क्यों अहम है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट? राहुल गांधी के आरोपों पर केंद्र सरकार का पलटवार

ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को लेकर छिड़ी राजनीतिक बहस के बीच सरकार ने इसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री ताकत और आर्थिक हितों से जुड़ी रणनीतिक जरूरत बताया है. सूत्रों का कहना है कि प्रोजेक्ट के आलोचक इसकी भौगोलिक और सामरिक अहमियत को समझने में नाकाम रहे हैं.

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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर सियासी घमासान, गेमचेंजर होगी महत्वाकांक्षी परियोजना. (AI-generated image) ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर सियासी घमासान, गेमचेंजर होगी महत्वाकांक्षी परियोजना. (AI-generated image)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:26 PM IST

ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने पहली बार विस्तार से अपनी बात रखी है. रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा है कि यह परियोजना भारत के सामरिक समुद्री हितों, आर्थिक संभावनाओं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक महत्व को ध्यान में रखकर तैयार की गई है. 

आलोचकों पर निशाना साधते हुए कहा कि वे "ज्योग्राफिकल अनपढ़ता" से जूझ रहे हैं. इस क्षेत्र की वास्तविक रणनीतिक अहमियत को समझ नहीं पा रहे हैं. सरकार इस प्रोजेक्ट के तहत एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, सिविलियन-कम-नेवल एयरपोर्ट, आधुनिक टाउनशिप की योजना पर काम कर रही है. 

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सरकार का मानना है कि यह परियोजना भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में नई रणनीतिक ताकत प्रदान करेगी. ये बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में ग्रेट निकोबार परियोजना पर सवाल उठाए थे. उन्होंने दावा किया था कि सरकार किसी बड़े कारोबारी को फायदा पहुंचाने के लिए काम कर रही है. 

उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत की सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय जमीन को होटल और कसीनो परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. राहुल गांधी ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के अपने दौरे पर आधारित 15 मिनट से अधिक का एक वीडियो भी जारी किया था. इसमें लोगों से आइलैंड बचाने की अपील की थी.

इस वीडियो में उन्होंने एक याचिका पर हस्ताक्षर करने की अपील करते हुए कहा था कि देश को लालच के बजाय हरियाली का रास्ता चुनना चाहिए. हालांकि, सरकारी सूत्रों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में यह परियोजना रणनीतिक आवश्यकता बन चुकी है. 

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उनका कहना है कि भारत इस स्थान का उपयोग उसी तरह करना चाहता है जैसे सिंगापुर ने अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर वैश्विक लॉजिस्टिक्स और व्यापार का बड़ा केंद्र बनाया. ग्रेट निकोबार और उसके आसपास का समुद्री क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और हाइड्रोकार्बन भंडारों से भी समृद्ध माना जाता है. 

सूत्रों का कहना है कि जब तक भारत की वहां मजबूत और टिकाऊ मौजूदगी नहीं होगी, तब तक इन संभावनाओं का प्रभावी उपयोग संभव नहीं है. प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के निर्माण में रक्षा मंत्रालय लगभग 13,000 करोड़ रुपए का योगदान देगा, जबकि बाकी खर्च नागरिक उड्डयन मंत्रालय वहन करेगा. 

यह एयरपोर्ट केवल नागरिक उड्डयन के लिए नहीं बल्कि सैन्य दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. नया एयरपोर्ट भारत की मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (MDA) और ऑपरेशनल आउटरीच को कई गुना बढ़ा देगा. केवल मौजूदा रक्षा सुविधाओं का विस्तार कर वो क्षमता हासिल नहीं होगी, जो इस परियोजना के जरिए संभव है.

एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) ने 2040 तक इस एयरपोर्ट की शुरुआती क्षमता प्रतिवर्ष 13.5 लाख यात्रियों की रखने की योजना बनाई है. यह परियोजना भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन की जा रही है. अंडमान और निकोबार में मौजूद भारतीय नौसेना के एयर स्टेशन INS बाज का रनवे इसका हिस्सा नहीं है. 

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INS बाज के रनवे को हाल ही में 4,500 फीट तक बढ़ाया गया था. सरकार का कहना है कि यदि रनवे को और बढ़ाया जाता है तो इसके लिए बड़े पैमाने पर भूमि सुधार की जरूरत होगी, जिससे आदिवासी क्षेत्रों, वनस्पतियों और वन्यजीवों पर असर पड़ सकता है. यही वजह है कि नई ग्रीनफील्ड परियोजना को बेहतर विकल्प माना गया.

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