स्टेट दो, स्टोरी एक: गुजरात-हरियाणा में 4 दिन में चित्त हुए शाह

गुजरात हो या हरियाणा, यहां की मौजूदा सरकारें परिस्थ‍ितियों का समय रहते सही आकलन नहीं कर पा रही हैं. वैसे तो गुजरात और हरियाणा विकास के पैमाने में अग्रणी राज्य हैं, लेकिन इन राज्यों में जाति का फैक्टर भी उतना ही हावी है और सरकारें इसे नजरअंदाज करते हुए शासन नहीं कर सकतीं.

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बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह

सुरभि गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 12 सितंबर 2016,
  • अपडेटेड 10:16 AM IST

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की सभा में फिर हंगामा हुआ. बस जगह दूसरी थी. अमित शाह रविवार को हरियाणा के जींद में गौरव रैली को संबोधित करने गए. वहां सभा में मौजूद कुछ लोगों ने बीजेपी अध्यक्ष को काले झंडे दिखाए और सरकार विरोधी नारे लगाए. जिस वक्त यह सबकुछ हो रहा था, उस वक्त मंच पर अमित शाह के अलावा राज्य के सीएम मनोहर लाल खट्टर, केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह सहित तमाम बड़े नेता मौजूद थे. प्रदर्शनकारी जूनियर बेसिक टीचर थे, जो पिछले तीन महीने से अपनी नौकरी पक्की करने की मांग को लेकर हड़ताल कर रहे हैं.

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जब सूरत में हुआ शाह की सभा में हंगामा
बीते गुरुवार को भी सूरत में की सभा में हंगामा हुआ था. समारोह में कुर्सियां फेंकी गईं और पाटीदार अमानत आंदोलन समिति के नेता हार्दिक पटेल के समर्थन में नारे भी लगे. यह हंगामा ऐसे वक्त हुआ जब मंच पर शाह के अलावा सीएम विजय रूपानी, पूर्व सीएम आनंदीबेन पटेल और तमाम बड़े नेता मौजूद थे. पुलिसबल की भी भारी मौजूदगी थी. लेकिन हंगामा करने वालों पर काबू नहीं पाया गया और चार घंटे तक चलने वाला कार्यक्रम एक घंटे में ही खत्म करना पड़ा.

ऐसे में हफ्ते भर के भीतर की सभा में दूसरी बार ऐसी घटना पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. अगर पार्टी के लिए कहीं अच्छा होता है, तो बेशक इसका श्रेय पार्टी अध्यक्ष को दिया जाना चाहिए और दिया जाता भी है लेकिन अगर कहीं कुछ गड़बड़ होता है तो इसके लिए भी पार्टी अध्यक्ष को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. गुजरात में बीजेपी अध्यक्ष की सभा में कुर्सियां फेंकी गईं, तो हरियाणा में काले झंडे दिखाए गए. गुजरात में करीब दो दशक से लगातार बीजेपी की सरकार है, जबकि दो साल पहले हरियाणा में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी है. लेकिन इन दोनों राज्यों में सत्ताधारी पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा.

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एक तरफ जाट, दूसरी तरफ पटेल
दो साल पहले हरियाणा में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सरकार बनाने का जनादेश मिला और सूबे में पहली बार भगवा पार्टी की सरकार बनी. लेकिन बीजेपी आलाकमान के सीएम चुनने के फैसले को लेकर राज्य में उपजा असंतोष अब तक थमा नहीं है. खट्टर को जब हरियाणा का सीएम बनाया गया, तो सूबे में पहली बार किसी पंजाबी और 18 साल बाद किसी गैर जाट को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई. राज्य में यहीं से जाट बनाम गैर जाट की बहस भी तेज हो गई.

यही हाल गुजरात का है. अक्टूबर 2001 में सीएम की कुर्सी केशुभाई पटेल से नरेंद्र मोदी को सौंपी गई थी. 2014 में मोदी के पीएम बनने के लिए आनंदीबेन पटेल को सत्ता सौंपी गई. हाल में पटेल से कुर्सी लेकर विजय रूपानी को सौंपी गई. रूपानी ने सीएम पद की शपथ ली, तो उनके कैबिनेट में नौ ऐसे मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई जिन्हें आनंदीबेन पटेल का वफादार माना जाता था.

आरक्षण के लिए आंदोलन
हरियाणा में वैसे तो आरक्षण की मांग को लेकर जाट समुदाय पहले भी आंदोलन कर चुका है. लेकिन खट्टर सरकार बनने के बाद राज्य में जाट और गैर-जाट समुदायों के बीच की खाई काफी गहरी हो गई है. जाट समुदाय यहां बीते फरवरी और जून में हिंसक प्रदर्शन कर चुका है.

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गुजरात में भी यही हाल है. राज्य में आरक्षण की मांग को लेकर पटेल समुदाय के बैनर तले पिछले साल प्रदर्शन करने उतरा. यह संगठन पटेल समुदाय को ओबीसी का दर्जा दिए जाने के साथ-साथ सरकारी नौकरियों और पढ़ाई में 27 फीसदी आरक्षण की मांग कर रहा है.

सीएम की कुर्सी
हरियाण में बीजेपी की सरकार बनी तो पार्टी आलाकमान ने सीएम के तौर मनोहर लाल खट्टर को पेश किया. आरएसएस से जुड़े खट्टर पहली बार विधायक बने थे और सीएम की कुर्सी सौंप दी गई. इससे स्थानीय बीजेपी के नेताओं में असंतोष की लहर फैली जो वर्षों से सूबे में पार्टी की नींव मजबूत करने में जुटे थे.

जब सामने आई BJP की अंदरूनी कलह
पिछले दिनों जब गुजरात की सत्ता आनंदीबेन से लेकर विजय रूपानी को सौंपी गई, तो पार्टी की अंदरूनी कलह सामने आ गई थी. विधायक दल की बैठक में आनंदीबेन ने रूपानी के नाम पर वीटो लगा दिया. वो नितिन पटेल को सीएम की कुर्सी सौंपना चाहती थीं. हालांकि, पीएम मोदी की दखल के बाद आनंदीबेन झुकीं और रूपानी को नेता चुना गया.

टीम में पकड़ नहीं, लीडरशिप का अभाव
को लेकर असंतोष की खबरें आती रही हैं. बीते फरवरी में तो बीजेपी के 100 नेताओं ने खट्टर सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकते हुए इस्तीफा दे दिया था. ये जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई से नाराज थे.

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बीते फरवरी में राज्य के कद्दावर नेता और खेल मंत्री अनिल विज की अपने महकमे में सीएम के दखल से नाराजगी सामने आई थी. फरवरी में ही विज और खट्टर के बीच जाट आंदोलन के मृतकों को मुआवजा देने को लेकर भी मतभेद सामने आए थे.

बढ़ने लगी है कांग्रेस की लोकप्रियता
भी कोई ऐसा नहीं, जिसकी लीडरशिप मोदी जैसी है. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे, तो पार्टी और सरकार में किसी तरह की खींचतान की खबर नहीं आती थी, लेकिन इनके दिल्ली जाते ही जैसे सबकुछ बिखरने लगा और राज्य में प्रतिद्वंदी कांग्रेस की लोकप्रियता बढ़ने लगी है.

दूरदर्शिता का अभाव
गुजरात हो या हरियाणा, यहां की मौजूदा सरकारें परिस्थ‍ितियों का समय रहते सही आकलन नहीं कर पा रही हैं. वैसे तो गुजरात और हरियाणा विकास के पैमाने में अग्रणी राज्य हैं, लेकिन इन राज्यों में जाति का फैक्टर भी उतना ही हावी है और सरकारें इसे नजरअंदाज करते हुए शासन नहीं कर सकतीं.

हरियाणा में जाटों का विरोध
हरियाणा में चाहे जाट आरक्षण का मसला हो या सूबे में कानून-व्यवस्था का मसला, खट्टर सरकार हर मोर्च में नाकाम साबित हुई है. सीएम खट्टर राज्य में जाटों को साधने में नाकाम रहे हैं. जाटों के आरक्षण को लेकर इस साल दो बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं. जाट आरक्षण आंदोलन से भड़की हिंसा से समाज में एक गहरी खाई भी नजर आने लगी है. यहां गैर जाट लोगों ने जाटों का विरोध करना शुरू कर दिया है.

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गुजरात में पाटीदार समुदाय नाराज
उधर, सूरत की सभा में हंगामा करने वाले पटेल समुदाय के लोग बताए जा रहे हैं जो सूबे की सत्तारूढ़ बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. पाटीदार समुदाय गुजरात में बड़ा वोट बैंक है और राज्य की सत्ता में अपनी उपेक्षा से नाराज है. पिछले साल हार्दिक पटेल के आह्वान पर गुजरात में प्रदर्शन हुए, तो राज्य सरकार ने इनसे निपटने में बेहद कड़ाई का परिचय दिया. हार्दिक को जेल में डाल दिया गया और सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया. सूरत की सभा में भी हंगामा करने वाले सौ से अधि‍क पटेल युवकों को पहले हिरासत में लिया गया फिर छोड़ दिया गया.

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