बनने में मदद मिलेगी.

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6. स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव की मांग उठी
यह होगा असर: पंचायत चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. जम्मू-कश्मीर में 37 साल के अंतराल के बाद 2011 में पंचायत चुनाव हुए थे और पंचायतों का कार्यकाल 17 जुलाई, 2016 को पूरा हो गया. इसी तरह रियासत में 26 साल के अंतराल के बाद शहरी स्थानीय निकाय चुनाव 2005 में हुए थे और कार्यकाल 2010 में पूरा हो गया था. पिछले छह साल से लटकते आ रहे हैं. आठ जनवरी से तीन अप्रैल, 2016 तक सूबे में रहे राज्यपाल शासन के दौरान मई के पहले हफ्ते में चुनाव करवाने की तैयारी कर ली गई थी लेकिन कानून-व्यवस्था की स्थिति फिलहाल चुनाव लायक नहीं है. अब डेलीगेशन के दौरे से उम्मीद बंधी है कि स्थानीय निकाय के चुनाव की तैयारियों पर काम शुरू होगा.

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