अप्रैल 1948 की एक सुबह लाहौर से होकर गुजरने वाली अपर बारी दोआब नहर की जमीन में फटकर दरारें पड़ गईं. जिस नहर से पाकिस्तानी पंजाब के खेतों की सिंचाई होती थी और जिसमें कुछ दिन पहले तक पानी बह रहा था, अब उसकी सतह चिलचिलाती गर्मी में सूखकर फट गई थी. पाकिस्तानी किसान बेबस होकर देखते रहे कि कैसे उनकी नहरों से पानी गायब हो गया. इंजीनियर यह पता लगाने के लिए तेज़ी से नहर के ऊपरी हिस्से की ओर गए कि पूरे इलाके की जीवन-रेखा अचानक क्यों कट गई थी.
तब पूर्वी पंजाब यानी की भारत के हिस्से वाले पंजाब के सीएम गोपीचंद भार्गव कर रहे थे. पूर्वी पंजाब ने 30 दिनों तक सिंधु सिस्टम का हिस्सा रही अपर बारी दोआब नहर से निकलने वाले पानी को रोक दिया.
बंटवारे के मुश्किल से आठ महीने बाद ही भारत और पाकिस्तान अंतर-राज्यीय जल विवाद में उलझ गए. 1947 की हिंसा ने पंजाब को बांट दिया था, लेकिन नदियां और नहरें अब भी ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए एक ही जुड़े हुए सिस्टम के तौर पर बह रही थीं. विभाजन के बाद अस्थायी व्यवस्था के तहत भारत पहले की तरह पानी देता रहा, लेकिन यह समझौता 31 मार्च 1948 को खत्म हो गया. नया समझौता न होने के कारण पूर्वी पंजाब सरकार ने 1 अप्रैल 1948 से पानी की आपूर्ति रोक दी.
जब पंजाब की भार्गव सरकार ने पानी रोका तो मुहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई वाली नए आज़ाद पाकिस्तान की सरकार घबरा गई.
दरअसल बंटवारे के बाद जब सीमा तय की गई तो भारत को माधोपुर और फिरोजपुर में रणनीतिक रूप से अहम हेडवर्क्स मिले. ये हेडवर्क्स उन नहरों में पानी के बहाव को कंट्रोल करते थे जिनसे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बड़े इलाकों में सिंचाई होती थी. इस तरह बंटवारे और भौगोलिक स्थिति ने रातों-रात भारत (जो नदी के बहाव की दिशा में ऊपर की तरफ था) को उन 'टैप' या नियंत्रण बिंदुओं का अधिकार दे दिया, जिनसे पाकिस्तान के पंजाब में खेती वाली लगभग 5.5% ज़मीन को पानी मिलता था.
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि पाकिस्तान का पानी बंद करने का यह कदम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू या केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया "पूरी तरह से राष्ट्रीय" कदम नहीं था. यह कदम मुख्यमंत्री भार्गव के नेतृत्व में पंजाब के नए बने प्रांत ने उठाया था.
गोपीचंद भार्गव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता थे. उस समय पूर्वी पंजाब की अंतरिम विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत था और वे उसी कांग्रेस सरकार का नेतृत्व कर रहे थे.
जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने खेती के लिए पाकिस्तान का पानी रोकने को "काफी अमानवीय काम" कहा था.
पंजाब ने क्यों रोका था पाकिस्तान का पानी
सीमा-पार नदियों के जानकार उत्तम कुमार सिन्हा के अनुसार, 1 अप्रैल 1948 को दो स्वतंत्र देशों के बीच सिंधु बेसिन को लेकर पहला विवाद हुआ. भारत के पास लगभग हर तरह का रणनीतिक फ़ायदा था. बंटवारे के बाद पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान में) को सिंचाई के लिए पानी सप्लाई करने वाले अहम नहर हेडवर्क्स भारत के इलाके में आ गए, जिससे पाकिस्तान जो नदी के बहाव की दिशा में नीचे की ओर स्थित देश था बहुत कमज़ोर स्थिति में आ गया.
