जिमखाना क्लब की नवाबी के किस्से, वायसराय की पत्नी ने पैसा देकर बनवाया स्विमिंग पूल

ब्रिटिश रॉयलटी की प्रतीक और वायसराय की पत्नी लेडी वेलिंग्टन एनर्जेटिक और डॉमिनेटिंग व्यक्तित्व की महिला थीं. शारीरिक रूप से वे सक्रिय और प्रभावशाली लगती थीं. तैराकी को लेकर ये उनकी दीवानगी ही थी कि उन्होंने जिमखाना क्लब में 96 साल पहले 21 हजार रुपये का डोनेशन दिया था.

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लॉर्ड वेलिंग्टन की पत्नी लेडी  मैरी एडिलेड फ्रीमैन. (Photo: ITG) लॉर्ड वेलिंग्टन की पत्नी लेडी मैरी एडिलेड फ्रीमैन. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:26 PM IST

ब्रिटिश भारत में क्लब संस्कृति का सबसे बड़ा आकर्षण था उसकी विलासिता. विशाल लॉन, संगमरमर से बने बार, विदेशी शराब, बॉलरूम डांस और यूरोपीय खानपान. यहां सब कुछ अंग्रेजी अभिजात्य जीवनशैली का हिस्सा था. यहां आना एक रूटीन नहीं, एहसास का हिस्सा था. इस एलीट क्लब में शामिल होना ही तत्कालीन समाज में शख्स को समाज से दो पायदान ऊपर उठा देता था. 

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औपनिवेशिक भारत में 'जिमखाना क्लब' सिर्फ खेल या मेल-जोल की जगह नहीं थे, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की नवाबी, शानो-शौकत, एश्वर्य और सत्ता के प्रदर्शन का प्रतीक माने जाते थे. अंग्रेजों की कृपा से उपकृत कई 'लाट साहब', 'नवाब' और 'राय बहादुर' यहां आकर खुद को गरीब और दबे कुचले भारतीयों से विशिष्ट समझते थे. 

बावजूद इसके यहां चुनिंदा 'ब्राउन साहिबों' की एंट्री हो पाती थी. दिल्ली, मुंबई, लखनऊ और कोलकाता के जिमखाना क्लबों में वही लोग दाखिल हो सकते थे जो अंग्रेज अफसरों, रजवाड़ों या बड़े व्यापारिक घरानों से जुड़े हों. आम भारतीयों के लिए इन क्लबों के दरवाजे लगभग बंद रहते थे. 

जिस दिल्ली जिमखाना की अभी चर्चा है वहां के नवाबी किस्से भी हैरान करने वाले हैं. 

नई दिल्ली स्थित जिमखाना क्लब का निर्माण 1930 के दशक की शुरुआत में किया गया. इसके निर्माण का ठेका वास्तुकार रॉबर्ट टी. रसेल को दिया गया था, जिनकी दो अन्य इमारतें भी शहर में मील का पत्थर बन गईं. 

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एक स्पोर्ट्स क्लब होने के बावजूद, 1930 के दशक तक जिमखाना में स्विमिंग पूल नहीं था. उस समय बन रहे वायसराय हाउस में भी कोई स्विमिंग पूल नहीं था. तब भारत के वायसराय लॉर्ड वेलिंग्टन थे. उनकी पत्नी थी लेडी वेलिंग्टन. 

एनर्जेटिक और डॉमिनेटिंग व्यक्तित्व की महिला लेडी वेलिंग्टन

ब्रिटिश रॉयलटी की प्रतीक लेडी वेलिंग्टन एनर्जेटिक और डॉमिनेटिंग व्यक्तित्व की महिला थीं. शारीरिक रूप से वे सक्रिय और प्रभावशाली लगती थीं. समकालीन वर्णनों में उन्हें "full of energy" कहा गया है. 

दिल्ली जिमखाना का बॉल रूम.

दिल्ली में उन्हें स्वीमिंग पूल की तलब हुई. वायसराय की बीवी को तैराकी के लिए पूल चाहिए था तो पूरा महकमा खोजने में जुट गया. आखिरकार कुछ अमीर भारतीयों के घर में बने स्वीमिंग पूल को उन्हें इस्तेमाल करना पड़ता. लेकिन ये वायसराय की शान में गुस्ताखी थी. 

लेडी वेलिंग्टन को वायसराय हाउस में काम कर रहे कंस्ट्रक्शन कर्मचारियों से भी परेशान हो रही थीं. आखिरकार उन्हें एक रास्ता मिल ही गया. 

96 साल पहले 21000 रुपये देकर बनवाए स्वीमिंग पूल

अपने पति का कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्होंने स्विमिंग पूल बनवाने के लिए 21000 रुपये दान में दिए.  21000 रुपये 96 साल पहले बहुत बड़ी रकम होती थी. 

उनकी ख्वाहिश पूरी हो गई. लॉर्ड वेलिंगडन  18 अप्रैल 1931 से 18 अप्रैल 1936 तक रहे. इस दौरान इस शाही जोड़े ने इस पूल का प्रयोग अपनी अठखेलियों के लिए खूब किया. 

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तब इस क्लब में सेना के बड़े अधिकारी, ICS अफसर, नवाब, महाराजा और ब्रिटिश कारोबारी शामें बिताते थे. क्लबों में घुड़सवारी, पोलो, टेनिस और बिलियर्ड्स जैसे खेल खेले जाते, जबकि शाम ढलते ही संगीत, डिनर और कॉकटेल पार्टियों का दौर शुरू हो जाता. अंग्रेज अधिकारी इन जगहों को “सिविलाइज्ड ब्रिटिश लाइफ” का विस्तार मानते थे.

दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास खास तौर पर दिलचस्प माना जाता है. लुटियंस दिल्ली के केंद्र में बना यह क्लब ब्रिटिश सत्ता के सबसे प्रभावशाली चेहरों का अड्डा था. यहां होने वाली पार्टियों में सत्ता, राजनीति और व्यापार के बड़े फैसलों पर अनौपचारिक चर्चाएं होती थीं. क्लब के ड्रेस कोड से लेकर खाने के मेन्यू तक में अंग्रेजी ठाठ झलकता था.

 "लेडी विलिंगडन स्विमिंग बाथ"

क्लब की कमेटी वायसराय के की दरियादिली को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती थी. जल्द ही जनरल कमेटी ने आदेश दिया कि उनकी दरियादिली की पहचान के तौर पर वहां खास तौर पर लिखवाई गई पट्टियां लगाई जाएं. 

 "लेडी विलिंगडन स्विमिंग बाथ" और "द विलिंगडन स्क्वैश कोर्ट्स" नाम की दो चमचमाती पट्टियां तुरंत बनवाई गईं और 16 मार्च 1936 को वायसराय लॉर्ड विलिंगडन और लेडी विलिंगडन के जिमखाना क्लब में विदाई समारोह के लिए आने से काफ़ी पहले ही वहां लगा दी गईं. 

आजादी के बाद भले ही इन क्लबों का चरित्र बदला लेकिन उनकी “एलिट पहचान” बनी रही. आज भी कई पुराने जिमखाना क्लबों की सदस्यता पाना बेहद मुश्किल माना जाती है. 
 

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