ईरान के चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत सरकार एक बड़ी कूटनीतिक दुविधा में है. बताया जा रहा है कि भारत इस वक्त चाबहार से अस्थायी रूप से अपनी हिस्सेदारी छोड़ने समेत विभिन्न विकल्पों पर विचार कर रहा है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत चाबहार पोर्ट से पूरी तरह बाहर निकलने की योजना नहीं बना रहा है, क्योंकि भारत ने यहां 120 मिलियन डॉलर का निवेश किया है. वहीं ये पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान और मिडिल ईस्ट तक व्यापारिक पहुंच बनाने के लिए बेहद जरूरी है.
ब्लूमबर्ग न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी प्रतिबंध छूट के आने वाले दिनों में समाप्त होने से पहले भारत चाबहार पोर्ट में अपनी हिस्सेदारी के संबंध में कई विकल्पों पर विचार कर रहा है, जिसमें अस्थायी रूप से हिस्सेदारी छोड़ना भी शामिल है.
अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने चाबहार पर 120 मिलियन डॉलर का निवेश किया है, इसी लिए वह पोर्ट को छोड़ना नहीं चाहता है और भविष्य को लेकर अमेरिका-ईरान दोनों से इस मुद्दे पर अलग-अलग बातचीत कर रहा है.
क्या है भारत की योजना
रिपोर्ट के अनुसार, भारत चाबहार पोर्ट से पूरी तरह बाहर निकलने की योजना नहीं बना रहा है. इसके बजाय वह एक तकनीकी समाधान के रूप में भारत अपनी हिस्सेदारी अस्थायी रूप से किसी ईरानी कंपनियों को ट्रांसफर कर सकता है. ये एक रणनीतिक कदम होगा, ताकि प्रतिबंधों की समय सीमा खत्म होने पर कानूनी उलझनों से बचा जा सके और भविष्य में मौका मिलते ही दोबारा नियंत्रण हासिल किया जा सके.
नहीं आवंटित किया बजट
दरअसल, अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से मिली छह महीने की छूट नवंबर 2025 में शुरू हुई थी जो अगले कुछ दिनों में खत्म होने वाली है. भारत सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि चाबहार पर अपना वित्तीय दायित्व पूरा कर लिया गया है और 2026-27 के बजट में इसके लिए कोई नया बजट आवंटित नहीं की गई है. उधर, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने पहले कहा था कि भारत अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर लगातार बातचीत कर रहा है, ताकि समयबद्ध छूट के ढांचे में काम जारी रखा जा सके.
भारत के लिए जरूरी है चाबहार
चाबहार पोर्ट पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का भारत का मुख्य द्वार है. ये स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नजर रखने के साथ-साथ पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर चीन की मौजूदगी का मुकाबला करने के लिए भी महत्वपूर्ण है. भारत की भविष्य की योजनाओं में यहां एक रेल लिंक बनाना भी शामिल है, ताकि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को और अधिक गहरा किया जा सके.
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि दिल्ली फिलहाल अपनी रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और वाशिंगटन के कड़े प्रतिबंधों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है.
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