सुप्रीम फैसले के बाद अब SIR पर आगे की राह क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को संवैधानिक मान्यता दी है और चुनाव आयोग को मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का अधिकार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट से नाम हटना नागरिकता खत्म होने का प्रमाण नहीं है.

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सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध बताया है सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध बताया है

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 27 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:43 PM IST

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसले ने चुनाव आयोग, नागरिकता और वोटर लिस्ट को लेकर नई बहस छेड़ दी है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ कहा है कि चुनाव आयोग (ECI) को मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का संवैधानिक अधिकार है और उसने अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर SIR प्रक्रिया चलाई है. अदालत ने यह भी माना कि इस प्रक्रिया में दावा, आपत्ति और अपील जैसे पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं.

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लेकिन फैसले की सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वोटर लिस्ट से नाम हटना किसी व्यक्ति की नागरिकता खत्म होने का प्रमाण नहीं माना जाएगा. अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग केवल चुनावी उद्देश्यों के लिए यह तय कर सकता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल होने की पात्रता रखता है या नहीं. आयोग नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'अगर किसी व्यक्ति की ओर से दिए गए दस्तावेज आयोग को संतोषजनक नहीं लगते या संदेह पैदा करते हैं, तो आयोग नामांकन अस्वीकार कर सकता है या कानूनी प्रक्रिया के तहत नाम हटाने की कार्रवाई कर सकता है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है.”

अब हटाए गए लोगों के साथ क्या होगा?

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अदालत ने आदेश दिया है कि जिन लोगों के नाम संदेह के आधार के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चुनाव आयोग चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय  (सक्षम प्राधिकारी यानी Competent Authority) के पास भेजेगा और मंत्रालय नागरिकता की अंतिम जांच करेगा. जिनको वैध नागरिक माना जाएगा उनके नाम वापस मतदाता सूची में जोड़ दिए जाएंगे.

कोर्ट ने कहा है कि संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिया जाएगा, सुनवाई का अवसर मिलेगा और उसके दस्तावेजों की जांच की जाएगी. अगर जांच में वह भारतीय नागरिक पाया जाता है तो उसका नाम फिर से वोटर लिस्ट में जोड़ा जाएगा.

SIR में पहले से मौजूद है दावा और आपत्ति का प्रावधान

SIR प्रक्रिया में पहले ही दावा और आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था मौजूद है. जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए गए थे, उन्हें इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और जिला प्रशासन के सामने दस्तावेज जमा करने का मौका दिया गया था.

पश्चिम बंगाल में तो सुप्रीम कोर्ट ने खुद रिटायर्ड हाई कोर्ट जजों की निगरानी में अपील प्रक्रिया बनाई थी. वहां 34 लाख से ज्यादा अपीलें दायर हुईं. चुनाव से कुछ घंटे पहले करीब 1600 लोगों के नाम दोबारा वोटर सूची में जोड़े गए, जबकि 14 मई तक 4043 अपीलें ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार की जा चुकी थीं.

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भारत में क्या है नागरिकता का आधार?

भारतीय कानून के तहत नागरिकता तय करने का अधिकार गृह मंत्रालय (MHA) के पास है. भारत में नागरिकता चार आधारों पर दी जाती है- जन्म, वंश, पंजीकरण और प्राकृतिककरण.

 

जन्म: 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद, लेकिन 1 जुलाई, 1987 से पहले भारत में जन्मा कोई भी व्यक्ति खुद ही भारत का नागरिक बन जाता है.

इस तिथि के बाद लेकिन 3 दिसंबर, 2004 से पहले जन्मा कोई भी व्यक्ति खुद ही भारत का नागरिक बन जाता है यदि उसका जन्म भारत में हुआ हो और उसके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक हो.

3 दिसंबर, 2004 के बाद जन्मे व्यक्तियों को जन्म से नागरिकता तभी प्राप्त होती है जब उनके दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों, या यदि एक माता-पिता भारतीय नागरिक हों और दूसरा अवैध प्रवासी न हो.

वंश: यदि कोई व्यक्ति भारत के बाहर पैदा हुआ है, लेकिन जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक है, तो वह वंश के आधार पर नागरिकता का दावा कर सकता है.

रजिस्ट्रेशन: यह पंजीकरण भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ), भारतीय नागरिक से विवाहित व्यक्तियों, या प्रवासी भारतीय नागरिकों (ओसीआई) पर लागू होता है जो विशिष्ट निवास संबंधी जरूरतों को पूरा करते हैं।

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नागरिकता प्राप्त करना: जिन विदेशियों को अवैध प्रवासी के रूप में क्लासिफाइड नहीं किया गया है, वे नागरिकता के लिए अप्लाई कर सकते हैं बशर्ते वे पिछले 14 वर्षों में से 12 वर्षों तक कानूनी रूप से भारत में रह चुके हैं और उन्हें कोई भी भारतीय भाषा आती है. 

