पंजाब: मौसमी बीमारियों के बीच मरीजों का सहारा बनी ‘मुख्यमंत्री सेहत योजना’

जैसे-जैसे पंजाब एक और लंबी गर्मी की तैयारी कर रहा है, अस्पतालों के भीड़ भरे गलियारे यह याद दिला रहे हैं कि मौसमी बीमारियां आज भी परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं.

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पंजाब में गर्मी और उमस का डबल अटैक (Photo-ITG) पंजाब में गर्मी और उमस का डबल अटैक (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 27 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:03 PM IST

पंजाब में बढ़ते पारे और उमस भरी गर्मी के आने के साथ एक बार फिर मौसमी बीमारियों का प्रकोप बढ़ने लगा है. रोज़मर्रा की बीमारियों से राहत पाने के लिए पहले से ही मरीज़ों की भीड़ झेल रहे सरकारी अस्पतालों में बुखार और और पेट संबंधी परेशानियां लेकर मरीज पहुंच रहे हैं. डॉक्टरों के अनुसार, यह मौसमी लहर हर साल चिंताजनक रूप से लौटती है.

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एक्यूट फेब्राइल इलनेस कोई एक अकेली बीमारी नहीं है. यह अचानक से बहुत तेज़ बुखार आने की एक ऐसी स्थिति है, जो किसी भी तरह के वायरस, बैक्टीरिया या पैरासाइट के इन्फेक्शन के कारण हो सकती है. सीधे शब्दों में कहें तो जब मरीज़ अचानक तेज़ बुखार की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचता है, लेकिन शुरुआत में डॉक्टर भी यह तुरंत नहीं समझ पाते कि बुखार की असली वजह कौन सा इन्फेक्शन है, तो उस स्थिति को डॉक्टर 'एक्यूट फेब्राइल इलनेस' कह देते हैं.
 
पंजाब की 'मुख्यमंत्री सेहत योजना' के हालिया आंकड़े बताते हैं कि पिछले चार महीनों में एक्यूट फेब्राइल इलनेस कैशलेस इलाज दावों की सबसे बड़ी श्रेणियों में शामिल रहीं. राज्य स्वास्थ्य एजेंसी से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, एक्यूट फेब्राइल इलनेस के 5,840 मामले दर्ज किए गए, जिन पर ₹1.31 करोड़ के दावों का भुगतान किया गया.

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गर्मी में बढ़ रही हैं बीमारियां

इसके अलावा, पानी से फैलने वाले और श्वसन संबंधी बीमारियों के भी उल्लेखनीय मामले सामने आए. एंटरिक फीवर के 1,396 मामले दर्ज हुए, जिन पर ₹30.47 लाख के दावे किए गए. निमोनिया के 377 मामलों पर ₹11.06 लाख, जबकि एक्यूट ब्रोंकाइटिस के 326 मामलों पर ₹9.24 लाख ख़र्च हुए. वहीं मानसून के दौरान अक्सर चर्चा में रहने वाली बीमारियों के मामले अपेक्षाकृत सीमित रहे. डेंगू के केवल 12 मामले दर्ज हुए, जिन पर ₹40,880 का दावा हुआ. मलेरिया के सिर्फ 3 मामले, चिकनगुनिया के 6 मामले, और हीट स्ट्रोक के 4 मामले सामने आए, जो अत्यधिक गर्मी से संबंधित अस्पताल भर्ती की तुलनात्मक रूप से कम संख्या को दर्शाते हैं.

हालांकि, जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ किसी भी तरह की लापरवाही से बचने की सलाह दे रहे हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के एक अध्ययन के अनुसार बारिश, मच्छरों की बढ़ती संख्या और स्थानीय स्वच्छता स्थितियों के अनुसार मौसमी प्रकोप तेजी से बदल सकते हैं.

सिविल अस्पताल, पटियाला के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गोयल ने बताया कि यह स्थिति हर वर्ष ओपीडी में दिखाई देने वाले समान्य मौसमी दबाव को दर्शाती है . उन्होंने यह भी कहा कि अधिकांश मामले प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर आसानी से संभाले जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि अत्यधिक गर्मी के कारण एक्यूट फेब्राइल इलनेस, उल्टी,दस्त, सिरदर्द, श्वसन संक्रमण और त्वचा व आंखों से जुड़ी एलर्जी के मामले बढ़ जाते हैं. गरम मौसम के कारण लोग अक्सर इलाज में देरी कर देते हैं, जिससे स्थिति गंभीर हो सकती है.

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डॉ. विकास गोयल ने कहा कि मुख्यमंत्री सेहत योजना मरीज़ों के लिए बड़ी राहत साबित हो रही है क्योंकि इससे उन्हें बिना आर्थिक बोझ के अस्पताल में भर्ती होकर कैशलेस उपचार मिल रहा है. उन्होंने कहा,“यह योजना सुनिश्चित करती है कि मरीज़ बिना अग्रिम पैसे की चिंता किए समय पर इलाज प्राप्त कर सकें. समय पर जांच और इलाज से कई जानें बचाई जा सकती हैं, क्योंकि आर्थिक बाधा दूर होने से लोग इलाज में देरी नहीं करते.

बच्चे अत्यधिक गर्मी और उमस वाले मौसम में सबसे अधिक संवेदनशील बने रहते हैं. गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज, फरीदकोट के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. शशि कांत धीर ने चेतावनी दी कि शिशु और छोटे बच्चे संक्रमणों की चपेट में जल्दी आते हैं. उन्होंने बताया कि ठीक से आहार न लेना, बार-बार उल्टी होना, तेज सांस चलना, डिहाइड्रेशन, दौरे पड़ना और लगातार बुखार जैसे लक्षणों को कभी नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए. उन्होंने विशेष रूप से कहा कि तीन महीने से कम उम्र के शिशु में किसी भी तरह के बुखार को तत्काल चिकित्सकीय आपात स्थिति माना जाना चाहिए.

डॉ. शशि कांत धीर ने बताया कि  जागरूकता अभियान, स्वच्छता शिक्षा, टीकाकरण और मच्छर नियंत्रण उपायों के माध्यम से संक्रमण के प्रसार को रोकने में अभिभावकों, आशा वर्करों, आंगनवाड़ी कर्मियों और स्कूलों की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है. 

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