साल 2026 में चालीस से ज्यादा देशों का राजनीतिक भविष्य तय होगा, लेकिन असर दुनिया पर भी होगा. फिलहाल यूरोप से लेकर मिडिल ईस्ट में जंग चल रही है. एशिया ऊपर से शांत दिख रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर खदबदा रहा है. अफ्रीका के हाल सालों से बेहाल हैं. ऐसे में छोटी चिंगारी भी आग भड़का सकती है. देशों में कैसी लीडरशिप आएगी, इससे काफी कुछ तय होगा.
पहले महीने म्यांमार, युगांडा और पुर्तगाल में आम चुनाव हैं. तो फरवरी में बांग्लादेश, थाइलैंड, कोस्टा रिका और लाओस में इलेक्शन हैं. एक तरह से पूरा कैलेंडर भरा हुआ है. लेकिन चालीस में से तीन चुनाव ऐसे हैं, जिनपर सबकी नजरें हैं. कहा जा सकता है कि इनके रिजल्ट इन्हीं देशों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि असर दूर तक जाएगा.
इनमें पहला नाम है बांग्लादेश चुनाव का. अगस्त 2024 में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद यह पहला आम चुनाव है. इसमें अवामी लीग जैसी बड़ी पार्टी तस्वीर से लगभग गायब है. हसीना फिलहाल भारत की शरण में हैं, जबकि कई और नेता या तो जेल में हैं, या देश छोड़ चुके. बीच-बीच में दल समर्थक अपनी वापसी की बात जरूर करते रहे लेकिन ये दावा दीमक लगे पेड़ से ज्यादा खोखला है.
दूसरा दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) है, जिसकी नेता खालिदा जिया का हाल में निधन हो गया. अब दल का जिम्मा उनके बेटे तारिक रहमान के हाथ में है. ये बड़ा दल है, जिसके पास नेतृत्व का अनुभव भी है लेकिन लंबे समय बाद चलना इसके लिए काफी मुश्किल हो सकता है.
जमात-ए-इस्लामी दल भी है, जो चरमपंथी होने की वजह से राजनीति से बैन कर दिया गया. इसपर आरोप है कि साल 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने के दौरान इसने पाक सेना का साथ दिया था. लेकिन अब मैदान इसके लिए भी खुला हुआ है.
हाल की खबर है कि अब तक बैन रह चुकी पार्टी जमात के साथ कई दल गठबंधन बना चुके ताकि बीएनपी को भी चुनाव से दूर रखा जा सके. हसीना को गद्दी से उतारने का काम स्टूडेंट्स ने किया था. अब यही यूथ पावर, नेशनल सिटीजन पार्टी बना चुकी. इसके पास राजनीतिक तजुर्बा या ताकत नहीं, लेकिन युवा वोटर ज्यादा होने की वजह से इस दल को भी बढ़त मिल सकती है.
लेकिन ढाका की अंदरूनी हलचल से दुनिया को क्या? यहीं असल खेल होता है. बांग्लादेश की स्थिति बदलने का सीधा असर भारत, चीन और यहां तक कि पाकिस्तान पर भी होगा. यानी जाहिर तौर पर एशिया और पूरी दुनिया इससे अछूती नहीं रहेगी.
बांग्लादेश भारत का करीबी पड़ोसी है और सीमा, व्यापार, अवैध घुसपैठ और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दोनों देश गहराई से जुड़े हैं. चुनाव के बाद बनने वाली सरकार अगर अस्थिर होती है या भारत विरोधी रुख अपनाती है, तो इसका सीधा असर द्विपक्षीय रिश्तों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ेगा.
चीन और अमेरिका भी इस चुनाव पर नजरें जमाए हुए हैं. चीन बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर और इनवेस्टमेंट के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है. वहीं यूएस को हर उस बात से मतलब है, जिससे चीन या भारत को मतलब हो. खासकर अभी, जबकि दोनों ही देशों की आर्थिक और सैन्य ताकत उसे असुरक्षित बना रही है, वो बांग्लादेश जैसे देशों को स्टेबलाइजर की तरह इस्तेमाल कर सकता है. मतलब उसके जरिए बाकियों पर नजर रखने और साधने का काम.
