प्री-वेडिंग शूट के बाद अब 'जूता चुराई' पर रोक... सेन समाज ने शादी की रस्मों पर चलाई कैंची, सगाई के बाद फोन कॉल पर भी रोक

मॉडर्न कल्चर के बीच अपनी पारंपरिक जड़ों को सुरक्षित रखने और फिजूलखर्ची रोकने के लिए तमाम समुदाय शादी-ब्याह के नियमों को कड़ा कर रहे हैं. साहू समाज के बाद अब सेन समाज ने कई कड़े और रोचक प्रतिबंध लगाए हैं.

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सेन समाज ने शादियों के लिए जारी किए कड़े नियम. (Photo: Representational) सेन समाज ने शादियों के लिए जारी किए कड़े नियम. (Photo: Representational)

सुमी राजाप्पन

  • बालोद/रायपुर,
  • 05 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:33 PM IST

छत्तीसगढ़ में सामाजिक संस्थाएं अब शादियों में बढ़ते खर्च और पारिवारिक विवादों को रोकने के लिए 'रेगुलेटर' की भूमिका में आ गई हैं. साहू समाज द्वारा प्री-वेडिंग शूट पर प्रतिबंध लगाने के बाद, अब राज्य के सेन समुदाय ने बालोद में कई सख्त नियमों का ऐलान किया है. 

सेन समुदाय ने शादियों में पारंपरिक 'जूता चुराई' रस्म पर रोक और सगाई के बाद दूल्हा-दुल्हन के बीच निजी बातचीत पर प्रतिबंध शामिल है. ये फैसले बालोद जिले में सेन समुदाय की जिला स्तरीय बैठक में लिए गए, जहां नेताओं ने शादी के बढ़ते खर्च, पारिवारिक विवादों और सगाई टूटने के मामलों पर चिंता जताई.

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सबसे चर्चित फैसला ‘जूता चुराई’ रस्म पर रोक है. यह रस्म उत्तर भारत की कई शादियों में आम है, जिसमें दुल्हन की बहनें या रिश्तेदार दूल्हे के जूते छिपाकर पैसे मांगते हैं. समुदाय के नेताओं के अनुसार, यह रस्म कभी-कभी दोनों परिवारों के बीच बहस या असहज बातचीत का कारण बन जाती है. इसलिए समुदाय ने इसे हतोत्साहित कर प्रभावी रूप से प्रतिबंधित करने का फैसला किया है.

एक अन्य महत्वपूर्ण नियम सगाई के बाद दूल्हा-दुल्हन के बीच फोन पर निजी बातचीत पर रोक है. समुदाय के प्रतिनिधियों ने कहा कि हाल के कई मामलों में बार-बार फोन पर बातचीत से गलतफहमियां हुईं और सगाई टूट गई. नए नियम के तहत यदि बातचीत जरूरी हो तो परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में ही बात हो सकती है.

बैठक में प्री-वेडिंग समारोहों को सीमित करने पर भी जोर दिया गया. दिशानिर्देशों के अनुसार, सगाई में दूल्हे पक्ष से सिर्फ 15-20 लोग ही शामिल होंगे. इससे समारोह सरल रहेंगे और परिवारों पर आर्थिक बोझ कम होगा.

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समुदाय ने यह भी जोर दिया कि शादियां सही मुहूर्त में ही होनी चाहिए. साथ ही पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा दिया गया है. शादी के भोज में प्लास्टिक के बजाय पारंपरिक पत्तल पर भोजन परोसने की सलाह दी गई है.

एक अन्य फैसले में कहा गया कि यदि कोई परिवार किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करता है, तो समुदाय में सामाजिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, जिसमें सामाजिक बहिष्कार और वैवाहिक संबंधों पर रोक शामिल है.

समुदाय के प्रतिनिधियों ने कहा कि ये फैसले बुजुर्गों और सामाजिक नेताओं के बीच चर्चा के बाद लिए गए हैं, ताकि पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित रखा जा सके और शादियों के दौरान परिवारों के बीच विवाद न हों. इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य शादियों में अनुशासन, सादगी और सद्भाव को बढ़ावा देना है.

कुछ सदस्यों ने इन फैसलों का स्वागत किया है, लेकिन युवाओं में बहस छिड़ गई है. कई का मानना है कि शादी से पहले बातचीत से एक-दूसरे को बेहतर समझने में मदद मिलती है, जबकि अन्य मानते हैं कि ये नियम गलतफहमियां रोकेंगे और सामाजिक मूल्यों को बचाएंगे.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में सेन समाज की आबादी लगभग 2.25 लाख है और यह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत आता है. फिलहाल ये नियम बालोद जिले के लिए हैं, लेकिन जल्द ही इन्हें पूरे प्रदेश में लागू करने की योजना है.
 

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