Gujarat Assembly Election: आदिवासी वोट बैंक पर कब्जे के लिए बीजेपी-कांग्रेस में जंग, AAP ने शुरू की सेंध लगाने की तैयारी

गुजरात में साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में आदिवासी समाज प्रभावित सीटों में से कांग्रेस को 15, बीजेपी को 9 और बीटीपी को 2 सीटों पर जीत मिली थी. एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी. गौरतलब है कि 2017 में सोनिया गांधी के रानीतिक सलाहकार और वरिष्ठ नेता अहमद पटेल की वजह से बीटीपी और कांग्रेस ने कुछ सीटों पर गठबंधन किया था. उनका अब देहांत हो चुका है.

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सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर

aajtak.in

  • नर्मदा,
  • 10 अप्रैल 2022,
  • अपडेटेड 2:03 PM IST
  • गुजरात में आदिवासी वोट बैंक पर आम आदमी पार्टी की नजर
  • गुजरात की 27 सीटों पर आदिवासी समाज का सीधा प्रभाव

गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले 15 फीसदी आदिवासी वोटबैंक को अपनी ओर खींचने के लिए पहले बीजेपी और कांग्रेस के बीच जंग होती थी लेकिन इस बार अब आम आदमी पार्टी भी इसमें कूद गई है.

गुजरात विधानसभा चुनाव इस साल होने वाले है जिसमें पाटीदार समाज के वोटों के साथ आदिवासी समाज के वोट भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि गुजरात की 182 सीट में 27 सीटों पर आदिवासी समाज का प्रभाव है.

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इसी वजह से कांग्रेस ने आदिवासी समाज को अपने पाले में बनाए रखने के लिए विधानसभा में सुखराम राठवा को अपना नेता बनाया है, साथ में  बीटीपी के युवा नेता राजेश वसावा को कांग्रेस ने शामिल कर बीटीपी की आदिवासी युवा टीम में सेंध लगाने की कोशिश की है.

बीजेपी ने आदिवासी वोटबैंक को अपनी तरफ खींचने के लिए गुजरात में भूपेंद्र पटेल सरकार में आदिवासी समाज के 4 नेताओं को मंत्री बनाया है. साथ में केंद्र सरकार ने सांसद  गीताबेन राठवा को BSNL का  अध्यक्ष भी बनाया है. बीजेपी पार्टी  में और सरकार में आदिवासी समाज के नेताओं को जगह देकर आदिवासी वोट बैंक को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रही है.

गुजरात में भूपेंद्र पटेल की अगुवाई में बीजेपी सरकार में आदिवासी समाज के विधायक नरेश पटेल, जीतू चौधरी, कुबेर डिंडोर को मंत्री बनाया गया है. गुजरात विधानसभा की अगर हम बात करें तो गुजरात विधानसभा में 182 सीटों में से आदिवासियों की 27 सीट है.

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इन सीटों पर 2007 में भी कांग्रेस ने 27 में से 14 सीटों पर जीत हासिल की थी. 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने 16 सीटें हासिल की थी और 2017 के चुनाव की बात करें तो 2017 में भी कांग्रेस ने यहां से 14 सीटें जीती थी जबकि बीजेपी को 9 सीटों पर ही जीत मिली थी. 

कांग्रेस-बीजेपी दोनों आदिवासी वोट बैंक को अपनी ओर खींचने में लगी हुई है लेकिन अब इसमें तीसरे राजनीतिक दल की भी एंट्री हो गई है. आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए आम आदमी पार्टी भी अब डोरे डाल रही है. थोड़े दिनों पहले ही आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भारतीय ट्राइबल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बीटीपी नेता महेश बसावा ने मुलाकात की थी. 

महेश वसावा खुद अपनी टीम के साथ दिल्ली गए थे और उन्होंने अरविंद केजरीवाल से मिलकर दिल्ली सरकार के कामों की प्रशंसा की थी. लेकिन अभी तक उन दोनों के बीच में कुछ तय नहीं हुआ है और बातचीत चल रही है.
 
इससे ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि गुजरात में जिन 27 सीटों पर आदिवासियों का प्रभाव है उसके लिए अब लड़ाई सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही नहीं है. अब आम आदमी पार्टी की नजर भी उस पर है. अब भारतीय ट्राइबल पार्टी के साथ हाथ मिलाकर आम आदमी पार्टी भी बीजेपी-कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है. 

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आदिवासी नेता छोटू वसावा भरूच जिले की झगड़िया सीट से विधायक चुनते आ रहे हैं और उनको हराना किसी भी पार्टी के लिए बेहद मुश्किल है. लेकिन इस बार भारतीय जनता पार्टी उनको भी हराने के लिए जोर आजमाइश कर रही है और छोटू वसावा और उनकी पार्टी के कई नेता कार्यकर्ता को पार्टी में शामिल कर चुकी है.

यहां पर छोटू भाई वसावा बीटीपी की वोटबैंक सेंध लगाने का काम बीजेपी ने सांसद मनसुख वसावा को दिया है. यही वजह है कि वो हर मुद्दे पर बीटीपी को घेरते हुए नजर आते हैं.  15 % आदिवासी वोटबैंक को अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है. भरुच, नर्मदा जिले से कई बीटीपी नेताओं को बीजेपी ने पार्टी में शामिल कर लिया है जिसका फायदा पंचायत चुनाव ने बीजेपी को मिला था. 

गुजरात मे किन मुद्दों पर सरकार से नाराज है आदिवासी समाज ?

दक्षिण गुजरात में तापी नर्मदा रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट का आदिवासियों ने जबरदस्त विरोध किया था. हजारों आदिवासी समाज के लोग सड़कों पर आ गए थे. आदिवासी समाज एक होकर आंदोलन कर रहा था जिसके बाद राज्य सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई थी. 

आखिरकार कृषि कानून की तरह बीजेपी सरकार को इस प्रोजेक्ट को भी फिलहाल स्थगित करना पड़ा. इसके अलावा आदिवासी समाज के मुद्दों की बात करें तो नर्मदा जिले में इको सेंसेटिव जोन का जो मुद्दा है वह भी बीजेपी के लिए गले की फांस बनता जा रहा है.

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चुनाव में बीटीपी हमेशा ये मुद्दा उठाती रहती है. साथ मे स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के एरिया में आदिवासी गांवों की समस्या का अभी भी निपटारा नहीं हो पाया है. ऐसे में जिले के डिप्टी कलेक्टर ने जो आदिवासियों को लेकर गलत बयान दिया था उसको सभी पार्टियों ने हाथों हाथ लिया था और आदिवासियों के विरोध में इसने आग में घी का काम किया.

इन इलाकों में आदिवासियों का प्रभाव

ऐसे में देखना होगा कि इस चुनाव में आदिवासी वोट बैंक को कौन अपने पाले में लाने में सफल होता है. गुजरात के बनासकांठा, साबरकांठा, अरवल्ली, महिसागर, पंचमकाल दाहोद, छोटा उदयपुर,नर्मदा, भरूच , तापी, वलसाड, नवसारी, डांग, सूरत ज़िले में आदिवासी समाज का अच्छा खासा प्रभाव है.

(नर्मदा से नरेंद्र पेपरवाला की रिपोर्ट)

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