नवंबर में होने वाले अमेरिका के मिड-टर्म चुनाव में निचले सदन की सभी 435 सीटों पर वोटिंग होगी, जबकि सीनेट की 100 में से एक तिहाई सीटों के लिए भी चुनाव होंगे.
अमेरिका में आमतौर पर यह देखा गया है कि मिड-टर्म में उस दल को नुकसान होता है, जो वाइट हाउस में है. इसी वजह से यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए बहुत अहम हो जाता है. हाल में हुए कई सर्वे संकेत दे रहे हैं कि रिपब्लिकन्स हाउस पर अपना नियंत्रण खो सकते हैं और सीनेट में उसका बहुमत सिमट सकता है.
अगर ट्रंप कांग्रेस के एक या दोनों सदनों पर नियंत्रण खो दें, तो इससे वे अब तक जैसे धड़ाधड़ फैसले लेते रहे, वो प्रोसेस कमजोर पड़ जाएगी. कई फैसले ऐसे हैं, जिनपर एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से काम नहीं चलता. ऐसे में डेमोक्रेट्स के कंट्रोल वाला सदन राष्ट्रपति के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.
नवंबर के चुनावों के दौरान ट्रंप के कार्यकाल के दो साल हो चुके होंगे. ऐसे में यह भी पता लगेगा कि राष्ट्रपति की लोकप्रियता पर कितना असर हुआ. फिलहाल ट्रंप की लीडरशिप में अमेरिका ने जितना पंगा लिया हुआ है, उससे भी अंदाजा लगाया जा रहा है कि मिड-टर्म एक तरह से ट्रंप प्रशासन पर नकेल कसने वाला चुनाव साबित हो सकता है.
रूस में सितंबर 2026 में स्टेट डूमा (रूसी संसद के निचले सदन) के चुनाव होने हैं. इसके अलावा उसी समय कई राज्यपालों, क्षेत्रीय विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव भी कराए जाएंगे. रूस में इसे आमतौर पर सिंगल वोटिंग डे कहा जाता है, जब एक ही रोज अलग-अलग स्तर के चुनाव होते हैं.
स्टेट डूमा रूस की संसद का सबसे अहम हिस्सा है. यहीं से कानून पास होते हैं, बजट को मंजूरी मिलती है और राष्ट्रपति की नीतियों को कानूनी समर्थन मिलता है. अभी डूमा में यूनाइटेड रशिया का दबदबा है जो पुतिन सपोर्टर है.
इन चुनावों का असर सीधे तौर पर पुतिन की ताकत और पकड़ पर पड़ेगा. अगर यूनाइटेड रशिया को एक बार फिर मजबूत बहुमत मिले, तो माना जाएगा कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव के बावजूद पुतिन को देश के भीतर गहरा सपोर्ट हासिल है. दरअसल, यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी मीडिया ने रिपोर्ट किया कि रूसी लोग अपने ही लीडर से त्रस्त हैं और देश छोड़ रहे हैं. लेकिन चुनाव में जीत से समझ आ सकेगा कि इसमें कितनी सच्चाई या कितनी मिलावट है. इसके बाद पुतिन अपनी पॉलिसीज पर बिना रुकावट काम कर सकेंगे.
वहीं अगर सत्ता पार्टी की सीटें कम हों या विपक्ष का प्रदर्शन बेहतर दिखे, तो यह पुतिन के लिए चेतावनी होगी. भले ही रूस में विपक्ष कमजोर है, फिर भी वोटिंग ट्रेंड यह बताएगा कि आम लोगों के बीच नाराजगी कितनी बढ़ रही है.
यह ग्लोबल पॉलिटिक्स के लिए भी अहम होगा. अमेरिका समेत यूरोप, यूक्रेन युद्ध में भारी पैसे लगा चुके. अब वे शांति की अपील कर रहे हैं लेकिन पुतिन टस से मस होने को राजी नहीं. ऐसे में अगर वे अपने ही देश में कमजोर दिखने लगें तो बाकी ताकतों के लिए विद्रोह भड़काना उतना मुश्किल नहीं होगा. कम से कम वे इतना तो जरूर कर सकेंगे कि रूस में भी अलगाववाद की चिंगारी लगा दें.
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