Nainital District: युवा-महिला और किसानों का दिल जीतना जरूरी, ड्रग्स बना 'साइलेंट मुद्दा'

उत्तराखंड का नैनीताल जिला राजनीति के लिहाज से हमेशा से खास रहा है. विधानसभा चुनाव में इस जिले से 6 सीटें निकलती हैं. यहां पर किसान से लेकर महिला वोटर तक, जीत-हार के लिए कई फैक्टर जिम्मेदार रहते हैं.

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Nanital District की प्रोफाइल Nanital District की प्रोफाइल

सुधांशु माहेश्वरी

  • नई दिल्ली,
  • 25 जनवरी 2022,
  • अपडेटेड 11:15 PM IST
  • नैनीताल में महिला वोटर बन चुकी हैं निर्णायक
  • पहली बार वोट डालने वालों पार्टी की नजर
  • 2017 में बीजेपी का दिखा था दम, 5 सीटें जीतीं

उत्तराखंड का नैनीताल जिला....पर्यटन के लिहाज से सबसे खूबसूरत....जिस जिले की तारीफ सिर्फ भारत में ना होकर विदेशों में होती है. हर जगह एक टूरिस्ट स्पॉट है, हर जगह पर्यटन का नया अवसर पैदा करता है. अब अवसरों से भरे इस जिले की राजनीति को समझना इतना आसान नहीं है. कुल 6 विधानसभा सीटों वाला ये नैनीताल जिला उत्तराखंड की सियासत में कई बार नाटकीय मोड़ ला चुका है. इसकी किसी सीट पर किसानों का वर्चस्व है तो किसी सीट पर महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में कही अधिक है. किसी सीट पर युवा मतदाता निर्णायक बन रहा है तो किसी सीट पर हर पांच साल बाद परिवर्तन वाला ट्रेंड चल रहा है. सबकुछ हो रहा है, लगातार समीकरण बदल रहे हैं क्योंकि ये उत्तराखंड का नैनीताल जिला है.

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किसानों का गुस्सा बीजेपी को पड़ेगा भारी?

नैनीताल जिले की 6 विधानसभा सीटे हैं- लालकुआं, भीमताल, नैनीताल (अ.जा.), हलद्वानी, कालाढूंगी और रामनगर. अब वैसे तो हर सीट पर हर पार्टी के लिए मुकाबला कड़ा है, लेकिन किसान आंदोलन के बाद से बीजेपी के लिए 6 में से चार सीटों पर चुनौती ज्यादा ही बढ़ गई है. नैनीताल जिले की रामनगर, कालाढूंगी, लालकुआं और हल्द्वानी सीट पर किसानों का अच्छा खासा प्रभाव है. जो दल इस वर्ग को अपने पाले में कर ले, इन चार सीटों पर जीत सुनिश्चित की जा सकती है. बीजेपी के लिए कहा जा रहा है कि कृषि कानून वापस लेने के बाद किसानों के गुस्से को कम कर दिया गया है, लेकिन उनका दिल जीतना बाकी है. जो किसान नाराज होकर मुंह मोड़ चुका है, उसे फिर अपनी राजनीति का हिस्सा बनना बीजेपी के लिए चुनौती बन गया है.

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नैनीताल में नशा बड़ा मुद्दा, नेता चुप

इस जिले का एक मुद्दा ऐसा भी है जिसको लेकर राजनीति गलियारों में चर्चा सीमित दिखाई पड़ती है लेकिन आम लोगों के बीच इस पर काफी मंथन रहता है. उत्तराखंड का ये जिला अब नशे की चपेट में आ गया है. यहां पर रामनगर और हल्द्वानी में तो चरस और स्मैक का तो ऐसा कारोबार चल पड़ा है कि कई युवा इसका सेवन भी कर रहे हैं और अपनी जिंदगी तबाह करते भी दिख रहे हैं. वहां के स्थानीय ही बताते हैं कि कई बार उन्होंने बच्चों को नशा करते पकड़ा है और इलाके का शायद ही कोई ऐसा कोना है जहां युवा नशा करते नहीं दिखाई देते हैं, बहुत आसानी से ड्रग्स बच्चों को मिल रहा है. ऐसे में नैनीताल जिले में 'ड्रग्स' एक साइलेंट मुद्दा बनकर उभरा है जिस पर अभी राजनेता ज्यादा टिप्पणी करते नहीं दिख रहे, लेकिन लोगों के बीच ये एक डिसाइडिंग फैक्टर है.

