चक्का जाम, DL रिन्यू में देरी... इन अपराधों में अब नहीं होगी जेल! समझें जन विश्वास बिल को

जन विश्वास बिल लागू हो जाने पर मौजूदा कानून के कई अपराध, अपराध के दायरे से बाहर हो जाएंगे. ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर आग लगने के झूठे अलार्म तक, कई पर सजा के प्रावधान बदल जाएंगे.

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जन विश्वास बिल से अपराध के दायरे से बाहर होंगे कई अपराध जन विश्वास बिल से अपराध के दायरे से बाहर होंगे कई अपराध

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 03 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 11:29 AM IST

देश की संसद से जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) बिल पारित हो गया है. गजट नोटिफिकेशन जारी होते ही यह बिल कानून की शक्ल ले लेगा. इस बिल के कानून बन जाने के बाद मौजूदा कानून के कई अपराध, अपराध के दायरे से ही बाहर हो जाएंगे. वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल का दावा है कि इससे जनता की ईज ऑफ लिविंग बेहतर होगी, जीवनस्तर में बदलाव आएगा.

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उन्होंने इसे 'राम राज्य' की अवधारणा से जोड़ते हुए उसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है. जन विश्वास बिल के जरिये 80 केंद्रीय कानून संशोधित किए गए हैं. इस संशोधन के जरिये करीब एक हजार अपराध, अपराध के दायरे से बाहर कर दिए गए हैं. कुछ अपराध में सजा का प्रावधान हटाकर जुर्माना जोड़ा गया है.

वहीं, कुछ अपराध ऐसे भी हैं जिनमें अब केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया जाएगा. बात करते हैं ऐसी कुछ 'छोटी गलतियों', जो इस बिल के कानून बन जाने के बाद अपराध के दायरे से ही बाहर हो जाएंगी.

ड्राइविंग लाइसेंस

ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता अवधि समाप्त होने के बाद इसके रिन्यू कराने में मामूली देरी अपराध के दायरे से बाहर होगी. अब ड्राइविंग लाइसेंस वैधता समाप्त होने के बाद 30 दिन तक वैलिड माना जाएगा. डीएल रिन्यू कराने पर उसकी वैधता अवधि की गणना रिन्यू कराने की तारीख से की जाएगी, वैधता समाप्त होने की तारीख से नहीं.

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राजमार्ग जाम

राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत राजमार्ग जाम करने या ऐसी स्थिति उत्पन्न करने, जिससे आवागमन असुरक्षित हो, पर पांच साल तक की जेल या जुर्माना या फिर दोनों सजा का प्रावधान है. जन विश्वास बिल में इसके लिए जेल का प्रावधान समाप्त कर दिया गया है. राजमार्ग जाम करने के लिए नागरिक दंड, यानी जुर्माने का प्रावधान होगा.

आग का झूठा अलार्म

आग का झूठा अलार्म देना अब अपराध नहीं होगा. जन विश्वास बिल में इसे अपराध के दायरे से बाहर कर दिया गया है. मौजूदा कानून के तहत यह अपराध की श्रेणी में आता है और इसके लिए सजा का प्रावधान है.

जन्म-मृत्यु की सूचना न देना

जन्म-मृत्यु की सूचना न देना भी मौजूदा समय में कानून अपराध है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 के तहत जन्म और मृत्यु की सूचना न देना अपराध है  और इसके लिए सजा का भी प्रावधान है. जन विश्वास बिल के जरिये इसे भी अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है. कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत रजिस्टर में गलत प्रविष्टि भी अब अपराध के दायरे में नहीं आएगी.

आवारा मवेशियों से फसल को नुकसान

आवारा मवेशियों से फसल को नुकसान पहुंचना दंडात्मक अपराध है. जन विश्वास बिल में कैटल ट्रेसपास एक्ट, 1971 को अपडेट कर सजा के प्रावधान को नागरिक दंड यानी जुर्माने में बदलने की बात है. इस कानून के जरिये पशुओं को छोड़ने या आवारा छोड़ने पर भी केवल जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान किया गया है.

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बिजली से जुड़े अपराध में जुर्माना

बिजली अधिनियम, 2003 के मुताबिक विभाग के आदेश-निर्देश का पालन नहीं करने पर तीन महीने की जेल या जुर्माने का प्रावधान है. जन विश्वास बिल के कानून बन जाने के बाद इस अधिनियम से जुड़े अपराध पर जेल का प्रावधान खत्म हो जाएगा. ऐसे मामलों में केवल जुर्माने का प्रावधान रह जाएगा.

कॉस्मेटिक्स का निर्माण-बिक्री

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत नियमों के खिलाफ कॉस्मेटिक्स का निर्माण करना, बिक्री करना दंडात्मक अपराध है. इसके लिए एक साल जेल, 20 हजार रुपये जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है. जन विश्वास बिल में जेल की सजा का प्रावधान खत्म कर केवल जुर्माने का प्रावधान किया गया है.

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पहली बार अपराध पर सुधार का मौका

जन विश्वास बिल में कुछ कानूनों के उल्लंघन पर सुधार का मौका देने की बात है. अप्रेंटिस अधिनियम के तहत जानकारी देने से इनकार करना या प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे व्यक्ति से ओवरटाइम काम कराना मौजूदा कानून के तहत दंडनीय अपराध है. ऐसे अपराध में पहली बार उल्लंघन पर सलाह, दूसरी बार उल्लंघन पर चेतावनी और उसके बाद भी यही अपराध किए जाने की स्थिति में जुर्माने का प्रावधान जन विश्वास बिल में किया गया है.

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अपराध की गंभीरता के अनुपात में जुर्माना

जन विश्वास बिल में यह प्रावधान किया गया है कि जुर्माने की राशि अपराध की गंभीरता के अनुपात में तय की जाएगी. इसमें यह प्रावधान भी किया गया है कि विधेयक में निर्धारित जुर्माने और दंड हर तीन साल में न्यूनतम राशि के 10 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ेंगे.

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