UGC के नए नियम पर 'सुप्रीम' फैसले से थमेगा विवाद? अब सामने हैं ये पांच सवाल

17 दिन पहले लागू हुए यूजीसी के नए नियम को शीर्ष अदालत ने अगली सुनवाई तक रोकते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब मांगा है. तब तक 2012 का पुराना नियम ही लागू रहेगा. अब इस पूरे घटनाक्रम में पांच ऐसे सवाल उभरकर सामने आए हैं, जो आने वाले समय में इस विवाद की दिशा तय करेंगे.

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सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर रोक लगा दी है. (Photo: ITG) सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर रोक लगा दी है. (Photo: ITG)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 29 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:22 PM IST

यूजीसी (UGC) के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद देश की राजनीति और विश्वविद्यालय परिसरों में उठता विवाद फिलहाल थमता दिख रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विराम स्थायी है या आने वाले दिनों में यह मुद्दा नए सिरे से और ज्यादा तीखा होकर लौटेगा. 17 दिन पहले लागू हुए यूजीसी के नए नियम को शीर्ष अदालत ने अगली सुनवाई तक रोकते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब मांगा है. तब तक 2012 का पुराना नियम ही लागू रहेगा. 

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इस फैसले के बाद जहां सवर्ण समाज के कई संगठन और छात्र सड़कों पर मिठाइयां बांटते नजर आए, वहीं पिछड़े और वंचित वर्गों में असमंजस और चिंता का माहौल है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के कई जिलों में जश्न का माहौल देखने को मिला. लखनऊ, मथुरा, चंदौली और गोरखपुर जैसे शहरों में सवर्ण समाज के लोगों ने लड्डू, पेड़ा बांटे और नारेबाजी की. साधु-संतों से लेकर छात्र संगठनों तक ने इसे न्याय की जीत बताया. सवाल यह है कि जिस फैसले से अगड़ा वर्ग राहत महसूस कर रहा है, क्या वही फैसला पिछड़े वर्गों को स्वीकार होगा?

दरअसल, यूजीसी के नए नियम कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों से जुड़े थे. इन नियमों का उद्देश्य भेदभाव रोकना बताया गया था, लेकिन सवर्ण समाज के संगठनों का आरोप था कि नियम अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका ज्यादा है. इसी आशंका को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणियां कीं.

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सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि नियम पहली नजर में अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब भेदभाव की परिभाषा पहले से मौजूद है तो जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करने की जरूरत क्यों पड़ी. सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी सबसे ज्यादा चर्चा में रही, जब उन्होंने कहा, “हमने जातिविहीन समाज की दिशा में जो भी प्रगति की है, क्या अब हम फिर से पीछे की ओर जा रहे हैं?”

यही वे टिप्पणियां हैं, जिनके बाद सवर्ण समाज के प्रदर्शनकारियों को लगा कि उनकी आशंकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीरता से सुना है. गौरतलब है कि इस मुद्दे पर प्रदर्शन सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं थे. हापुड़ में बीजेपी कार्यालय तक विरोध पहुंचा, ‘बीजेपी मुर्दाबाद’ के नारे लगे और कई जगहों पर नेताओं को वोट न देने के पोस्टर तक लगाए गए. स्थिति यह थी कि कई सांसद और मंत्री कैमरे के सामने खुलकर बोलने से बचते दिखे.

राजनीतिक गलियारों में हलचल

इस पूरे आंदोलन में एक और दिलचस्प पहलू यह रहा कि राजनीतिक नेताओं से ज्यादा मुखरता साधु-संतों और धार्मिक चेहरों की दिखी. बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र शास्त्री, पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्रा, अन्नपूर्णागिरी महामंडलेश्वर और गीतकार मनोज मुंतशिर जैसे नाम खुलकर सामने आए. उनका तर्क था कि ऐसे नियम हिंदू समाज को बांटने का काम कर सकते हैं.

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वहीं, विपक्ष ने भी इस फैसले को अपने-अपने तरीके से पढ़ा. समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव ने कहा कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि न तो दोषी बचें और न ही निर्दोषों के साथ अन्याय हो. दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने फैसले को खुशी की बात बताया, जबकि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी विभेद की राजनीति नहीं की.

अब इस पूरे घटनाक्रम में पांच ऐसे सवाल उभरकर सामने आए हैं, जो आने वाले समय में इस विवाद की दिशा तय करेंगे.

पहला सवाल: क्या सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद सवर्ण समाज की नाराजगी पूरी तरह खत्म हो जाएगी, या यह सिर्फ अस्थायी राहत है?

दूसरा सवाल: जिन नियमों को रोक दिया गया है, उनसे जुड़े पिछड़े और वंचित वर्ग क्या खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे?

तीसरा सवाल: क्या सरकार इस पूरे विवाद की सियासी संवेदनशीलता को भांप चुकी थी, इसलिए सुप्रीम कोर्ट में नियमों का खुलकर बचाव नहीं किया गया?

चौथा सवाल: अगर नियमों में सचमुच अस्पष्टता थी, तो उन्हें बिना व्यापक संवाद और विशेषज्ञ सलाह के लागू क्यों किया गया?

पांचवां और सबसे अहम सवाल: क्या यह पूरा मामला आने वाले चुनावों में जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश का हिस्सा था?

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अब 19 मार्च को होगी अगली सुनवाई 

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से किसी तरह की तीखी आपत्ति सामने नहीं आई. यह राजनीति के गलियारों में चर्चा का विषय है कि क्या सरकार ने सामाजिक असंतोष के बढ़ते दबाव को देखते हुए फिलहाल टकराव से दूरी बनाए रखना ही बेहतर समझा. अब 19 मार्च को अगली सुनवाई होनी है. तब तक 2012 का नियम लागू रहेगा. यानी फिलहाल कॉलेज और विश्वविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव को लेकर शिकायतों का नया ढांचा ठंडे बस्ते में चला गया है. 
अब 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई तय करेगी कि यूजीसी के नए नियमों का भविष्य क्या होगा.

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