'राख' की कहानी 1978 के चर्चित रांगा-बिल्ला केस से प्रेरित है. कहानी दो भाई-बहन, सुमन और साहिल अरोड़ा के इर्द-गिर्द घूमती है. बारिश वाले दिन दोनों बस स्टॉप पर खड़े होते हैं. सुमन को रेडियो स्टेशन में गाना गाने जाना है और उसका भाई उसके साथ है. तभी एक फिएट कार में बैठे दो अजनबी उन्हें लिफ्ट ऑफर करते हैं. बच्चे उनकी बात मान लेते हैं, लेकिन फिर कभी घर नहीं लौटते.
इसके बाद शुरू होती है एक ऐसी जांच, जो सिर्फ किडनैपिंग केस नहीं रहती बल्कि देश को हिला देने वाले हत्या कांड में बदल जाती है. यंग सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश इस केस की कमान संभालता है और अपराधियों की तलाश में निकल पड़ता है. कहानी सिर्फ पुलिस जांच तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हत्यारों की मानसिकता और उनकी भागदौड़ को भी विस्तार से दिखाती है.
इस दमदार स्टोरीलाइन को अपने अंदर समेटे हुए इस सीरीज ने क्या कमाल दिखाया है, आइये आपको बताते हैं हमारे रिव्यू में...
दो टाइमलाइन का शानदार खेल
सीरीज का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसका स्क्रीनप्ले है. एक तरफ पुलिस की जांच चल रही है, दूसरी तरफ अपराधियों बाबू और रज्जो की गतिविधियां दिखाई जाती हैं. दोनों टाइमलाइन लगभग एक हफ्ते के अंतर पर चलती हैं और धीरे-धीरे एक बिंदु पर आकर मिलती हैं.
हर एपिसोड को अलग चैप्टर की तरह पेश किया गया है. 'गुमशुदा', 'जानवर' जैसे टाइटल कहानी के मूड को और मजबूत बनाते हैं. हालांकि कुछ जगहों पर एपिसोड थोड़े लंबे महसूस होते हैं, लेकिन रहस्य और तनाव इतना मजबूत है कि दर्शक जुड़े रहते हैं.
सीरीज ने बनाया बेचैन कर देने वाला माहौल
'पाताल लोक' फेम डायरेक्टर प्रोसित रॉय ने यहां भी कमाल का काम किया है. उन्होंने 70 के दशक की दिल्ली को बेहद वास्तविक तरीके से स्क्रीन पर उतारा है. पुरानी दिल्ली की सड़कें, बस स्टॉप, पुलिस सिस्टम और उस दौर का सामाजिक माहौल सब कुछ बेहद असली सा लगता है.
डायरेक्टर सिर्फ अपराध नहीं दिखाते, बल्कि उस दौर के समाज को भी समझाने की कोशिश करते हैं. कैसे एक घटना ने दिल्ली की पहचान बदल दी और लोगों के भीतर डर पैदा कर दिया, ये बात सीरीज बहुत प्रभावी तरीके से सामने लाती है. कई सीन इतने असहज और डरावने हैं कि लंबे समय तक दिमाग से नहीं निकलते. ये सीरीज मनोरंजन से ज्यादा आपको झकझोरने का काम करती है.
हर कलाकार ने छोड़ी गहरी छाप
सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश के किरदार में अली फजल पूरी सीरीज की जान हैं. एक युवा पुलिस अफसर के संघर्ष, गुस्से, बेबसी और जुनून को उन्होंने शानदार तरीके से निभाया है. जैसे-जैसे केस आगे बढ़ता है, उनका किरदार और मजबूत होता जाता है.
वहीं सोनाली बेंद्रे ने बच्चों को खो चुकी मां की पीड़ा को बेहद असरदार ढंग से निभाया है. कई जगह वो बिना डायलॉग के सिर्फ अपनी आंखों से दर्द बयां कर देती हैं. उनका प्रदर्शन सीरीज के सबसे भावुक हिस्सों में से एक है.
आमिर बशीर एक सख्त लेकिन टूट चुके पिता के रूप में प्रभावित करते हैं. वहीं राकेश बेदी का किरदार कहानी में नया और गंभीर अनुभव लेकर आता है. रामनदीप यादव (रज्जो) और आकाश मखीजा (बाबू) इतने खतरनाक और डरावने लगे हैं कि उनसे नफरत करना लाजिमी होगा. खासकर बाबू का बैकस्टोरी ट्रैक बेहद परेशान करने वाला और यादगार है. यही उनके किरदार की खासियत है.
दिल्ली खुद एक किरदार बनकर उभरती है
'राख' सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है. ये उस दिल्ली की कहानी भी है जो धीरे-धीरे बदल रही थी. एक ऐसा समय जब लोग अजनबियों पर भरोसा कर लेते थे, बच्चों का अकेले आना-जाना सामान्य बात थी और शहर में आज जैसी दहशत नहीं थी. सीरीज दिखाती है कि कैसे एक भयावह अपराध ने पूरे शहर की सोच बदल दी. आज जो 'दिल्ली से डर' वाली छवि है, उसकी जड़ें कहीं न कहीं इसी घटना तक जाती हैं.
तमाम अच्छाईयों के बाद भी रह गई एक कमी
सीरीज का सबसे बड़ा नेगेटिव पॉइंट इसकी लंबाई है. कुछ हिस्सों को थोड़ा छोटा किया जा सकता था. आठ एपिसोड की बजाय छह एपिसोड में भी कहानी उतनी ही प्रभावशाली लग सकती थी. कुछ जगह गति धीमी महसूस होती है. लेकिन अच्छी बात ये है कि कहानी कभी अपना असर नहीं खोती.
फाइनल वर्डिक्ट
'राख' कोई आसान या हल्की-फुल्की क्राइम थ्रिलर नहीं है. ये एक ऐसी सीरीज है जो आपको अंदर तक बेचैन कर देती है. शानदार डायरेक्शन, मजबूत स्क्रीनप्ले, दमदार एक्टिंग और वास्तविक घटनाओं से जुड़ा दर्द इसे हाल के सालों की सबसे प्रभावशाली क्राइम ड्रामा सीरीज में शामिल करता है.
अगर आपको दिल्ली क्राइम, ब्लैक वॉरंट या वास्तविक घटनाओं पर आधारित गंभीर क्राइम थ्रिलर पसंद हैं, तो 'राख' आपके लिए जरूर देखने लायक है.
आरती गुप्ता