CAA के एक साल, सुप्रीम कोर्ट में 200 से ज्यादा याचिकाओं को सुनवाई का इंतजार

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ राजनीतिक दल, संसद सदस्य, धार्मिक समूह, सिविल सोसाइटी ग्रुप, छात्र संगठन, राजनीतिक संगठन, रिटायर नौकरशाह, वकील और कार्यकर्ता सभी शीर्ष अदालत पहुंचे.

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सुप्रीम कोर्ट (पीटीआई) सुप्रीम कोर्ट (पीटीआई)

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 10 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 10:16 PM IST
  • 8 महीने में CAA के खिलाफ 206 याचिकाएं दाखिल
  • केंद्र की कई याचिकाओं को हस्तांतरित करने की अपील भी शामिल

करीब एक साल पहले जब नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को संसद में पास कराया गया तो उसके खिलाफ देशभर में कई महीनों तक विरोध-प्रदर्शन होते रहे तो वहीं अधिनियम को चुनौती देने वाली ढेरों याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़ी हुई हैं.

सीएए के खिलाफ दिसंबर 2019 से जुलाई 2020 के बीच 206 याचिकाएं दायर की गई हैं. इनमें केंद्र द्वारा अधिनियम के खिलाफ कई हाई कोर्ट्स में दायर याचिकाओं को शीर्ष अदालत को हस्तांतरित करने की अपील भी शामिल है.

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अधिनियम के खिलाफ राजनीतिक दल, संसद सदस्य, धार्मिक समूह, सिविल सोसाइटी ग्रुप, छात्र संगठन, राजनीतिक संगठन, रिटायर नौकरशाह, वकील और कार्यकर्ता सभी शीर्ष अदालत पहुंचे.

असम समझौते के प्रावधानों का उल्लंघन

22 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि असम और त्रिपुरा के लोगों और पक्षों द्वारा दायर मामलों को अन्य पक्षों द्वारा दायर मामलों से अलग सुना जा सकता है. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि इनकी दलीलों में उठाए गए मुद्दे अलग हैं.

असम और त्रिपुरा की याचिकाओं में तर्क दिया गया था कि 2014 तक भारत में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों के लिए नागरिकता का विस्तार असम समझौते (Assam Accords) के प्रावधानों का उल्लंघन करता है. इन याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सीएए समझौते का उल्लंघन करता है और पूर्वोत्तर राज्यों को 'बांग्लादेशी प्रवासियों' को स्वीकार करने के लिए मजबूर करेगा.

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दूसरी ओर, पूर्वोत्तर राज्यों के बाहर पार्टियों और समूहों द्वारा दायर की गई याचिकाओं के जरिए अधिनियम को धार्मिक भेदभाव के आधार पर चुनौती दी गई है, क्योंकि यह अधिनियम कुछ विशिष्ट देशों से भारत में प्रवेश करने वाले विशेष समुदायों के लोगों के लिए नागरिकता के विशेषाधिकार प्रदान करता है.

मार्च में, केंद्र ने सभी दलीलों के लिए एक 'शुरुआती उत्तर' दाखिल किया, यह तर्क देते हुए कि सीएए भारतीय नागरिकों को प्रभावित नहीं करेगा, और विदेशी नागरिकों द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के बाद की मौजूदा प्रक्रिया को भी प्रभावित नहीं करेगा.

सरकार ने यह भी तर्क दिया कि चूंकि सीएए को विदेश नीति के फैसले के रूप में पारित किया गया था, इसलिए यह 'न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता.'

स्टे लगाने से इनकार

फरवरी में, देश की शीर्ष अदालत ने सीएए के कार्यान्वयन पर स्टे लगाने से इनकार कर दिया, यह देखते हुए कि 'लागू करने के लिए कोई कदम नहीं' उठाया गया था. अधिनियम को लागू करने के लिए केंद्र को अभी अगला कदम उठाना है, क्योंकि अधिनियम के तहत नियमों को अंतिम रूप नहीं दिया गया है.

5 मार्च को, जब तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया गया, तो मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने संकेत दिया कि याचिकाओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा सुना जाएगा. CJI एसए बोबडे ने यह भी देखा कि चूंकि 9 न्यायाधीशों की बेंच सबरीमाला मामले की सुनवाई कर रही थी, इसलिए सीएए से जुड़े मामलों की सुनवाई 9 न्यायाधीशों की बेंच का मामला समाप्त होने के बाद ही होगी.

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हालांकि, सबरीमाला मामले की सुनवाई फरवरी-मार्च में कुछ न्यायाधीशों के बीमार पड़ने से बाधित हो गई थी. इसके बाद 25 मार्च से कोरोना की वजह से लगाए गए लॉकडाउन के बाद से कोर्ट का काम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हो रहा है.

याचिकाकर्ताओं में से कुछ का प्रतिनिधित्व कर रही एडवोकेट मालविका त्रिवेदी का कहना है कि इसमें शामिल याचिकाओं की संख्या के कारण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई आयोजित करना 'व्यावहारिक रूप से असंभव' है. 

 

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