गृह मंत्रालय, व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मस्थान के रिकॉर्ड और उनके माता-पिता या जीवनसाथी के रिकॉर्ड की जांच करके नागरिकता का सत्यापन करता है. इसका मतलब यह है कि व्यक्ति को गृह मंत्रालय की ओर से नियुक्त ऑफिसर के समक्ष अपनी जन्म तिथि और जन्म स्थान साबित करना होगा.

यानी 2004 के बाद जन्मे लोगों की जानकारी तो सरकारी डेटाबेस में सीधे उपलब्ध है, लेकिन 2004 से पहले जन्मे लोगों को अपने जन्म का सबूत पुराने कागजात (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, राशन कार्ड आदि) से देना पड़ता है. ये दस्तावेज MHA को जमा करने पर वे जांच करके नागरिकता तय करते हैं.

सीबीएसई या स्टेट बोर्ड सर्टिफिकेट जिनमें जन्मतिथि व माता-पिता का नाम हो, वह भी बर्थप्लेस और बर्थडेट का प्रूफ है. इसके अलावा पासपोर्ट अपने आप में नागरिकता का सबसे बड़ा सबूत है.
 

पासपोर्ट को नागरिकता का सबसे मजबूत प्रमाण माना जाता है. नागरिकता अधिनियम की धारा 13 के तहत गृह मंत्रालय के पास “संदिग्ध नागरिकता” मामलों की जांच कर प्रमाणपत्र जारी करने की भी व्यवस्था है. यह प्रमाणपत्र गृह मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी स्तर के अधिकारी द्वारा जारी किया जाता है और इसे नागरिकता के प्रमाण के रूप में माना जाता है.

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क्या ये बैकडोर NRC है?
सामान्यतः, देश में पहले कभी भी ऐसे व्यक्तियों की नागरिकता के सामूहिक सत्यापन के लिए ऐसा कोई अभियान नहीं चलाया गया है, जिन पर पहले से ही अवैध अप्रवासी होने का आरोप नहीं है.

संदेहास्पद अवैध अप्रवासियों के मामलों को आमतौर पर स्थानीय पुलिस और विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) की ओर से देखा जाता है,  जो मौजूद डॉक्यूमेंट का सत्यापन करता है.
एसआईआर मामले में याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए तर्कों में से एक यह था कि एसआईआर प्रक्रिया "एक गुप्त एनआरसी की तरह लग रही है, जिसे बैकडोर से NRC कहा जा रहा है. सभी विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को संसद में भी उठाया था.

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मतदाता सूची से हटाए गए व्यक्तियों के मामले को गृह मंत्रालय को सौंपने का निर्देश दिया है, तो एक बार फिर यह सवाल उठेगा कि उनके दस्तावेजों के सत्यापन के लिए किस प्रक्रिया का पालन किया जाएगा.

अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों के मामलों को गृह मंत्रालय (MHA) के पास भेजने का निर्देश दिए जाने के बाद फिर यह सवाल उठने लगे हैं कि इन लोगों के दस्तावेजों की जांच किस प्रक्रिया के तहत की जाएगी. भारत में किसी व्यक्ति को “अवैध प्रवासी” मानने की स्थिति में उसका मामला आमतौर पर अर्ध-न्यायिक फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास भेजा जाता है.

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यदि ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति को “विदेशी” घोषित कर देता है, तो वह भारत में रहने के कानूनी अधिकार खो सकता है. इसके साथ ही वह सामाजिक सुरक्षा और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने का अधिकार भी गंवा सकता है. ऐसे लोगों को हिरासत में भी लिया जा सकता है, जब तक कि उनके वास्तविक मूल देश की पहचान और सत्यापन पूरा न हो जाए. 

आगे क्या होगा?
फिलहाल देश में 100 से अधिक फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं, जिनमें ज्यादातर असम में स्थापित किए गए थे, जहां NRC प्रक्रिया के दौरान इनकी शुरुआत हुई थी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2020 तक इन ट्रिब्यूनलों में 1,40,050 मामले लंबित थे, जबकि NGOs ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि 2025 तक भी 85 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं. हालांकि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित किए जाने के बाद उसके पास संबंधित हाई कोर्ट में अपील करने का अधिकार भी होता है. 

अब जबकि चुनाव आयोग द्वारा लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं तो सवाल है कि गृह मंत्रालय इन लोगों के दस्तावेजों की जांच किस तरह करेगा?
 

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