जातिगत सर्वेक्षण रिपोर्ट पर भिड़ गए लालू और उपेंद्र कुशवाहा, सोशल मीडिया पर जुबानी जंग

बिहार में जातिगत सर्वे के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है. लालू यादव ने इस सर्वे के आंकड़ों का विरोध करने वालों को जब आड़े हाथों लिया तो उपेंद्र कुशवाहा ने इस पर पलटवार कर दिया. इसके बाद दोनों तरफ से एक्स (ट्विटर) पर ही हमला शुरू हो गया.

Advertisement
बिहार में जातिगत सर्वे पर भिड़े लालू और कुशवाहा बिहार में जातिगत सर्वे पर भिड़े लालू और कुशवाहा

रोहित कुमार सिंह

  • पटना,
  • 10 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 2:41 PM IST

बिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण की रिपोर्ट आने के बाद से ही लगातार प्रदेश में सियासी बवाल मचा हुआ है. अब इसी मुद्दे को लेकर आरजेडी सुप्रीमो और राष्ट्रीय लोक जनता दल प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा आपस में भिड़ गए हैं.

दरअसल, जातीय जनगणना के पक्ष में बोलते हुए लालू ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखा जहां पर उन्होंने कहा कि कैंसर का इलाज सर दर्द की दवा खाने से नहीं होगा. जातिगत जनगणना के विरोध में जो लोग हैं वह इंसानियत, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बराबरी तथा समानुपातिक प्रतिनिधित्व के खिलाफ है. ऐसे लोगों में रत्ती भर भी न्यायिक चरित्र नहीं होता है. किसी भी प्रकार की असमानता और गैर बराबरी के ऐसे समर्थक अन्यायी प्रवृत्ति के होते हैं जो जन्म से लेकर मृत्यु तक केवल और केवल जन्मजात जातीय श्रेष्ठता के आधार और दंभ पर दूसरों का हक खाकर अपनी कथित श्रेष्ठता को बरकरार रखना चाहते हैं.

Advertisement

कुशवाहा का लालू यादव पर पलटवार

लालू के इसी तर्क का जवाब देते हुए मंगलवार को उपेंद्र कुशवाहा ने भी सोशल मीडिया पर ही उन्हें जवाब देते हुए पूछा कि भले ही कैंसर के इलाज के लिए कैंसर की दवा खाना जरूरी है मगर इसका मतलब यह नहीं होता है कि इलाज के नाम पर मलाई घूम फिर कर लालू परिवार ही खाएं और बाकी लोगों को मट्ठा भी नसीब ना हो.

उपेंद्र कुशवाहा ने लालू पर पलटवार करते हुए आगे लिखा,  कैंसर के इलाज के लिए बिहार की जनता ने लालू प्रसाद को भी डॉक्टर की कुर्सी पर बैठाया था तब आपकी फीस नौकरी के बदले जमीन थी. लालू प्रसाद को कम से कम न्यायिक चरित्र की बात नहीं करनी चाहिए और यह उन्हें शोभा नहीं देता है. अगला डॉक्टर भी आपको आपके परिवार से बाहर दिखाई नहीं देता है. आपके परिवार से बाहर भी बहुत बड़ी दुनिया है पिछड़े, अति पिछड़े दलितों की. 

Advertisement

जातिगत सर्वे के आंकड़े

बता दें कि बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में कुल आबादी 13 करोड़ से ज्यादा है. इनमें 27% अन्य पिछड़ा वर्ग और 36% अत्यंत पिछड़ा वर्ग है. यानी, ओबीसी की कुल आबादी 63% है. अनुसूचित जाति की आबादी 19% और जनजाति 1.68% है. जबकि, सामान्य वर्ग 15.52% है. नीतीश सरकार साढ़े तीन साल से जातिगत जनगणना करवाने की जिद पर अड़ी थी. सरकार ने 18 फरवरी 2019 और फिर 27 फरवरी 2020 को जातिगत जनगणना का प्रस्ताव विधानसभा और विधान परिषद से पास करवा लिया था. लेकिन इस साल जनवरी में जातिगत जनगणना का काम शुरू हुआ. हालांकि, सरकार इसे जनगणना नहीं बल्कि 'सर्वे' बताती है.

सुप्रीम कोर्ट में है जातिगत सर्वे का मामला

बिहार में जातिगत जनगणना का सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच चुका है. सर्वोच्च अदालत ने जातिगत सर्वे का डेटा रिलीज करने पर बिहार सरकार को नोटिस भी जारी किया है. इस नोटिस में 4 हफ्ते के अंदर जवाब देने की बात कही गई है. सरकार के जवाब के बाद याचिकाकर्ता जवाब दाखिल करेंगे. आगे की सुनवाई जनवरी 2024 को होगी.


 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »