आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 सांसदों ने बीजेपी का दामन थाम लिया है. राज्यसभा के स्पीकर ने भी आप से बगावत करने से वालों को बीजेपी सांसद के तौर पर मान्यता भी दे दी है. इसीलिए आम आदमी पार्टी के लिए झटका है, क्योंकि जिन नेताओं ने पार्टी छोड़ी है, उनमें राघव चड्ढा, स्वाति मालिवाल और संदीप पाठक तो केजरीवाल की सियासी प्रयोगशाला से निकले और उन्हें यहीं से सामाजिक और सियासी पहचान मिली है.
राघव चड्ढा के अगुवाई में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का अरविंद केजरीवाल के खिलाफ बगावत करना आम आदमी पार्टी के लिए सियासी संकट है, लेकिन बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के लिए मुफीद है. कांग्रेस के लिए पंजाब से लेकर गुजरात, दिल्ली और गोवा तक 'पॉलिटिकल जैकपॉट' साबित हो सकता है.
आम आदमी पार्टी का उदभव कांग्रेस के विरोध में खड़े हुए अन्ना आंदोलन से हुआ है.आंदोलन से उभरी राजनीति को सफलताएं तो मिल भी जाती हैं, लेकिन फिर उनमें बिखराव शुरू हो जाता है. AAP के साथ भी क्या ऐसा ही हो रहा है? राघव चड्ढा की अगुआई में आप के दस में से सात सांसद बागी होकर बीजेपी में शामिल हो गए हैं, लेकिन खुशी कांग्रेस में दिख रही है.
बिखरती केजरीवाल की सियासत
राघव चड्ढा के अगुवाई में सात राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी का दामन थाम लिया है, जिसमें संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता शामिल हैं. यह पहला मौका नहीं है जब आम आदमी पार्टी को बड़े नाम छोड़कर निकलें हों, पार्टी के संस्थापकों में शामिल रहे योगेंद्र यादव और मशहूर वकील प्रशांत भूषण को शुरू में ही या तो निकाल दिया था.
अन्ना आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के साथ शामिल रही रहीं पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने भी अपनी अलग राह चुनी. 2013 में पार्टी का बड़ा चेहरा रहीं शाजिया इल्मी भी केजरीवाल का साथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था.इसके अलावा आनंद कुमार, कपिल मिश्रा और कैलाश गहलोत समेत कई अलग हो गए, लेकिन राघव चड्ढा, संदीप पाठक और मालिवान तो पार्टी के शुरुआती दिनों से रणनीतिकार और संगठक रहे हैं.
चड्ढा, पाठक और मालिवाल को केजरीवाल केका करीबी माना जाता है. इन तीनों ही नेताओं को सियासी पहचान से लेकर राजनीतिक मुकाम तक आम आदमी पार्टी में ही मिली है. पंजाब में AAP को सत्ता में लाने का श्रेय राघव चड्ढा को जाता है तो संदीप पाठक को पार्टी के रणनीतिकार के तौर पर देखा जाता था, क्योंकि वे संगठन मंत्री के रूप में काम कर रहे थे.
बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस को को लाभ
आम आदमी पार्टी के सात सांसदों की बगावत का सीधा फायदा फिलबाल बीजेपी को हुआ है. बीजेपी का राज्यसभा में ताकत बढ़ गई है. इन सात सांसदों के बदौलत उच्च सदन में बहुमत के करीब पहुंच गई है, लेकिन इससे ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा है. चड्ढा को जरूर 2022 के चुनावों से पहले पंजाब में AAP के सियासी उभार के लिए पटकथा लिखने वाले पर्दे के पीछे के रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता था, लेकिन चेहरा वो नहीं थे.
राघव चड्ढा के साथ जिन लोगों ने बीजेपी का दामन थामा है, उसमें एक भी नेता सियासी जनाधार वाला नहीं है. चड्ढा से लेकर पाठक और सहनी तक सिर्फ एससी रूप वाली पॉलिटिक्स कर सकते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर वोट नहीं मिलते. इससे केजरीवाल को तो जरूर सियासी तौर पर झटका लगा है, लेकिन बीजेपी के लिए कितने मुफीद होंगे, ये कहना मुश्किल है?
हालांकि, अगले साल गुजरात, गोवा और पंजाब में चुनाव हैं. गुजरात में आम आदमी बार-बार तीसरा कोण बनाने की कोशिश करती रही है. इससे बगावत से उसके जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ेगा. पंजाब में BJP अब तक कायदे से अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं करवा पाई. अब राघव चड्ढा के जरिए बीजेपी जरूर पंजाब में AAP के वोटबैंक में सेंधमारी की कोशिश करेगी, लेकिन सियासी तौर पर कितने सफल होंगे, ये कहना मुश्किल हैं?
कांग्रेस के लिए सियासी मुफीद?
आम आदमी पार्टी की बगावत बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस के लिए सियासी तौर पर मुफीद हो सकती है. आम आदमी पार्टी की राजनीतिक कांग्रेस के विरोध से शुरू हुई और कांग्रेस जमीन पर ही उसकी पूरी इमारत खड़ी है. दिल्ली में कांग्रेस को सत्ता से बाहर आम आदमी पार्टी 2013 में आई, जिसके बाद से कांग्रेस का खाता नहीं खुला. इसके बाद आम आदमी पार्टी ने पंजाब में कांग्रेस को सत्ता से बाहर अपना कब्जा जमाया.
केजरीवाल की राजनीति को कांग्रेस जरूर बीजेपी की बी-टीम बताती रही है. इस नैरेटिव को राघव चड्ढा के बगावत ने मजबूत करने का काम किया है, जिसका सीधा असर दिल्ली और पंजाब की राजनीति पर पड़ेगा. कांग्रेस अब इस नैरेटिव को और भी सियासी धार देना शुरू कर दिया है. यही नहीं केजरीवाल के पार्टी का राष्ट्रीय विस्तार करने वाले मंसूबे के लिए भी झटका है, जिसने कांग्रेस को वापसी करने का मौका दे दिया है.
पंजाब से गोवा तक होगा असर
पंजाब, गुजरात, गोवा में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी ने पांच साल पहले झटका दिया था, लेकिन अब कांग्रेस के लिए सियासी जमीन मुफीद हो सकती है. AAP के सांसदों की बगावत से कांग्रेस को उम्मीदें दिखने लगी है. कांग्रेस अब अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने के कवायद कर सकती है.
आम आदमी पार्टी बगावत से पंजाब की राजनीति में कांग्रेस को भी फायदा है. राष्ट्रीय स्तर पर INDIA ब्लॉक का हिस्सा होने के चलते स्थानीय स्तर पर कांग्रेसी नेताओं के लिए आप सरकार का कड़ा विरोध कर पाना आसान नहीं था, लेकिन अब मौका मिल गया है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी के लिए सियासी नुकसान साबित हो सकता है और कांग्रेस अपने मुस्लिम औऱ दलित वोटबैंक को दोबारा से जोड़ने की कवायद कर सकती है.
पंजाब की सियासत पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुखविंदर सिंह कहते हैं कि बीजेपी का मुक़ाबला आप से नहीं बल्कि कांग्रेस से है. पंजाब में बीजेपी के ऊपर किसान विरोधी होने का आरोप लगता है, इसलिए अब अकाली दल भी उसके साथ जाने के लिए तैयार नहीं है.
राज्य में 57 फीसदी सिख आबादी है और पंजाब की राजनीतिक व्यवस्था बीजेपी को मैच नहीं करती है. AAP के इन नेताओं के बीजेपी में जाने से कोई फायदा नहीं है,उनमें से किसी का जनाधार नहीं है. इसी का लाभ कांग्रेस को मिल सकती है, तो गोवा और गुजरात में भी कांग्रेस को सियासी तौर पर लाभ मिल सकता है, जो केजरीवाल के सियासी उभार के चलते पिछले चुनाव में चला गया था.
कुबूल अहमद