युवा वोटर और महिलाओं की बढ़ी सक्रियता

अब किसान-ड्रग्स के बाद नैनीताल जिले का जनसंख्या वाला समीकरण भी कई पार्टियों के समीकरण बिगाड़ सकता है. इस बार नैनीताल जिले में महिला और युवा वोटरों की एक निर्णायक भूमिका रहने वाली है. चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि समाज के ये दो वर्ग नैनीताल जिले में हार-जीत का फैसला आसानी से कर सकते हैं. इस बार सभी पार्टियां युवा वोटर को अपने पाले में करना चाहती हैं. इसका कारण सरल है- पिछले पांच सालों में नैनीताल जिले में युवा वोटरों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है. इस समय यहां पर कुल 3.90 लाख युवा वोटर हैं, इसमें कई ऐसे भी हैं जो फर्स्ट टाइम वोटर हैं. महिला वोटर की बात करें तो हर बीतते चुनाव के साथ उनका योगदान भी कई गुना बढ़ चुका है. सिर्फ 10 सालों के अंदर ही नैनीताल जिले में 32.4 प्रतिशत महिला वोटर बढ़ चुकी हैं. ऐसे में इस आधी आबादी को खुश करना भी हर पार्टी के लिए काफी जरूरी है.

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2017 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो नैनीताल जिले ने बीजेपी को दिल खोलकर वोट दिए थे. 6 में से पांच सीटों पर पार्टी ने जीत हासिल कर ली थी. उस चुनाव में कांग्रेस सिर्फ हल्द्वानी सीट पर अपना कब्जा जमा पाई थी. लेकिन इस बार दो से तीन सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला देखने को मिल रहा है. 

नैनीताल की हर सीट का सियासी समीकरण

नैनीताल सीट- नैनीताल विधानसभा सीट नैनीताल-उधमसिंह नगर लोकसभा सीट के तहत आती है. नैनीताल विधानसभा सीट के सामाजिक समीकरणों की बात करें तो यहां की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर निर्भर है. यहां अनुसूचित जाति और जनजाति के मतदाताओं की तादाद अधिक है. वहीं सामान्य बिरादरी के मतदाता भी अच्छी तादाद में हैं. 2017 के चुनाव में बीजेपी की टिकट से संजीव आर्य ने इस सीट को जीता था.

भीमताल- भीमताल सीट 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले अस्तित्व में आई थी. इस विधानसभा क्षेत्र में सवर्ण मतदाताओं की बहुलता है. अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं. 2017 के चुनाव में इस सीट पर एक निर्दलीय ने बाजी मारी थी. तब राम सिंह केड़ा ने कांग्रेस और बीजेपी के उम्मीदवारों को पराजित किया था.

हल्द्वानी- कांग्रेस का मजबूत गढ़ माने जाने वाली इस सीट पर मुस्लिम फैक्टर काफी अहम रहता है. इस वजह से ओवैसी की पार्टी AIMIM और सपा भी इस सीट पर टकटकी लगाए बैठी हैं. 2017 के चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस की ही इंदिरा हृदयेश ने बड़ी जीत हासिल की थी. पिछले चुनाव में भी वहीं इस सीट से जीती थीं.

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रामनगर- रामनगर विधानसभा सीट पर बहुसंख्यक मतदाता हिंदू ही हैं. जातीय समीकरण की बात करें तो यहां ठाकुर मतदाता 32%, ब्राह्मण मतदाता 23%, अनुसूचित जाति 21%, मुस्लिम मतदाता 22% हैं.  इस सीट पर क्षेत्रवाद और जातिवाद हमेशा से हावी रहा है. 2017 में भाजपा के दीवान सिंह बिष्ट ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के रणजीत सिंह रावत को इस सीट से हराया था. खबर है कि इस बार कांग्रेस के हरीश रावत इस सीट से दावेदारी ठोक सकते हैं.

कालाढूंगी- 2012 में अस्तित्व में आई इस विधानसभा सीट पर पिछले दो चुनावों से बीजेपी का ही कब्जा रहा है. इस सीट से बीजेपी के दिग्गज नेता बंशीधर भगत लगातार दो बार से चुनाव जीतते आ रहे हैं. तीसरी बार भी पार्टी ने उन्हीं को चुनावी मैदान में उतार रखा है. इस बार बंशीधर भगत के बेटे भी इस सीट से उम्मीदावरी की उम्मीद लगाए बैठे थे. लेकिन पार्टी ने अनुभव को तरजीह देते हुए उन्हें साइडलाइन कर दिया.

लालकुआं- एक बार निर्दलीय और एक बार भाजपा के खाते में जाने वाली इस विधानसभा सीट पर अभी तक कांग्रेस अपना वर्चस्व कायम नहीं कर पाई है. दो बार से लगातार इस सीट पर नवीन चन्द्र दुमका चुनाव जीत रहे हैं. 2012 में उन्होंने बतौर निर्दलीय वो चुनाव लड़ा था तो वहीं 2017 में भाजपा के टिकट पर भी जीत हासिल की.

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