मध्य-पूर्व में जारी जंग अब सिर्फ भू-राजनीतिक घटनाक्रम नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर सीधे आम लोगों की जेब तक पहुंचने लगा है. भारत जैसे देश जो ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, इस संकट की आंच तेजी से महसूस कर रहे हैं. सवाल अब यह नहीं रह गया कि युद्ध कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि इसकी कीमत कौन चुका रहा है और इसका जवाब है, आम नागरिक.
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष के 20 से अधिक दिन बीत चुके हैं, लेकिन हालात में किसी राहत के संकेत नहीं हैं. युद्ध भले ही भारत से हजारों किलोमीटर दूर लड़ा जा रहा हो, लेकिन इसकी सबसे पहली चोट भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर पड़ रही है.
भारत में प्रीमियम पेट्रोल और इंडस्ट्रियल डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी ने यह साफ कर दिया है कि वैश्विक संकट अब घरेलू बाजार में दाखिल हो चुका है. प्रीमियम पेट्रोल की कीमतों में करीब 2.35 रुपये प्रति लीटर तक इजाफा हुआ है, जबकि इंडस्ट्रियल डीजल पर करीब 22 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इसका सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ रहा है, जिससे फल, सब्जी और अनाज जैसे रोजमर्रा के सामान भी महंगे हो सकते हैं.
70 डॉलर प्रति बैरल थी कच्चे तेल
विशेषज्ञों के अनुसार, जंग शुरू होने से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब 110 डॉलर के पार पहुंच गई है. चूंकि भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में हर उछाल का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
इस संकट की सबसे बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति है, जो दुनिया के कुल पेट्रोलियम व्यापार का करीब 20 प्रतिशत वहन करता है. सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश इसी मार्ग से निर्यात करते हैं. भारत भी अपनी लगभग 50 प्रतिशत कच्चे तेल और 54 प्रतिशत एलएनजी की आपूर्ति इसी रास्ते से प्राप्त करता है. ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी तरह की बाधा भारत के लिए चिंता का विषय बन जाती है.
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से पड़ेगा असर
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से कई स्तरों पर असर पड़ता है. एक ओर जहां ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, वहीं दूसरी ओर डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया कमजोर पड़ता है. इसका असर आम लोगों की बचत पर पड़ता है, क्योंकि उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है. इसके अलावा सरकार पर भी दबाव बढ़ता है, क्योंकि गैस और खाद जैसी सब्सिडी पर खर्च बढ़ जाता है, जिससे बजट संतुलन प्रभावित होता है.
हालांकि अब तक भारत को इस जंग से कोई बड़ा आर्थिक झटका नहीं लगा है, लेकिन जोखिम लगातार बना हुआ है. सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए कूटनीतिक प्रयासों में जुटी हुई है और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर भी नजर रखी जा रही है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत और लचीली हुई है, लेकिन ऊर्जा आयात पर निर्भरता उसे वैश्विक संकटों के प्रति संवेदनशील बनाती है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार की कूटनीति और आर्थिक रणनीति इस चुनौती का किस तरह सामना करती है.
फिलहाल साफ है कि मिडिल ईस्ट की जंग का असर भारत में महसूस किया जा रहा है, चाहे वह महंगे ईंधन के रूप में हो, बढ़ती महंगाई के रूप में या फिर आम लोगों की घटती बचत के रूप में.
आजतक ब्यूरो