झारखंड: चंद रुपयों के लिए शिक्षकों ने कबाड़ की दुकान पर बेचीं गरीब बच्चों की किताबें

झारखंड शिक्षा परियोजना के तहत गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए निशुल्क उपलब्ध कराई जाने वाली किताबों का सौदा कबाड़ी की दुकान पर हो रहा था. जब इस बात की भनक शिक्षा विभाग के अधिकारियों को लगी, तो वे स​तर्क हो गए. सरकारी किताबों से भरी एक पिकअप गाड़ी को जब्त कर लिया गया. इस मामले को लेकर शिक्षा विभाग के अधिकारी जांच में जुट गए हैं. 

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शिक्षा विभाग द्वारा पकड़ी गई किताबों से भरी पिकअप गाड़ी शिक्षा विभाग द्वारा पकड़ी गई किताबों से भरी पिकअप गाड़ी

सत्यजीत कुमार

  • दुमका,
  • 19 फरवरी 2021,
  • अपडेटेड 12:16 AM IST
  • सरकार निशुल्क करती है इन किताबों का वितरण
  • शिक्षा विभाग की टीम ने पिकअप गाड़ी को किया जब्त  

झारखंड के दुमका ​जिले में शिक्षा विभाग ने सरकारी किताबों से भरी एक पिकअप गाड़ी को जब्त किया है. गरीब बच्चों की किताबों का कबाड़ी की दुकान पर सौदा करने के लिए ले जाया जा रहा था. बताया गया है कि निशुल्क वितरण के लिए आईं इन किताबों को खुद शि​क्षकों ने कुछ पैसों की खातिर बेच दिया था. 

शिक्षकों ने बेच दीं ये किताबें 

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शिक्षा विभाग की टीम द्वारा बरामद की गईं ये किताबें दुमका जिले के गणपुरा मध्य विद्यालय की बताई जा रही हैं. शिक्षकों ने किताबों को कबाड़ में सिर्फ कुछ रुपयों के खातिर बेच दिया. इसका खुलासा खुद खरीदने वाले कबाड़ी ने किया. ये किताबें झारखंड सरकार द्वारा झारखंड शिक्षा परियोजना के तहत सरकारी स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए भेजी जाती हैं, जिससे ये बच्चे पढ़ाई कर सकें. इन किताबों का वितरण पूरी तरह निशुल्क होता है. सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि इन किताबों को न तो कोई व्यापारी खरीद सकता है और ना ही कोई इन्हें बेच सकता है. 

इस तरह हुई जानकारी

दरअसल ये किताबें पिकअप गाड़ी में लादकर ले जाई जा रही थीं. जब शिक्षा विभाग के अधिकारियों की इस गाड़ी पर नजर पड़ी, तो उन्होंने गाड़ी को रुकवा लिया. जब देखा गया, तो पाया कि गाड़ी में झारखंड शिक्षा परियोजना के तहत निशुल्क बांटे जाने वाली किताबे हैं.

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इसके बाद शिक्षा विभाग की टीम ने इस गाड़ी को अपने कब्जे में ले लिया. बताया गया है कि इन किताबों को दुमका के रास्ते पश्चिम बंगाल की ओर ले जाया जा रहा था. शिक्षा विभाग के अधिकारी इस मामले की जांच कर रहे हैं. बताया गया है कि कबाड़ी के यहां से इन किताबों को छोटे कारखानों को बेचा जाता है, जहां इन किताबों के पन्नों से दोने बनाने का काम होता है. (इनपुट- दुमका से मृत्युंजय पांडेय)

 

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