'जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी,' सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की ये टिप्पणी?

दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत 2018 की एक कॉलेजियम बैठक की सूचना देने से इनकार कर दिया था. इस फैसले के खिलाफ एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. शुक्रवार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की बेंच ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है.

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कॉलेजियम सिस्टम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया. कॉलेजियम सिस्टम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया.

कनु सारदा / संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 02 दिसंबर 2022,
  • अपडेटेड 11:54 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम की बैठकों का एजेंडा और कार्यवाही सार्वजनिक किए जाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. हालांकि फैसला सुरक्षित रखते हुए बेंच ने कॉलेजियम सिस्टम का खुलकर बचाव किया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम सबसे पारदर्शी है. सिस्टम अपना काम कर रहा है, उसे डीरेल करने की कोशिश ना करें. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई करते हुए ये बातें कही है. सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी अहम मानी जा रही है, क्योंकि ज्यूडिशरी के भीतर विभाजन और कॉलेजियम सिस्टम को लेकर सरकार के साथ बढ़ते विवाद के बीच आई है. 

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दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत 2018 की एक कॉलेजियम बैठक की सूचना देने से इनकार कर दिया था. इस फैसले के खिलाफ एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. शुक्रवार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की बेंच ने सुनवाई की और कहा- जो सिस्टम काम कर रहा है, उसे पटरी से ना उतारा जाए. कॉलेजियम को अपना काम करने दें. हम सबसे पारदर्शी संगठन हैं. कॉलेजियम के पूर्व सदस्यों के फैसलों पर टिप्पणी करना फैशन बन गया है. 

क्या देश के लोगों को फैसले जानने का अधिकार नहीं?

अंजलि का कहना था कि उसने आरटीआई अधिनियम के तहत सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की एक विवादास्पद 2018 की बैठक का विवरण मांगा था. उनके इस अनुरोध को खारिज कर दिया गया था. सुनवाई के दौरान भारद्वाज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा- 'क्या कॉलेजियम के फैसले RTI के तहत जवाबदेह हैं? यह सवाल है. क्या इस देश के लोगों को जानने का अधिकार नहीं है? पहले कोर्ट ने ही कहा था कि RTI नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट इस बात से पीछे हट रहा है.

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पूर्व सदस्यों का टिप्पणी करना फैशन बन गया है

इस पर जस्टिस शाह ने जवाब दिया कि उस कॉलेजियम की बैठक में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ. हम कॉलेजियम के पूर्व सदस्यों के बीच हुई किसी भी बात पर टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं. अब कॉलेजियम के पूर्व सदस्यों का अपने कार्यकाल के दौरान डॉक्यूमेंट पर टिप्पणी करना फैशन हो गया है. हम सबसे अधिक निष्ठावान संस्थान हैं. हम पीछे नहीं हट रहे हैं. बहुत से मौखिक निर्णय लिए जाते हैं, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा. जस्टिस एमआर शाह ने कहा- कॉलेजियम का हिस्सा रह चुके सदस्य अब कोलेजियम को लेकर जो कहते हैं, हम उस पर कोई टिप्पणी करना कतई उचित नहीं समझते हैं. 

याचिका में पूर्व CJI गोगोई की किताब का दिया हवाला

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जस्टिस रंजन गोगोई की आत्मकथा 'जस्टिस फॉर द जज' में उल्लिखित एक घटनाक्रम को इस याचिका का आधार बनाया गया है. राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग और दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राजेंद्र मेनन के नाम को 12 दिसंबर, 2018 को कॉलेजियम की बैठक सुप्रीम कोर्ट में जज के रूप में प्रमोशन करने को मंजूरी मिली थी. किताब में कहा गया है कि ये मामला कथित रूप से लीक हो गया था. इसके बाद 15 दिसंबर, 2018 को शीतकालीन अवकाश शुरू हो गया. इसके बाद सीजेआई गोगोई ने जनवरी 2019 तक उनको ठंडे बस्ते में डाल दिया था. जनवरी 2019 में जस्टिस मदन बी लोकुर रिटायर हुए तो कॉलेजियम में दूसरे सीनियर मोस्ट जज शामिल हुए.

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