'अनुच्छेद 370 को संविधान सभा द्वारा ही हटाया जा सकता था', सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकील की दलील

CJI ने पूछा कि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा ने संविधान बना कर अपना काम पूरा कर लिया. फिर 1957 के बाद संवैधानिक आदेश जारी करने का अवसर कहां था? यदि आपका तर्क सही है, तो संविधान को बदलने की शक्ति आखिर कहां है? जैसा आप कह रहे हैं कि संविधान सभा भंग होने के बाद जम्मू कश्मीर से संबंधित कोई भी बदलाव करने की कोई शक्ति नहीं थी.

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सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 17 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 10:14 PM IST

जम्मू-कश्मीर से चार साल पहले संविधान के अनुच्छेद 370 को लेकर दाखिल की गई याचिकाओं पर गुरुवार को भी सुनवाई हुई. इस दौरान जस्टिस डी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ में सातवें दिन भी सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से दलील देते हुए 1960 के द बेरुबारी यूनियन के मुकदमे में दिए फैसले को आधार बनाते हुए तर्क दिया कि अनुच्छेद 3 के जरिए मिली शक्ति के प्रयोग से हर चीज को खत्म करने के लिए राष्ट्रपति शासन का उपयोग करना संवैधानिक सुरक्षा उपायों का मजाक है.

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उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 हमेशा से अस्थायी होने के लिए डिजाइन किया गया था. ना कि भारतीय प्रभुत्व के नजरिए से. वो जम्मू कश्मीर के नजरिए से अस्थायी था. अनुच्छेद 370 को केवल संविधान सभा द्वारा हटाया जा सकता था. इसी कारण इसे अस्थायी कहा गया. इसके स्थायित्व का निर्णय करना अंततः जम्मू-कश्मीर के लोगों के हाथ में था.

उन्होंने कहा कि 1957 में संविधान सभा भंग हो गई. संविधान सभा का निर्माण और समापन एक बार की प्रक्रिया थी, जिसे बार-बार दोहराया नहीं जा सकता. वहीं CJI ने पूछा कि जम्मू-कश्मीर संविधान सभा ने संविधान बना कर अपना काम पूरा कर लिया. फिर 1957 के बाद संवैधानिक आदेश जारी करने का अवसर कहां था? यदि आपका तर्क सही है, तो संविधान को बदलने की शक्ति आखिर कहां है? जैसा आप कह रहे हैं कि संविधान सभा भंग होने के बाद जम्मू कश्मीर से संबंधित कोई भी बदलाव करने की कोई शक्ति नहीं थी. तो हम अनुच्छेद 370 (1), (2), (3) की व्याख्या कैसे कर सकते हैं? इसके लिए एक तार्किक स्थिरता तो होनी चाहिए. 

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दवे ने आगे अपनी दलील में संविधान सभा पर बहस के दौरान गोपालस्वामी अयंगर के भाषणों  और 1959 के प्रेम नाथ कौल मामले के आधार पर तर्क दिया कि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के पास ही अनुच्छेद 370 को पूरी तरह से निरस्त करने की शक्ति थी. फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है. वकील शेखर नाफडे ने दलील दी कि बदलाव के साथ ही वहां सब कुछ उलट-पुलट हो गया है. संवैधानिक ढांचे पर इसका प्रभाव कई आयाम में होगा. 

1. पुनर्गठन के बाद, लद्दाख का राज्यसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है.

2. जनसंख्या के बावजूद जम्मू-कश्मीर का लोकसभा में आनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं है.

3. राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जम्मू-कश्मीर में कोई विधायक नहीं है. जम्मू-कश्मीर एक राज्य नहीं है, इसलिए राष्ट्रपति के चुनाव में अप्रत्यक्ष चुनाव का कोई अधिकार नहीं है. इस लोकतंत्र में इतना बड़ा क्षेत्र नजरअंदाज कर दिया गया है.

4. GST परिषद में प्रतिनिधित्व करने के लिए जम्मू-कश्मीर का कोई प्रतिनिधि नहीं है.

5. हाई कोर्ट मे जजों की नियुक्ति के मामले मे अन्य राज्यों में राज्यपाल से परामर्श किया जाता है. जम्मू-कश्मीर से सलाह नहीं ली जाएगी.

नाफड़े ने कहा कि एक बहुत छोटे अधिनियम, जिसमें राष्ट्रपति आदेश CO 272 द्वारा जम्मू और कश्मीर के पूरे संवैधानिक ढांचे का पुनर्गठन किया गया है.
इसके साथ ही उनकी दलील पूरी हुई. इसके बाद वरिष्ठ वकील दिनेश द्विवेदी ने दलील देते हुए कहा कि एक राज्य को एक केंद्रशासित प्रदेश में नहीं बदला जा सकता है.

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द्विवेदी ने कहा कि अनुच्छेद 1 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को समान संवैधानिक दर्जा प्रदान नहीं करता है. यह संविधान के संघीय ढांचे का एक हिस्सा था.
उन्होनें कहा कि जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश में बदलने से इसकी संवैधानिक स्थिति कमतर हो गई है. यह स्वीकार्य नहीं है. यही नहीं, य़ह संघवाद और दोहरी राजनीति के सिद्धांत का उल्लंघन भी है. 

दिनेश द्विवेदी इस मामले पर 22 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में अपनी दलील जारी रखेंगे. हालांकि CJI ने द्विवेदी से कहा कि आप सुनिश्चित कर लें कि मंगलवार को आपकी दलील पूरी हो जाए.

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