अपनी किताब 'इंडस बेसिन अनइंटरप्टेड' में उत्तम कुमार सिन्हा ने बताया है कि पाकिस्तान की खेती वाली ज़मीन का लगभग 5.5% हिस्सा इन्हीं नहरों पर निर्भर था, इसलिए इस्लामाबाद के लिए सैन्य टकराव के बजाय बातचीत ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प था.
सिन्हा ने अपनी किताब में लिखा, "...किसी समझौते के न होने और बातचीत शुरू करने के लिए वेस्ट पंजाब की ओर से कोई पहल न किए जाने के कारण, भारत ने जो अब एक आज़ाद देश था अपने हित में अपने इलाके से बहने वाले पानी पर कानूनी अधिकार स्थापित कर लिए."
सिन्हा ने बताया कि पाकिस्तान ने इस कदम को बिल्कुल अलग नज़रिए से देखा और इसे "मैकियावेलियन धोखेबाज़ी" (चालाकी भरी दोहरी चाल) करार दिया.
क्यों जिन्ना मनमसोस कर रह गए? भारत के खिलाफ कुछ नहीं कर पाए
पाकिस्तान के संस्थापक और पहले गवर्नर-जनरल मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में वहां के नेताओं को यह समझ आ गया था कि भारत के खिलाफ़ युद्ध करना कोई सही विकल्प नहीं है. ऐसा इसलिए था क्योंकि पाकिस्तानी सरकार को यह साफ था कि नई दिल्ली को भौगोलिक रूप से ऊपरी हिस्से में होने का फ़ायदा मिला हुआ है, जिसका मतलब था कि किसी भी तरह का सैन्य टकराव नए बने देश के लिए विनाशकारी साबित हो सकता था. कुछ महीने पहले, अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित मुजाहिदीनों ने कश्मीर पर हमला किया था, जिसे भारतीय सेना ने ज़बरदस्त जवाबी हमले में खदेड़ दिया था.
पंजाब सरकार से अलग थी नेहरू की राय
हालांकि पूर्वी पंजाब ने पानी का बहाव रोकने का फ़ैसला किया था, लेकिन नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नेहरू के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की इस बारे में अलग राय थी कि क्या किया गया और क्या नहीं किया जाना चाहिए था.
नेहरू पूर्वी पंजाब के एकतरफ़ा फ़ैसले से "बहुत नाराज़" थे. उत्तम कुमार सिन्हा ने अपनी किताब 'इंडस बेसिन अनइंटरप्टेड' में लिखा है कि 28 अप्रैल 1948 को भार्गव को लिखे एक पत्र में नेहरू ने चेतावनी दी थी कि "चाहे कानूनी और तकनीकी आधार कुछ भी हों, इसमें कोई शक नहीं कि इस कदम से दुनिया की नज़र में हमें बहुत नुकसान होगा."
नेहरू ने आगे यह भी लिखा कि खेती के लिए पानी रोकना "काफी अमानवीय काम" है और तर्क दिया कि ऐसे कदम केवल असल युद्ध के दौरान ही उठाए जाने चाहिए.
नेहरू का नज़रिया नई दिल्ली के नज़रिए से था. प्रधानमंत्री के तौर पर उनके लिए इस मुद्दे के कूटनीतिक और नैतिक पहलू भी अहम थे. वहीं, पूर्वी पंजाब के राजनीतिक नेताओं का फ़ैसला स्थानीय हालात से तय हो रहा था, जैसे बंटवारे का दर्द, विस्थापित समुदाय और भारतीय सीमाओं के भीतर मौजूद संसाधनों पर नियंत्रण करने की इच्छा.
पानी का बहाव रुकने के पांच हफ़्ते बाद मई 1948 में नई दिल्ली में हुई एक इंटर-डोमिनियन कॉन्फ्रेंस के ज़रिए इसे खत्म किया गया. भारत ने पाकिस्तान को पानी की सप्लाई शुरू कर दी.
इस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक ऐसा विचार भी सामने आया जो बाद में सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) की नींव बना.
अविनाश कटील