राष्ट्रीय राजधानी में गुरुवार को दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) ने यमुना बाजार इलाके में कई प्रॉपर्टीज को गिरा दिया. पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने इस इलाके को यमुना के किनारे 'O-ज़ोन' के तौर पर चिन्हित किया है. इसे सुरक्षित और बिना-निर्माण वाले फ्लडप्लेन यानी बाढ़-क्षेत्र के तौर पर तय किया गया है, जो DDA के अधिकार क्षेत्र में आता है.
23 जून को जारी की गई नोटिस में कहा गया था, "यमुना बाजार घाट नंबर 2 से 32 के निवासियों को सूचित किया जाता है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी को दिए गए निर्देशों के मुताबिक, DDA के अधिकार क्षेत्र में आने वाले यमुना नदी के फ्लडप्लेन इलाके को हर तरह के अतिक्रमण से मुक्त कराया जाना है."
बुलडोजर एक्शन की आशंकाओं के बीच लोग अपना जो भी सामान बचा पाए, उसे लेकर इलाके से निकलते दिखे. उन्हें यह नहीं पता था कि वे आगे कहां जाएंगे. कुछ लोगों का आरोप था कि अधिकारियों ने उनका सामान ले जाने के लिए ट्रकों या टेम्पो को इलाके में आने की इजाजत नहीं दी.
'हमारी बेटियां शेल्टर में सुरक्षित नहीं...'
40 के दशक के नगेंद्र मिश्रा कश्मीरी गेट के पास काम करते हैं और करीब दो दशक से इस इलाके में रहते हैं. वे कहते हैं कि मेरा परिवार शेल्टर होम में नहीं जाना चाहता. नगेंद्र ने बताया, "मेरा परिवार आठ लोगों का है. हमसे अलग-अलग नाइट शेल्टर में जाने के लिए कहा गया है. वे जगहें हमारे लिए सुरक्षित नहीं हैं. हमारी बेटियों को वहां सुरक्षित महसूस नहीं होता."
निषादराज घाट नंबर 9 के पास एक नाव चलाते हैं, जो लोगों और तीर्थयात्रियों को यमुना पार कराती है और परिवारों को उनके प्रियजनों की अस्थियां पवित्र नदी में विसर्जित करने के लिए लाती है. उन्होंने बेहद हारे हुए लहजे में कहा, "दो दिन पहले, अधिकारी आए और हमें बताया कि 25 जून तक सब कुछ हटा देना चाहिए. हमें इसका अंदाजा हो गया था." उन्होंने यमुना को घूरते हुए पूछा, "अब हम कहां जाएं?"
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निषादराज ने कहा कि करीब 100 परिवार जिनकी जिंदगी यमुना पर फेरी सर्विस और धार्मिक रस्मों पर निर्भर है, इस तोड़-फोड़ से प्रभावित हुए हैं, जिनमें आठ या नौ परिवार शामिल हैं, जो पीढ़ियों से नदी से अपनी रोजी-रोटी चलाते आए हैं.
इस मामले पर DDA की तरफ से कोई ऑफिशियल जवाब नहीं आया है. लोगों से पास के शेल्टर होम में जाने के लिए कहा गया है.
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