किडनी रैकेट: 4 डॉक्टरों को पुलिस का नोटिस, सरकार ने बनाई जांच कमेटी

इसके साथ ही दिल्ली पुलिस इंटरनल कमेटी के चार डॉक्टर के पैनल से भी पूछताछ करेगी. सभी को नोटिस जारी किया गया है. इन चार में से तीन डॉक्टर अपोलो के हैं, जबकि एक बाहर के हैं.

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लव रघुवंशी / पुनीत शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 06 जून 2016,
  • अपडेटेड 7:45 AM IST

दिल्ली सरकार ने अपोलो अस्पताल के किडनी रैकेट मामले में जांच के लिए एक 5 सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया है. मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. डीके टैम्पे इस कमेटी के अध्यक्ष होंगे.

इसके साथ ही दिल्ली पुलिस इंटरनल कमेटी के चार डॉक्टर के पैनल से भी पूछताछ करेगी. सभी को नोटिस जारी किया गया है. इन चार में से तीन डॉक्टर अपोलो के हैं, जबकि एक बाहर के हैं.

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जांच समिति में डॉ. टैम्पे के अलावा आकाश महापात्रा, डॉ. आरएस अहलावत, डॉ. सुमन लता और मिस विभूति हैं.

तीन शहरों में पड़ा छापा
इससे पहले दिल्ली पुलिस ने इस मसले पर रविवार को तीन शहरों में छापेमारी की. इसके साथ ही अपोलो अस्पताल के अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनसे जांच में शामिल होने और पिछले कुछ महीनों में हुए किडनी रैकेट से जुड़े दस्तावेज मुहैया कराने के लिए कहा है.


अपोलो अस्पताल जहां अक्सर जानी मानी हस्तियां अपना इलाज कराने के लिए पहुंचती हैं. जिस अस्पताल को तमाम सुविधाओं से लैस माना जाता है. लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि ठीक सरिता विहार थाने और साउथ ईस्ट जिले के डीसीपी ऑफिस के सामने मौजूद इस अस्पताल में छह महीनों से एक बड़ा किडनी रैकेट काम कर रहा था? एक ऐसा किडनी रैकेट जिसके तार सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक भी फैले हुए थे. और जिसने अब तक धंधेबाजी में लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों रुपए के वारे-न्यारे कर दिए.

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इस रैकेट में हर धंधेबाज़ के हिस्से का काम बंटा हुआ था. कुछ लोग शिकार यानी डोनर की तलाश करते थे, जबकि कुछ रिसीवर की. फिर शिकार और डोनर को रिश्तेदार दिखाने के लिए फर्जी कागजात बनाए जाते थे. अस्पताल के मुलाज़िम इस काम में उनकी मदद करते थे. फिर डोनर और रिसीवर को अस्पताल में भर्ती करवाया जाता था. और 10-15 दिनों में डील पूरी हो जाती थी.

ऐसे होता है रुपयों का बंदरबांट
रैकेट में रुपयों की बंदरबांट अपने-आप में एक चौंकानेवाली बात है. ये रैकेट किडनी के लिए जरूरतमंद से 20 से 25 लाख वसूलता था. इसमें बिचौलियों को 1-1 लाख रुपए मिलते थे. जबकि डोनर को सिर्फ़ 3 से 4 लाख. यही वजह है कि धंधेबाज जगह-जगह से डोनर और रिसीवर की तलाश करते हैं, फर्जी कागजात तैयार करवाते हैं और फिर लाखों रुपये की वसूली करते हैं. खास बात ये है कि विदेशी जरूरतमंद को किडनी बेचने के लिए हिंदुस्तानी के मुकाबले कई गुना ज्यादा रकम मिलती है.

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